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गंगोत्री-कालिन्दीखाल-बद्रीनाथ यात्रा-2008

By – Dr Arun kuksal

अप्रीतम निर्जन सौन्दर्य में मौत से मुलाक़ात ‘मौत हमारे आस-पास मँडरा रही थी। वह किसी को भी दबोच सकती थी। यहाँ आज़ उसी का राज था।…. शब्द गले तक आते थे और लार में मिलकर नीचे उतर जाते थे। एक ओर जीवन से वंचित होते नीतेश के द्वारा रचा गया हिमाँक मेरे भीतर उथल-पुथल मचाये था और दूसरी ओर बेचैनी, विवशता और विडम्बना भाव से मचलता मेरा चेतन-अवचेतन क्वथनांक को पार कर रहा था। यह हम सबके मानस के ध्वस्त होने जैसा था। हमारा एक साथी हमारे साथ न था।… हममें से कोई नीतेश नहीं होना चाहता था। हम नीतेश होने से बचना चाहते थे। हम ज़िन्दा रहना चाहते थे। पर नीतेश हमारे भीतर बैठा था। छिप सा गया था।…. नीतेश को मन ही मन अलविदा कहते हुए मुझे रौजर डुप्लां की कविता याद आई….

When I die in the mountains
O Rope Comrade
I write this testament for you
Go and tell my mother
I died happy… (पृष्ठ-172-174)

‘पहली बार किसी यात्रा के अन्त में हम रो रहे थे’ प्रो. शेखर पाठक की यह घुमक्कड़ी किताब इस वाक्य पर विराम लेती है। शब्द-यात्रा के इस बिन्दु पर पहुँचा किताब का पाठक भी सहज नहीं रह पाता है। और, इसी असहजता को लिए उसका चिन्तन-मनन किताब में उठाये गये सवालों और समाधानों के प्रति आरम्भ होता है।

कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल में इतिहास के प्रोफेसर, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान और नेहरू स्मारक संग्रहालय तथा पुस्तकालय में फैलो रहे शेखर पाठक की हिमालयी इतिहास, संस्कृति, सामाजिक आन्दोलनों, स्वतंत्रता संग्राम तथा अन्वेषण के अध्येयता और घुमक्कड़शास्त्री की लोकप्रिय पहचान देश-दुनिया में है। कुली बेगार प्रथा, पण्डित नैनसिंह रावत, ‘हरी भरी उम्मीद’ (चिपको आन्दोलन और अन्य जंगलात प्रतिरोधों की परम्परा), ‘दास्तान-ए -हिमालय’ (दो खंडों में) तथा कैलास-मानसरोवर क्षेत्र आदि पर आपकी किताबें विशेष चर्चित रही हैं।

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शेखर पाठक ने हर दशक में आयोजित अस्कोट-आराकोट अभियानों (1974-2024) में हिस्सेदारी के साथ भारतीय हिमालय के सभी प्रान्तों, नेपाल, भूटान तथा तिब्बत के अन्तर्वर्ती क्षेत्रों की कई अघ्ययन यात्राएं की हैं। साथ ही, हिमालयी जर्नल ‘पहाड़’ के 20 अंकों सम्पादन किया है। ‘नीले बर्फीले स्वप्नलोक में’ के बाद ‘हिमांक और क्वथनांक के बीच’ लेखक की दूसरी यात्रा-पुस्तक है।

बासुली को बन
बगन्या पाणी थामी जांछ
नै थामीनो मन
(लोकगीत – कुमाऊँनी में न्योली और गढ़वाली में खुदेड़)

भावार्थ यह है कि, बहते पानी को तो रोका जा सकता है पर मन को थामना बड़ा कठिन है। प्रो. शेखर पाठक के मन-मस्तिष्क की अनवरत 13 वर्षों की ऐसी ही उथल-पुथल से उपजे सैलाब के प्रवाह और प्रभाव की परिणिति है, यह किताब।

सितम्बर, 2008 से फरवरी, 2021 के एक दशक से भी ज़्यादा फैलाव ने इस किताब को और भी यादगार बना दिया है।

‘…गंगोत्री-बद्रीनाथ यात्रा पूरी तरह पैदल थी। किलोमीटर तो 100 से 125 होंगे पर हर किमी. अपने आप में 10 किमी. होता है ऐसे मार्ग में। यात्रियों को गोलोकवासी होने देने का रिकार्ड भी इस मार्ग का अव्वल था। यह दो तीर्थों को एक कठिन भूगोल और अति वर्जित रास्ते से होकर या प्राकृतिक रूप से भागीरथी तथा अलकनन्दा के ऊपरी जलागमों को जोड़ता था। भागीरथी-केदारगंगा संगम (गंगोत्री) से यह यात्रा शुरू होती और तमाम गलों और कलिन्दीखाल को पारकर सरस्वती-अलकनन्दा संगम (बद्रीनाथ के पास) पर समाप्त।’ (पृष्ठ-41)

आशंकाओं के अनुरूप ‘गंगोत्री-कालिन्दीखाल-बद्रीनाथ यात्रा-2008’ उत्तराखण्ड के साथ-साथ देश-दुनिया में भी चर्चित रही। 9 से 22 सितम्बर, 2008 तक की इस यात्रा में दो दलों के 49 सदस्य थे। एक दल में शेखर पाठक, अनूप साह और प्रदीप पांडे के साथ 7 सहयोगी तथा दूसरे दल में 7 ऑस्टियाईयों के साथ 32 सहयोगी शामिल थे। इस पथारोहण के अत्यन्त दुर्गम स्थलों पर मौसम की प्रतिकूलता ने 50 घण्टे से भी ज़्यादा समय तक इन यात्रियों को भीषण संकट में दबोचे रखा। इस विकट समय के अंत का अत्यंत दुखःद पहलू यह रहा कि 6 सहयोगी यात्रियों को बचाया नहीं जा सका था।

शेखर पाठक की यात्रा-पुस्तक ‘हिमांक और क्वथनांक के बीच’ ‘गंगोत्री-कालिन्दीखाल-बद्रीनाथ यात्रा-2008’ के दौरान दो अलग-अलग पर्वतारोही दलों पर सामुहिक रूप में आये कई अकल्पनीय संकटों में खोने और बचने की अन्तः कथा-व्यथा का मार्मिक यात्रा-वृतांत है।

शेखर पाठक मानते हैं कि यात्रायें आदमी को और ज़्यादा संवेदनशील, सहज, समझदार तथा जिम्मेदार बनाने में मददगार होती हैं।

प्रस्तुत यात्रा में वह स्वयं, अपने यात्रा साथियों और नीति-नियन्ताओं को इन चारों कसौटियों पर परखते नज़र आते हैं।

गढ़वाल हिमालय के लगभग अनुछुये एक छोर (जिसमें भागीरथी और अलकनन्दा के आदिम उद्गम स्त्रोत/स्थल छिपे हैं।) की यह यात्रा है।

परन्तु, विचार-मंथन के केन्द्र में कर्मठता के साथ सहजता का प्रतीक संपूर्ण हिमालय है।

इस यात्रा वृतांत में घुमक्कड़ी विधा के विश्व प्रसिद्ध विभूतियों यथा- मूरक्राफ़्ट, नैन सिंह, किशन सिंह, टाँम लाॅन्ग स्टाफ, मैलोरी, राहुल सांकृत्यायन, नागार्जुन, हेनरिश हारा, पीटर ऑफ़स्नेटर, प्रणवानन्द, एडमैण्ड हिलेरी, तेनजिंग, निर्मल साह, इरविन तथा इस मार्ग पर पूर्व में गए सुन्दरानन्द, जे. बी. ऑडेन, गाॅर्डन ऑस्मोस्टन, नीरज पंत, गोविन्द पंत ‘राजू’, गिल्बर्ट विग्नेस, एरिक शिप्टन, टिलमैन, थार्के, पासाङग भोटिया, कुन्साङग, प्रबोधानन्द, दलीप सिंह, ट्रेवर ब्राहम, भक्ति विष्वास, श्याम साह, मलिका बिरदी, महेन्द्र मिराल, थियो, रामनाराण, फ्रेंक स्माइथ, मौरिस हरजोग, रौजर डुप्लां, सी़ एफ. मीड, ई. जे. बरनी, मार्को पाॅलिस, अजय सोडानी तथा जूंको ताबेई की यात्राओं से भी पाठक परिचित होता चलता है।

तेरह अध्यायों का विस्तार लिए यह यात्रा पुस्तक है। प्रथम अध्याय में टिहरी रियासत के ऐतिहासिक संदर्भों के साथ टिहरी बाँध और मनेरी-भाली परियोजना से उत्पन्न मानवीय और पारिस्थितिकीय दुर्दशा का उल्लेख है। शेखर पाठक का सीधा सवाल और प्रबल आशंका ये है कि-

‘…सरकारों या कि समाज को किसी नदी की हत्या करने या अधमरा बनाने का हक़ किससे मिला था? यह सवाल भविष्य की पीढ़ियाँ पूछेंगी ज़रूर। उन्हें यह चमक नहीं, ज़्यादा अंधकार पैदा करने वाली साज़िश लगेगी यदि वह हमारी पीढ़ी से ज़रा सी भी प्रबुद्ध होगीं तो। गुस्सा भी होंगी।’(पृष्ठ-20)

(जहाँ-तहाँ, ऐसा कुछ देखते हुए मुझे भी रसूल हमज़ातोव की ‘मेरा दागिस्तान’ में लिखी पंक्तियाँ अक्सर याद आती हैं-‘शामील अपने सूरमाओं से कहा करता था-‘कोई बात नहीं कि दुश्मन ने हमारे सारे गाँव, हमारे सारे खेतों पर कब्ज़ा कर लिया। लेकिन चश्मा (बहते पानी का स्त्रोत) तो अभी हमारे पास है, हम जीतेंगे।’ दुश्मनों का हमला होने पर कठोर इमाम शामील सबसे पहले तो गाँव के चश्मे की रखवाली करने का हुक्म देता था। जब खुद दुश्मनों पर हमला करता था तो सबसे पहले गाँव के चश्मे पर कब्ज़ा करने का आदेश देता था।’)

अपने देश में तो हम ही अपनी जीवनदायनी नदियों के दुश्मन बने हैं। और, गंगा पुत्र होने का गौरव भी अपने पास रखना चाहते हैं।

दूसरे अघ्याय में शेपा (शेखर पाठक) उत्तरकाशी की ओर की अपनी पुरानी यात्राओं की याद को मलाशते चलते जा रहे हैं। (कहा भी गया कि मलाशना जीवों का परम सुख है। चाहे, याद ही क्यों न हों।) कि उन्नीसवीं शताब्दी के फ्रैडरिक विल्सन के हरसिल से गुजरते हुए ‘…उसकी पूरी कहानी बताने का मन कर रहा है। पर इस तरह हम कालिन्दीखाल कैसे पहुँचेंगे!’ (पृष्ठ-30)

मन से ये कहकर उन्होने अपने को रोका। परन्तु, राहुल सांकृत्यायन, नागार्जुन, हेनरिश हारा और पीटर ऑफ़स्नेटर की इस मार्ग की गई यात्रा का जिक्र करते हुए वे विलक्षण पथारोही, पर्वतारोही और फ़ोटोकार स्वामी सुन्दरानन्द से मुलाकात का वह विस्तार से उल्लेख करते हैं।

गंगोत्री क्षेत्र को गहनता से जानने के लिए स्वामी सुन्दरानन्द सर्वोत्तम गाइड जो थे।

घुमक्कड़ी किताब- हिमांक और क्वथनांक के बीच
लेखक- शेखर पाठक
प्रथम संस्करण- मई, 2024
पृष्ठ- 252, मूल्य- 425
प्रकाशक- नवारुण (मोबाइल नंबर- 9811577426), ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश

समीक्षक पत्ता – अरुण कुकसाल
ग्राम- चामी, पोस्ट- सीरौं- 246163
पट्टी- असवालस्यूं, विकासखण्ड- कल्जीखाल
जनपद- पौड़ी (गढ़वाल), उत्तराखण्ड

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