ganesh godiyal – Research Diary https://researchdiary.in Research Diary Tue, 17 Feb 2026 01:56:08 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1 https://i0.wp.com/researchdiary.in/wp-content/uploads/2023/07/cropped-Research-Diary-Logo.jpeg?fit=32%2C32&ssl=1 ganesh godiyal – Research Diary https://researchdiary.in 32 32 230867523 भीड़, बेचैनी और भविष्य की तलाश: देहरादून से कांग्रेस का आत्ममंथन। https://researchdiary.in/congress-meeting-in-dehradun/ https://researchdiary.in/congress-meeting-in-dehradun/#respond Tue, 17 Feb 2026 01:56:08 +0000 https://researchdiary.in/?p=21145

भीड़, बेचैनी और भविष्य की तलाश: देहरादून से कांग्रेस का आत्ममंथन।

By – Sheeshpal Gusai

पर्वतों की गोद में बसी देहरादून घाटी ने 16 फरवरी को एक परिचित दृश्य देखा—लाल, हरे और सफ़ेद झंडों से भरा परेड ग्राउंड; नारों की गूंज; और लंबे अरसे बाद सड़क पर उतरी वह भीड़, जिसे भारतीय राजनीति में “विपक्ष की सांस” कहा जाता है। चकराता के वरिष्ठ विधायक और पूर्व कैबिनेट मंत्री प्रीतम सिंह द्वारा एक माह पहले घोषित राजभवन घेराव का यह दिन केवल एक कार्यक्रम नहीं था—यह कांग्रेस के भीतर सुलग रही बेचैनी का सार्वजनिक प्रकटन था।

भीड़ आई—दूर-दराज़ के गांवों से, पहाड़ की पगडंडियों से, और कस्बों की तंग गलियों से। राजभवन से एक किलोमीटर पहले पुलिस की बैरिकेडिंग ने मार्च को रोक दिया। परेड ग्राउंड से लगभग एक तिहाई लोग आगे नहीं बढ़ पाए—कुछ बुजुर्ग थे, कुछ थकान के मारे लौट गए। फिर भी, 2022 के चुनावी उबाल को छोड़ दें तो लगभग एक दशक बाद कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के चेहरे पर वैसा ही जोश और वैसा ही आक्रोश दिखा। यह आक्रोश सत्ता के विरुद्ध था, पर उससे अधिक अपने भीतर की असफलताओं के विरुद्ध भी।

उत्तराखंड की राजनीति में कांग्रेस आज एक असहज यथार्थ से जूझ रही है—विधानसभा में सत्ता से बेदखली, लोकसभा में राज्य से शून्य उपस्थिति और पंचायतों में कमजोर पकड़। 2022 में भाजपा से लगभग छह प्रतिशत वोटों के अंतर से हार—यह पराजय मात्र संख्यात्मक नहीं थी; यह संगठनात्मक शिथिलता का परिणाम थी। हरीश रावत के नेतृत्व में लड़ा गया चुनाव भीतरखाने की गुटबाजी के बोझ तले दबा रहा। राजनीति में हार केवल विरोधी की ताकत से नहीं होती—अक्सर वह अपनी ही बिखरी हुई इच्छाशक्ति का दंड होती है।

यदि 2017 से 2022 के बीच कांग्रेस ने गांव-गांव, वार्ड-वार्ड संगठन के ताने-बाने बुने होते, तो शायद 2022 की सुबह कुछ और होती। पर संगठन का काम धैर्य मांगता है—वह चुनावी हवा के भरोसे नहीं चलता। यही वह बिंदु है जहाँ कांग्रेस बार-बार चूकती रही है। आज 2026 की ओर बढ़ते हुए भी भाजपा के मुक़ाबले कांग्रेस का बूथ-स्तरीय ढांचा कमजोर है। राजनीति का गणित बताता है कि भीड़ से तस्वीर बनती है, पर जीत संगठन से आती है।

रैली के बीच कार्यकर्ताओं से हुई बातचीत में एक साझा पीड़ा उभरकर आई—ऊपर के स्तर की गुटबाजी। गांव से आए साधारण कार्यकर्ता इस बात से थके हुए हैं कि नेतृत्व की आपसी खींचतान का खामियाज़ा अंततः उन्हें भुगतना पड़ता है। उनकी मांग बहुत बड़ी नहीं है—उन्हें दिशा चाहिए, निरंतरता चाहिए, और यह भरोसा चाहिए कि उनकी मेहनत व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की भेंट नहीं चढ़ेगी।

हरीश रावत का राजनीतिक जीवन उत्तराखंड के इतिहास का एक अध्याय है—करीब पाँच दशक पहले सांसद बनने वाले नेता ने कभी मुरली मनोहर जोशी जैसे कद्दावर चेहरे को प्रदेश से बाहर का रास्ता दिखाया था। समय ने भूमिका बदली है। आज आवश्यकता शायद उस अनुभव की है जो मार्गदर्शन बने—संरक्षण बने। राजनीति में परिपक्वता यही है कि नेता स्वयं को संस्था के हित में ढाल ले। इसी तरह गोदियाल, प्रीतम सिंह, हरक सिंह रावत और यशपाल आर्य जैसे नेताओं के बीच “मैं मुख्यमंत्री” की अदृश्य होड़ यदि थमी नहीं, तो संगठन की जड़ें और कमजोर होंगी।

देहरादून की यह भीड़ एक संकेत है—कांग्रेस के भीतर जीवन शेष है। पर जीवन तभी गति बनता है जब वह अनुशासन और संगठन से जुड़ता है। रैली के बाद हजारों कार्यकर्ता अपने-अपने गांव लौट गए हैं। असली प्रश्न यह नहीं कि परेड ग्राउंड कितना भरा था; असली प्रश्न यह है कि क्या अब हर गांव में एक बैठक होगी, हर वार्ड में एक समिति बनेगी, हर बूथ पर “अपना आदमी” खड़ा होगा? यदि यह हुआ, तो यह रैली इतिहास में एक मोड़ के रूप में दर्ज होगी। यदि नहीं, तो यह भीड़ भी स्मृतियों की धुंध में खो जाएगी—और विपक्ष की बेचैनी अगले किसी परेड ग्राउंड का इंतज़ार करती रहेगी।

राजनीति अंततः प्रतीकों से नहीं, प्रक्रियाओं से बनती है। देहरादून का परेड ग्राउंड प्रतीक था—अब कांग्रेस के सामने प्रक्रिया गढ़ने की चुनौती है।

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कांग्रेस की आख़िरी उम्मीद गणेश गोदियाल ! https://researchdiary.in/ganesh-godiyal-congress/ https://researchdiary.in/ganesh-godiyal-congress/#respond Tue, 25 Nov 2025 00:00:26 +0000 https://researchdiary.in/?p=20739

कांग्रेस की आख़िरी उम्मीद गणेश गोदियाल !

2027 वही पा सकेगा, जहाँ नेतृत्व और संगठन एक ताल में चलेंगे

By – Avdhesh Nautiyal

कांग्रेस का सेनापति बनने के बाद से गणेश गोदियाल लगातार संगठन में नई ऊर्जा भरने और बिखरी टोली को एकजुट करने में जुटे हैं। मैदान में उनकी सक्रियता और कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद बताता है कि वे केवल चेहरे के रूप में नहीं, बल्कि संगठन को पुनर्जीवित करने वाली भूमिका में सामने आए हैं। गणेश गोदियाल की ताजपोशी केवल औपचारिकता नहीं पार्टी के अस्तित्व को बचाने की अंतिम कोशिश है। गोदियाल वह दुर्लभ चेहरा हैं जिनपर कार्यकर्ता भी भरोसा करते हैं और नेतृत्व भी उन्हें गंभीरता से सुनता है। यही वजह है कि उन्हें “आख़िरी उम्मीद” कहा जा रहा है।

सेनापति के नेतृत्व में युद्ध सेना लड़ती है और कांग्रेस की इस सेना में कई क्षत्रप आज भी अपनी-अपनी राजनीतिक जागीरों में उलझे हैं, जहाँ पार्टी से ज़्यादा व्यक्तिगत राजनीति हावी रहती है। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी जैसी प्रशिक्षित, संगठित और सतत सक्रिय मशीनरी के सामने केवल नाराज़गी का भाव पर्याप्त नहीं हो सकता।

2027 की जमीन पर खड़े होने के लिए कांग्रेस को संगठनात्मक पकड़, बूथ प्रबंधन, निरंतर संघर्ष और मुद्दों पर ठोस पकड़—इन चारों मोर्चों पर खुद को साबित करना होगा। गोदियाल इन कमियों को समझते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या उनकी टीम भी इन्हें स्वीकारकर बदलाव को तैयार है.?

गोदियाल की असली परीक्षा अब शुरू होती है—बिखरे चेहरों को जोड़ना, टिकटों का वितरण योग्यता के आधार पर करना, युवाओं को मंच देना और लड़ाई लड़ने लायक टीम खड़ी करना। इतिहास बताता है कि कांग्रेस में अच्छे नेता कई बार बुरी टीमों के कारण हारे हैं। इस बार पार्टी को आईना सिर्फ़ देखने के लिए नहीं, बल्कि अपनी पुरानी आदतें तोड़ने के लिए उठाना होगा।

ढुलमुल नेताओं को किनारे करना और संघर्षशील चेहरों को आगे लाना अब मजबूरी नहीं—जीत की अनिवार्यता है। गोदियाल पर किसी को संदेह नहीं, पर सवाल नेतृत्व का नहीं, नेतृत्व के पीछे खड़ी मानसिकता का है।

2027 का फैसला गोदियाल नहीं तय करेंगे, उसे तय करेगी वह कांग्रेस, जो उनके पीछे खड़ी होगी। आख़िरी उम्मीद किसी व्यक्ति का नहीं, पार्टी के खुद को बदलने के साहस का नाम है।

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गणेश गोदियाल, राजनीति की हरी-भरी उम्मीद https://researchdiary.in/ganesh-godiyal/ https://researchdiary.in/ganesh-godiyal/#respond Sun, 16 Nov 2025 05:54:50 +0000 https://researchdiary.in/?p=20702

गणेश गोदियाल, राजनीति की हरी-भरी उम्मीद

राठ को बदला, अब सत्ता का सूखापन मिटाने की चुनौती

By – Seetaram Bahuguna

साल 2000, उत्तराखंड राज्य गठन का समय। मुंबई में कारोबार कर रहा राठ का एक युवा गणेश कुछ करने का इरादा लेकर वापस अपनी जड़ों की ओर लौटता है। उस दौर में राठ के बहुत कम युवा 12वीं से आगे की पढ़ाई कर पाते थे। कारण—क्षेत्र में कोई डिग्री कॉलेज नहीं था। क्षेत्र की इस समस्या ने गणेश को जैसे कुछ करने का मकसद दे दिया। उन्होंने राठ शिक्षा समिति का गठन कर प्रवासियों की मदद से पैठानी में डिग्री कॉलेज की नींव डालने का काम शुरू किया।

फिर आया 2002—पृथक उत्तराखंड राज्य का पहला विधानसभा चुनाव। तब के कांग्रेसी सतपाल महाराज के कहने पर पार्टी ने दिग्गज नेता डॉ. शिवानंद नौटियाल का टिकट काटकर युवा गणेश गोदियाल को थलीसैंण विधानसभा से दिग्गज भाजपा नेता डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के खिलाफ प्रत्याशी बना दिया। उस दौर में एक पत्रकार के रूप में मैं भी राठ क्षेत्र में इलेक्शन कवर करने गया था। निशंक जी स्वयं अपनी एंबेसेडर कार से हम पत्रकारों को नयार किनारे बन रहे इस डिग्री कॉलेज को दिखाने ले गए और कहने लगे—“गणेश गोदियाल सिर्फ चुनाव के मद्देनज़र इस दूरस्थ क्षेत्र में डिग्री कॉलेज का सपना दिखा रहे हैं। डिग्री कॉलेज बनाना कोई बच्चों का काम है क्या? चुनाव परिणाम के बाद न यह लड़का वापस मुंबई दिखेगा, न डिग्री कॉलेज बन पाएगा।”

लेकिन राठ के लोगों को गणेश गोदियाल की बातों में एक उम्मीद दिखाई दी, भरोसा दिखाई दिया। नतीजतन गणेश गोदियाल दिग्गज रमेश पोखरियाल निशंक को चुनाव हराने में कामयाब रहे। विधायक बनने के बाद गणेश गोदियाल राठ क्षेत्र में शानदार डिग्री कॉलेज बनाने में सफल हुए। राठ महाविद्यालय का उदय हुआ, जो आज इस क्षेत्र में उच्च शिक्षा का बहुत बड़ा केंद्र है।

फिर आया साल 2012—उत्तराखंड राज्य का तीसरा विधानसभा चुनाव। इस चुनाव में गणेश गोदियाल ने राठ क्षेत्र को ओबीसी का दर्जा दिलाने का वादा जनता से किया। उनके विरोधियों ने यह कहकर उनका मज़ाक उड़ाया कि यह देना किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं है, क्योंकि यदि एक क्षेत्र को यह दर्जा दिया गया तो अन्य क्षेत्रों के लोग भी इसकी मांग करने लगेंगे। लेकिन राठ की जनता ने एक बार फिर गणेश गोदियाल की बातों पर भरोसा किया और उन्हें एक बार फिर विधानसभा पहुंचा दिया। अपने इस कार्यकाल में गणेश गोदियाल राठ क्षेत्र को ओबीसी का दर्जा दिलाने में सफल रहे। आज इसका खूब लाभ राठ के युवाओं को सरकारी नौकरियों में मिल रहा है।

शिक्षा के जरिए राठ के पिछड़ेपन को दूर करने में दो लोगों का योगदान हमेशा याद रखा जाएगा। पहला—डॉ. शिवानंद नौटियाल, जिन्होंने उत्तरप्रदेश सरकार में मंत्री रहते हुए यहां के चप्पे-चप्पे में स्कूल खोलकर शिक्षा का मार्ग प्रशस्त किया। और दूसरा—गणेश गोदियाल, जिन्होंने इस क्षेत्र के युवाओं के लिए उच्च शिक्षा के न सिर्फ दरवाज़े खोले, बल्कि ओबीसी आरक्षण के जरिए सरकारी नौकरी पाने की राह आसान की।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि गणेश गोदियाल सिर्फ वादे नहीं करते, बल्कि उन्हें पूरा भी करते हैं।
राजनीति के तमाम उतार-चढ़ावों के बीच अपनी कार्यशैली से वे अपने समकालीन राजनेताओं में सबसे विशिष्ट एवं भरोसेमंद नज़र आते हैं। ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में वे न सिर्फ पार्टी का कायाकल्प करेंगे, बल्कि 2027 में पार्टी को सत्ता तक पहुंचाने की चुनौती को भी पूरा करेंगे।

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