lakhamandal – Research Diary https://researchdiary.in Research Diary Mon, 10 Aug 2026 03:19:07 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1 https://i0.wp.com/researchdiary.in/wp-content/uploads/2023/07/cropped-Research-Diary-Logo.jpeg?fit=32%2C32&ssl=1 lakhamandal – Research Diary https://researchdiary.in 32 32 230867523 सेवानिवृत्ति के बाद की ‘डिजिटल समाजसेवा’ कितना कारगर। https://researchdiary.in/jaunsar-bavar-talks/ https://researchdiary.in/jaunsar-bavar-talks/#respond Mon, 10 Aug 2026 03:07:31 +0000 https://researchdiary.in/?p=21759

सेवानिवृत्ति के बाद की ‘डिजिटल समाजसेवा’ कितना कारगर।

By – Dinesh Verma

यहां मै अपने जौनसार-बावर क्षेत्र की जमीनी यथार्थ को समझने को कोशिश कर रहा हूँ। हालात की नजाकत यूं है कि सोशल मीडिया की बौद्धिकता के बीच सेवानिवृत्ति मनीषियों को पिसता देख रहा हूं। यह फ़ासला लगातार बढ़ता ही जा रहा है।

दरअसल बात जौनसार-बावर क्षेत्र की है जहां समाज में समय के साथ साथ काफी बदलाव आए हैं। इस क्षेत्र में भी आज सोशल मीडिया ने विचार रखने और लोगों तक अपनी बात पहुंचाने का एक प्रभावशाली मंच उपलब्ध कराया है। यह भी अच्छी बात है। मगर यहां के बासिंदे देश के अलग अलग विभागों से जब सेवानिवृत्त होते हैं तो उनका समाजसेवा का सहारा अब सोशल मीडिया बनता जा रहा है। इस तरह ये अधिकारी, शिक्षक, बुद्धिजीवी और समाज के अनुभवी लोग अपने अनुभवों के माध्यम से क्षेत्र के विकास, शिक्षा, संस्कृति और पलायन जैसे विषयों पर चर्चा कर रहे हैं।

इधर सवाल भी उठ रहें हैं कि क्या सोशल मीडिया पर लगातार लिखना ही समाजसेवा का पर्याप्त माध्यम है? या उनके अनुभव कभी जमीनी रूप लेंगे। मुद्दा तो यही है कि जौनसार-बावर जैसे पहाड़ी और दूरस्थ क्षेत्र में इस प्रश्न पर भी गंभीरता से विचार करने लग गए है। अर्थात देखा जा रहा है कि सेवा के दौरान दूरी, सेवानिवृत्ति के बाद सक्रियता।

ज्ञात हो कि सरकारी सेवा में रहने वाले अधिकारियों और उच्च पदों पर कार्य कर चुके लोगों के पास भारी अनुभव, प्रशासनिक समझ और संपर्कों की एक बड़ी पूंजी होती है। समय रहते यदि इस अनुभव का उपयोग अपने गांव, क्षेत्र और समाज के लिए किया जाए तो उसका प्रभाव निश्चित रूप से व्यापक होगा। फलतः युवाओं को मार्गदर्शन, विद्यार्थियों को सही दिशा, जरूरतमंद परिवारों की समस्याओं को संबंधित विभागों तक पहुंचाना और गांवों की मूलभूत समस्याओं के समाधान में सहयोग, ऐसे अनेक कार्य हैं जिनमें अनुभवी लोगों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है, सहित सोशल मीडिया।

कई बार ऐसा देखा गया है कि सेवाकाल में व्यक्ति अपने मूल गांव और सामाजिक परिवेश से दूर होता चला जाता है। पर सेवानिवृत्ति के बाद अचानक वही सामाजिक सरोकार फिर से चर्चा का विषय बन जाते हैं। जिस बदलाव को गलत नहीं समझा जाता है बल्कि इसकी वास्तविक उपयोगिता पर समाज और क्षेत्र में सवाल उठाये जा रहे है।

उल्लेखनीय हो कि वही लोक सेवक जो सेवानिवृत्ति के बाद जन सेवक की भूमिका में “डिजिटल चौपाल बनाम गांव की चौपाल” का आयोजन करते दिखाई देते हैं। यानि फेसबुक, व्हाट्सएप और अन्य डिजिटल मंचों पर जौनसार-बावर के विकास, संस्कृति, पलायन और शिक्षा को लेकर लंबी लंबी चर्चाएं करते दिखाई दे रहे हैं। अतएव इस आभासी मंच पर विचार, सुझाव और क्षेत्र की समस्याओं पर चिंता व्यक्त की जा रही है। इधर आभासी दुनिया के दर्शक प्रश्न पूछ रहे हैं कि गांव की वास्तविक परिस्थितियां केवल मोबाइल स्क्रीन से नहीं समझी जा सकतीं। कुलमिलाकर आभासी दुनियां के मंच से यह सवाल बार बार आ रहे हैं कि गांव की सड़क की समस्या क्या है? विद्यालय में बच्चों और शिक्षकों की वास्तविक स्थिति क्या है? स्वास्थ्य सुविधा कितनी दूर है? किसान किन समस्याओं से जूझ रहा है? युवा रोजगार के लिए क्यों बाहर जा रहा है? इन सवालों के जवाब यही होगा कि गांव की चौपाल में बैठकर, लोगों के बीच जाकर और उनकी बात सुनकर ही बेहतर तरीके से समाधान किए जा सकते हैं।

बहरहाल डिजिटल संवाद जरूरी है, लेकिन डिजिटल संवाद जमीनी सहभागिता का विकल्प नहीं हो सकता। लाइक और कमेंट से आगे सोशल मीडिया की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि व्यक्ति की बात कुछ ही क्षणों में सैकड़ों लोगों तक पहुंच सकती है। लेकिन लाइक, शेयर और कमेंट की संख्या को सामाजिक परिवर्तन का पैमाना मान लेना ही उचित नहीं होगा। वास्तविक परिवर्तन तभी दिखाई देगा जब किसी बच्चे की पढ़ाई में मदद होगी, किसी युवा को सही दिशा मिलेगी, किसी किसान को नई जानकारी मिलगी या किसी गांव की वास्तविक समस्या के समाधान की दिशा में ठोस कदम उठये जाएंगे आदि आदि।

इसलिए सवाल यह नहीं कि कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर लिखता क्यों है। सवाल यह है कि उसके लिखे हुए शब्द जमीन पर कितना असर पैदा कर रहे हैं। वैसे भी जौनसार-बावर का समाज पहले से अधिक जागरूक है। यहां का युवा अपने भविष्य को लेकर गंभीर है। वह केवल भाषण नहीं चाहता, वह अवसर, मार्गदर्शन और सहयोग चाहता है। पूर्व अधिकारियों और अनुभवी लोगों के पास समाज को देने के लिए बहुत कुछ है। प्रशासनिक अनुभव रखने वाला व्यक्ति युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की समझ दे सकता है। शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े लोग गांवों में विद्यार्थियों के लिए मार्गदर्शन कार्यक्रम चला सकते हैं। कृषि का अनुभव रखने वाले लोग किसानों के साथ काम कर सकते हैं और सामाजिक क्षेत्र में अनुभव रखने वाले लोग गांवों में स्थानीय स्तर पर छोटी लेकिन प्रभावी पहल शुरू कर सकते हैं।

ही वह बिंदु है जहां ‘बौद्धिकता’ और ‘सामाजिक सहभागिता’ एक-दूसरे से जुड़ती हैं। कथनी और करनी की कसौटी किसी व्यक्ति के शहर में रहने पर सवाल उठाना उचित नहीं है। हर व्यक्ति को अपने जीवन की सुविधा और परिस्थितियों के अनुसार रहने का अधिकार है। इसी तरह सोशल मीडिया पर लिखना भी गलत नहीं है। कह सकते है कि कोई व्यक्ति समाज के लिए चिंतित है, तो उसके पास अपनी क्षमता और अनुभव के अनुसार कुछ करने के अवसर भी हैं। समाजसेवा के लिए हर किसी को गांव में स्थायी रूप से रहना जरूरी नहीं। जरूरी यह है कि विचार और व्यवहार के बीच संबंध हो।

अच्छा तो यही है कि सोशल मीडिया पर मुद्दा उठाया जाए कि गांव में पुस्तकालय बनाना है, किसी विद्यार्थी को मार्गदर्शन देने, युवाओं के लिए प्रशिक्षण आयोजित करने, स्वास्थ्य जागरूकता फैलाने या किसानों की मदद करने जैसी पहल को इस आभासी दुनिया के मंच से से जोड़ा जाए तो अमुक की डिजिटल सक्रियता वास्तविक सामाजिक योगदान में बदल सकती है।

यही कहा जा रहा है कि जौनसार-बावर क्षेत्र को अनुभवी लोगों से दूरी नहीं, बल्कि उनका सहयोग लेना चाहिए। सेवानिवृत्ति के बाद जीवन का यह पड़ाव केवल व्यक्तिगत आराम का समय नहीं, बल्कि वर्षों के अनुभव को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर भी हो सकता है। जरूरत इस बात की है कि हम या ‘मैंने’ समाज के लिए क्या लिखा?’ से आगे बढ़कर यह पूछे कि ‘मैंने’ समाज के लिए क्या किया?’ क्योंकि समाज को केवल सलाह देने वालों की नहीं, बल्कि साथ चलने वालों की जरूरत है।

सोशल मीडिया आज की वास्तविकता है। इसकी शक्ति को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन जौनसार-बावर की समस्याएं इतनी गहरी और जटिल हैं कि उनका समाधान केवल पोस्ट, टिप्पणी और ऑनलाइन चर्चाओं से संभव नहीं है। गांव की पगडंडी, चौपाल, विद्यालय, खेत और युवा। यही वह वास्तविक धरातल है जहां सामाजिक बदलाव की शुरुआत होती है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार है)

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128 साल पुरानी है ठाणा डांडा बिस्सू गनियात की कहानी https://researchdiary.in/bissu-mahotsaw-jaunsar/ https://researchdiary.in/bissu-mahotsaw-jaunsar/#respond Mon, 20 Apr 2026 01:57:09 +0000 https://researchdiary.in/?p=21425

Dr. Pawan Kudwan

1967 ई. में संवैधानिक जनजातीय पहचान जौनसार-बावर को प्राप्त हुई, किंतु जनजातीय मूल स्वरूप भौगोलिक एवं सामाजिक आधार अतीत से रहा. रीति-रिवाज एवं मेले पर्वों में यहां के लोक की लोक आत्मा बसती है. बिस्सू पर्व की धार्मिक एवं सामाजिक समरसता की नींव की अपनी यहां गहराई है. दुनिया के पर्यटनीय ऩक्शे पर आज इस स्थान की पहचान ‘चिरमिरी टॉप’ की है. किंतु अतीत की सांस्कृतिक इतिहास में ठाणा डांडा की जीवंतता है.निकटवर्ती ठाणा गाँव की छानियां यहां कभी हुआ करती थी. ठाणा डांडा बिस्सू गनियात जो बिल्कुल हमारे डिग्री कॉलेज चकराता के निकट है. मुझे 17 अप्रैल, 2026 को इसमें शामिल होने का अवसर मिला, फलतः जैसा मैंने देखा एवं समझा उसे प्राथमिक स्रोतों के माध्यम से अभिव्यक्त कर रहा हूँ.

ब्रिटिश राज में अंग्रेजों ने चकराता को ‘पहाड़ों का राजा’ कहा, कारण यहाँ की प्राकृतिक सौंदर्यता एवं अनुकूलित जलवायु. ठाणा डांडा से भी औपनिवेशिक इतिहास के किस्से जुड़ें है. लोक में मौखिक रूप में सुना जाता है कि अंग्रेज यहाँ हेलीपैड बनाना चाहते थे, किंतु स्थानीयता ने तब प्रतिरोध किया. यह भी लोक मान्यता हेै कि इस शानदार सपाट थात में वे निर्माण कार्य करना चाहते थे तब उन्होंने यहां तक घोड़ा मार्ग भी बना दिया था, जो आज भी मौजूद है. किंतु इसके नीचे झील अथवा पानी की संभावना होने के कारण उन्होंने अपने प्रोजेक्ट में बदलाव किया. यद्यपि लिखित संदर्भ स्रोत प्राप्त नहीं है. किंतु प्राथमिक स्रोतों से संदर्भित यह आधार है.
आइए अब बिस्सू पर्व की जनजातीय समाज में क्यों इतनी ऐतिहासिकता आधुनिक परिदृश्य में भी है. मूलतः यह पर्व कृषि की आर्थिक खुशहाली से जुड़ा है. पशुपालन एवं कृषि न केवल यहां बल्कि दुनिया की सभी आदिवासी क्षेत्रों की रीड़ रही है, जिस कारण जनजातीय लोक मानस के तीज़-त्यौहार भी प्रकृति के निकटता में हैं. सक्रांति से जौनसार-बावर की 39 खतों के गाँवों में गाँव-गाँवों में घर की लिपाई-पुताई यहाँ तक ऋतुओं के अनुरूप प्रवासी छानियों की भी, साथ ही यहां के आँगन चौरी के मंदिर में कुल देव महासू की पूजा अर्चना बुरांस के फूल एवं पारम्परिक व्यजंनों से की जाती है.

बिस्सू पर्व जौनसार बावर में बैसाखी के दिन अर्थात 13 अप्रैल 17 अप्रैल, चार -पाँच दिनों तक अलग-अलग खतों में अपनी सुविधानुसार लगता है. गांवों की भौगोलिक सपाट थात पर बिस्सू गनियात (मेला) लगता है. गनियात शब्द की प्राकृतिक ऐतिहासिकता का संदर्भ लोक में इस रूप में मिलता है. गानी का फूल एवं कोंपलें बीनने पूर्व समय में गाँव की बालिकाएं/युवतिया ऊँचे स्थानों पर जाया करती थी. यह औषधीय पौधा भी है. इन्हें बीनते-बीनते वे ऊँचें थातों (चोंटियों में) अलग-अलग गाँवों की बालिकाओं का आत्मीय भावनाओं के मेल मिलाप में एक मेला जैसा जमवाड़ा लग जाता था. इसी संकल्पना से फिर गनियात लोक में प्रचलित हुआ. स्थानीयता में इन स्थानों पर गनियात (मेले) लगते हैं, चौली थात, (अब रामताल गार्डन), चुरानी का बिस्सू, लुहन डांडा, जाखणी का बिस्सू, नगाय, चौलिक, खुरूड़ी, मागटी का डांडा, मकाबागी, लाखामण्डल मड़े के थौड़ें और ठाणे डांडे की गनियात जिसका ऐतिहासिक संदर्भ ठाणा गाँव के बीरेन्द्र जोशी जी एवं मेला समिति के उपाध्यक्ष सलिकराम जोशी जी ने सहिया में लगने वाले मौण मेले से बताया है.
इस गनियात में उपलगाँव खत एवं वनगाँव खत के गाँवों के सामूहिकवाद की एकता के अतीत के जश्न को मनाने का केन्द्र बिंदु रहा है, जो अब जौनसार-बावर की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में ख्याति प्राप्त स्थल हो गया है.
वनगाँव खत (खत से अभिप्राय अन्यत्र क्षेत्रों में इन्हें पट्टियां कहा जाता है) में रावना, पाटी, बुरांस्वा, मयरावना, शिर्बा, मैपाऊटा, टुंगरौली, घणता, कोटुवा, कोल्हा, बिसाऊ आदि गाँवों की मोईल्ला (समूह) अपने पारम्परिक गाजे-बाजे, ढोल-दमाऊं, रणसिंगें आदि वाद्य यंत्रों के साथ ठाणा डांडा गनियात में पहुंचते हैं तो उपलगाँव खत के ठाणा, टुंगरा, रिखाड़, बिरमों, कोरबा आदि गाँवों के लोग भव्यता से उनका आत्मीय स्वागत सत्कार करते हैं. अपनी पारम्परिक परिधानों में पुरुष एवं महिलाओं की टोलियों का सौन्दर्य एवं मर्यादित शालीनता में जौनसार-बावर की सांस्कृतिक पहचान अति मनभावन लगती है. इसके बाद बिस्सू गनियात में पारम्परिक गीत तांदी, रांसू, झैंता एवं जंगू गीतों से जो आकर्षण बनता है, वह मौलिक संस्कृति की मूल आत्मा की साझी धरोहरीय विरासत लगती है. लोगों के हाथों में तलवार, डांगरी घेसड़ी (विशेष प्रकार का लकड़ी का डंडा,) से लोकनृत्य किया जाता है.
बिस्सू गनियातों में जितनी तांदी, हारूलें, राँसू, जंगा बाजी (युद्ध/शौर्य गीत) लगते हैं, वे सब जनजातीय जीवनशैली से जुड़ें मौखिक परम्परा की लोक आत्मा आधारित होते हैं, जिनमें हर्ष, उल्लास, श्रृंगार के साथ भौगोलिक एवं सामाजिक जटिलताओं के साथ दुःख, वेदना की भी पुकार होती. इन गीतों में प्रकृति संरक्षण एवं कृषि प्रधानता की भावना लोक कलाकारों की सृजनता मन से उकेरी रहती है.

ठोड़ें नृत्य (तीरंदाजी/धनुष बाण युद्ध) जो गनियात का एक प्रमुख केंद्र बिंदु है. यह पराक्रम एवं कौशल साहस का प्रतीक है. विभिन्न खतों से युवा एवं वृद्धजन पूरे उत्साह के साथ पैरों में मोटा ऊनी पाइजामा पहनकर आते हैं. ठोड़ा गीत एवं वाद्य यंत्रों पर ठोड़ा गीत के ताल ढोली बजाते हैँ, रणसिंगा जो शौर्य एवं युद्ध की गूंज का प्रतीक है, गूंजता है और युवा ठोड़ा नृत्य करते हुए धनुष पर बाण चढ़ाते और गौरव के साथ अपने खानदान का परिचय देते हैं. फिर जोर से धनुष पर बाण खींचतें और दूसरे साथी जो पास में अपने दोनों पैरों को हिलाते रहते हैं पर जोर से तीर मारते हैं. निशाना पैरों पर ही लगाना होता है. ठीक फिर दूसरा साथी अपने धनुष बाण लेता और निशाना उसके पैरों पर लगाता है. इस बीच ठोऊड़ा गीत एवं ढोल की थाप के साथ वह साठी (कौरव पक्ष) या पासी (पांडव पक्ष) का यह कहता रहता है. कभी-कभी जोरदार तीर पैरों पर लगता है तो लोक में हंसी मजाक के रूप में कहा जाता है कि सावन के महिने रोपाई करते समय यदि पैरों में दर्द होता है तो अपनी जौनसारी बोली में कहते हैँ -ये लगा भौ ठोऊड़ा सुला विस्वा सुला विस्वा. मूलतः इस युद्ध कौशल एवं पराक्रम के भाव भले आज मनोरंजन के हो किंतु मुझे ऐसा लगता है कि यह क्षेत्र बाहरी आक्रांताओं की निकटता में रहा है फलतः जनजातीय समाज अपनी सुरक्षा आदि के अनुरूप अपनी पारम्परिक नींव तैयार करता था.

निष्कर्षत: ऐतिहासिक संदर्भ तब की जटिलताओं एवं भौगोलिक विषमताओं का जो भी रहा हो किंतु जौनसारी समाज ने तीज़ त्योहार एवं पर्वों के माध्यम से अपनी जीवंतता भौतिकवादी परिवर्तन के दौर में रखी हुई है. ठाणा डांडें की लगभग डेड़ किमी मीटर लम्बी चौड़ी थात में बाँझ- बुरांस एवं देवदार के बीच में सपाट थात में कई सौ गाड़ियां एवं हजारों लोगों की भीड़ जो हिमाचल, बावर, रवांईं, जौनसार जौनपुर एवं गढ़वाल आदि क्षेत्रों की उमंगता उत्साह आज के पलायनवादी स्वरूप में एक बड़ी आश एवं उम्मीद जगाती है.

जौनसारी संस्कृति में सांस्कृतिक जीवंतता वाद्य यंत्रों की विरासत से है. गनियात समाप्ति पर वनगाँव के ढोलियों/बाजगियों को बड़ें मान सम्मान से विदाई दी जा रही थी. इस भावनात्मक दृश्य में मुझे आकर्षित किया. बिना इनके यहां का सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन की जीवंतता सम्भव नहीं है. यमुना घाटी की जौनसारी लोक संस्कृति में लोक नृत्यों में सामूहिकवाद एवं शानदार सांस्कृतिक अनुशासन दिखता है, यही इस मौलिक संस्कृति की मूल विशेषता है. जो अन्य संस्कृतियों हेतु प्रेरणादायी भी है.

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भावना और एक विशेष अवसर का प्रतीक है – उलुऐ https://researchdiary.in/jaunsari-pakwan/ https://researchdiary.in/jaunsari-pakwan/#respond Wed, 13 Aug 2025 08:15:59 +0000 https://researchdiary.in/?p=20034

By Dr. Leela chauhan

भारत की विविधता में छिपे ग्रामीण व्यंजन हमारी सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा हैं। इन्हीं में से एक है उलुऐ, जिसे जौनसार बावर में “सभी व्यंजनों का राजा” कहा जाता है। यह केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि एक परंपरा, एक भावना और एक विशेष अवसर का प्रतीक है। खासकर तब जब बेटी मायके आती है, तो उलुऐ बनाना उसके स्वागत और प्रेम को दर्शाने का माध्यम बन जाता है। हर त्योहार में उलुऐ का बनना अनिवार्य सा है। यह व्यंजन परिवार के जुड़ाव, मेहनत, सहयोग और स्वाद का मेल है। इसके स्वाद के साथ भावनाएँ जुड़ी होती हैं ।

बनाने की जटिल और श्रमसाध्य प्रक्रिया:

उलुऐ को बनाने की प्रक्रिया बहुत कठिन और समय लेने वाली होती है। धुले चावल के आटे और उसके साथ कुछ मात्रा में गेहूं आया झोगारा डालते है इस आटे को ‘उलाड़ि’ कहा जाता है।

इसे बनाने की तीन प्रमुख विधियाँ हैं:


पहली विधि:

इस विधि में आटे को गूंथकर मोटी रोटियाँ बनाई जाती हैं। इन रोटियों को कुछ सेकंड गरम तवे पर सेंका जाता है। फिर उबलते पानी के ऊपर लकड़ी के सहारे रखकर भाप दी जाती है। इस प्रक्रिया में रोटी की बाहरी परत कुरकुरी हो जाती है और उसमें कैरेमेलाइजेशन के कारण हल्ला मीठापन आ जाता है।
करीब 20 मिनट तक स्टीम करने के बाद, रोटियों को परात में डालकर गरम-गरम ही लोटे या गिलास से गूंथा जाता है ताकि मिश्रण पूरी तरह एकसार हो जाए। फिर उसे कुछ समय के लिए ढककर रखा जाता है जिससे वह मुलायम हो जाए। इसके बाद गोले बनाए जाते हैं, जिनमें स्टफिंग भरकर दूसरी रोटी से ढक दिया जाता है। इस रोटी को नींबू या हल्दी के पत्तों से ढककर फिर से भाप में 30–40 मिनट पकाया जाता है और उसके बाद निकाल देते है अब इसका रंग हल्का पीला हो जाता है। पक जाने के बाद इसे घी के साथ परोसा जाता है।

दूसरी विधि:

इसमें चूल्हे पर बर्तन में पानी को उबाला जाता है। फिर धीरे-धीरे उसमें आटा डालते हैं और लकड़ी के हत्ते से लगातार हिलाते रहते हैं ताकि गुठलियाँ न बनें। यह प्रक्रिया 10-15 मिनट लगभग तक चलती है। इसके बाद इस मिश्रण को परात में डालकर गरम-गरम गूंथा जाता है।


स्वाद के प्रकार:

उलुऐ दो प्रकार के होते हैं:
1. नमकीन उलुऐ – इसमें उड़द या मसूर की दाल को भिगोकर सिलबट्टे पर दरदरा पीसा जाता है और उसमें नमक, मिर्च, धनिया मिलाकर स्टफिंग तैयार की जाती है।
2. मीठा उलुऐ – इसमें पोस्ता दाना , अखरोट और बंगजीर को पीसकर उसमें गुड़ का पाउडर या चीनी को मिलाया जाता है। इसका स्वाद विशेष रूप से त्योहारी अवसरों के लिए उपयुक्त होता है।

वैज्ञानिक पहलू:

पोषण मूल्य – चावल और गेहूं ऊर्जा के स्रोत हैं, दाल प्रोटीन देती है, और औखरोट आदि बीज ओमेगा-3, कैल्शियम, मैग्नीशियम व एंटीऑक्सीडेंट प्रदान करते हैं। गुड़ से आयरन मिलता है।
पकाने की तकनीक – भाप में पकाने से पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं और स्टार्च जेलैटिनाइज होकर आसानी से पचने योग्य बन जाता है। तवे पर सेंकने से Maillard Reaction होती है, जो हल्का मीठा, गहरा स्वाद देती है। स्वास्थ्य लाभ – यह हल्का, कम तैलीय, उच्च फाइबर व संतुलित अमीनो एसिड वाला व्यंजन है, जो पाचन सुधारता है और ऊर्जा देता है।

डॉ लीला चौहान वैज्ञानिक है

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