laxami prasad badoni – Research Diary https://researchdiary.in Research Diary Sat, 25 Oct 2025 14:44:40 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1 https://i0.wp.com/researchdiary.in/wp-content/uploads/2023/07/cropped-Research-Diary-Logo.jpeg?fit=32%2C32&ssl=1 laxami prasad badoni – Research Diary https://researchdiary.in 32 32 230867523 सकारात्मकता का संदेश देती हैं दर्द गढ़वाली की ग़ज़ले। https://researchdiary.in/laxami-prasad-badoni-gajalen/ https://researchdiary.in/laxami-prasad-badoni-gajalen/#respond Sat, 25 Oct 2025 14:44:40 +0000 https://researchdiary.in/?p=20616

सकारात्मकता का संदेश देती हैं दर्द गढ़वाली की ग़ज़ले।

By – Sunil Sahil

‘उजाले बांटते रहना’ क्या ही खूबसूरत उनवान है, जो सिर्फ समाअत को नहीं, रूह को भी सुनाई देता है। यह किताब दर्द गढ़वाली साहब की चौथी किताब है। पहली किताब ‘तेरे सितम तेरे करम’ जोकि 2013 में आई और उसके बाद दो किताबें 2023 में आईं, जिनके उनवान ‘धूप को सायबां समझते हैं’ और ‘इश्क-मोहब्बत जारी रक्खो’ हैं। सभी उनवान अपने आप में परिपूर्ण हैं। बामआनी है, एक पैगाम है।

इस किताब की इब्तिदाई ग़ज़ल के 2 शेर देखिएगा:
उजाले बांटते रहना
हवा को साधते रहना
मुसीबत में डटे रहना
शजर जैसे खड़े रहना
क्या ही खूबसूरत संदेश इन अशआर के जरिए दिया है। कैसी भी परिस्थिति आए हौसलों को छोड़ना नहीं है। हवा के रुख को देखते-परखते रहना है यानी पॉजिटिविटी का सकारात्मकता का दामन किसी भी हालत में नहीं छोड़ना है।
इससे खूबसूरत किताब की शुरुआत और क्या हो सकती है। इस ग़ज़ल को पढ़ने के बाद यक़ीनन किताब के बाकी पन्नों को पढ़ने पर आप मजबूर होंगे। यानी पाठक का सफर इस किताब के आखिरी पन्ने तक पहुंचने में हसीन और पुरलुत्फ़ रहेगा।
इस पहले कलाम से आगे बढ़ता हूं तो एक बहुत अहम बात मेरी नजर में आती है कि दर्द गढ़वाली साहब ने ज्यादातर कलाम छोटी बहरों में कहे हैं। छोटी बहर में ग़ज़ल कहना कोई मुश्किल काम नहीं है, मगर छोटी बहर में मेयारी ग़ज़ल कहना बहुत बड़ा काम है, बहुत मुश्किल काम है, जो दर्द गढ़वाली साहब ने बहुत खूबसूरती और आसानी के साथ किया है।
दर्द साहब से मेरा परिचय कोई बहुत पुराना नहीं है। मुशायरों और नशिस्तों में ही आपसे मुलाकात हो पाती है, लेकिन इस किताब के हवाले से आपसे रु ब रु एक तवील मुलाकात हुई। ख़ूब बातचीत हुई। दर्द गढ़वाली साहब एक बहुत ही हस्सास तबीयत और उसूल पसंद इंसान हैं। बहुत खुद्दार हैं, यही खासियत आपकी शायरी में साफ झलकती है। शायरी से आपका बहुत गहरा रिश्ता है, जिसके गवाह ये अशआर देखिए:

शेर कहने की जसारत कर रहा हूं
शायरी की मैं तिलावत कर रहा हूं

तिलावत लफ्ज़ ने ही शेर को एक अलग मेयार अता किया है। तिलावत यानी पाठ, जो कि धार्मिक पुस्तकों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। जैसे कुरआन की तिलावत करना यानी दर्द साहब के लिए शायरी किसी अनुष्ठान से कम नहीं है।

दूसरा शेर देखिए

शेर कहने का सलीका आ गया है
हाथ में जैसे खजाना आ गया है

वाकई दर्द साहब के लिए शायरी इबादत जैसी है और इनके अशआर किसी खजाने से कम नहीं। ‘उजाले बांटते रहना’ जैसी किताब पाठकों के लिए भी चरागे-राह साबित होगी और अदबी दुनिया को रौशन करती रहेगी।

थोड़ा आगे बढ़ने पर और भी बहुत से रंग मुझे इस किताब में खुलते हुए या यूं कहिए खिलते हुए नजर आए, क्योंकि दर्द साहब पत्रकार हैं। समाज के सभी पहलू आपकी नजर से गुजरते रहे हैं तो उनका असर भी आपकी शायरी पर साफ-साफ देखा जा सकता है, जहां समाजी तल्खियां हैं। तमाम मसअले हैं, वहीं उनके हल भी आपकी शायरी में नजर आते हैं। शेर देखें:

समाजी तरक्की भी होगी यकीनन
खुदा के लिए बेटियों को पढ़ाना
लगेगी तुम्हें खूबसूरत यह दुनिया
ज़रा अपने ज़हनों से जाला हटाना

दर्द साहब की तमामतर शायरी इसी क़बील की रहनुमाई करती है। हर ग़ज़ल में कोई न कोई संदेश जरूर दिया गया है।
आपने नए रदीफ़ अर काफियों पर भी बहुत काम किया है। मिसाल के तौर पर उनके ये अशआर देखिए। वैसे पूरी ग़ज़ल लाजवाब है और मेरी पसंदीदा है
शेर देखें
क्या-क्या चीजें रख रक्खी थी बक्से में
बंद पड़ी थी यादें सारी बक्से में
बाहर आने को आतुर थे कुछ किस्से
मच रक्खी थी मारामारी बक्से में

मच रक्खी की जगह यहां पर मची हुई भी कहा जा सकता था, मगर जिस खूबसूरती से यहां इलाकाई जबान का इस्तेमाल हुआ है वो लाजवाब है जो शेर को एक सादगी, भोलापन अता कर रहा है। इस तरह की छोटी-छोटी चीज़ें दर्द साहब को दूसरे शायरों से अलग बनाती हैं। ये मुंफरिद असलूब मुंफरिद
लबो लहजा आपकी शायरी का खासा है। मेरा दावा है आप इस ग़ज़ल के किसी भी शेर को नज़रअंदाज़ नहीं कर पाएंगे।
किताब में एक मतले पर मेरी निगाह पड़ी, जिसको यहां पढ़ना मेरी जिम्मेदारी हो जाती है। आज के इस दौर में जब हर तरफ रिश्तों की पामाली के चर्चे होते हैं वहीं दर्द साहब का ये शेर एक उम्मीद एक भरोसा पैदा करता है मतला देखिए:
कर्ज़ जो था चुक गया सारा हमारा
काम आया आख़िरश बेटा हमारा
रिश्तों के मानी बताता हुआ ये शेर सीधा दिल में उतर जाता है। यानि खून के रिश्तों से इन्हिराफ नहीं किया जा सकता और करना भी नहीं चाहिए।

जैसे-जैसे मैं किताब के पन्ने पलटता गया एक बात तो साफ होती गई कि छोटी बहरों पर दर्द साहब को उबूर हासिल है। कमाल हासिल है
आपका ये सूफियाना अंदाज भी देखिए

झूठों का संसार है बाबा
सच कितना लाचार है बाबा

कितना फक्कड़पन है इस शेर में ,,,यही फ़कीराना अंदाज शेर को आसमान की ऊंचाइयां बख़्श रहा है।

हालांकि किताब के हर शेर पर तो तब्सिरा नहीं किया जा सकता है, फिर भी मैंने अलग-अलग रंग के कुछ अशआर चुने हैं, जो हाजिर कर रहा हूं
दर्द साहब का ये रंग भी देखिए:

क्या बताएं हम तुम्हें क्या होरिया है,,
ये बिजनौरी रंग है और शेर क्या ही गजब के हैं।

क्या बताएं हम तुम्हें क्या होरिया है,,
देखिए जिसको भी यारो रोरिया है
‘दर्द’ हम ही अश्क क्यों अपने बहाएं
ठीक है जैसा भी जो भी होरिया है

मिज़ाह के रंग में ये संजीदा ग़ज़ल लाजवाब और दिल को छूने वाली है। आपका ये अंदाज भी ग़ज़ब है और कामयाब है।

आगे बढ़ता हूं शेर देखिएगा:

इक नज़र डाले न कोई सरसरी भी
बहर से ख़ारिज हुई क्या ज़िंदगी भी
कोई सोचे कोई समझे कोई बूझे
कोई तो देखे हमारी बेबसी भी

यानी नजरअंदाज़ होना इंसान की ज़िंदगी का सबसे बड़ा कर्ब है। सबसे बड़ा दुख है। आज आपाधापी के इस दौर में शायद ही कोई विरला ही इस कर्ब से बचा होगा। सभी कभी न कभी इस दर्द से ज़रूर गुजरे होंगे।
ये ग़ज़ल वाकई दिलो दिमाग को झिंझोड़ती है। दर्द साहब हर लिहाज़ से दादो तहसीन के मुस्तहिक़ हैं
आजकल नई पीढ़ी रिवायती शायरी से हट कर एक नई राह बनाने पर लगी हुई। मंचीय परफार्मेंस का भी मुशायरों में बड़ा रोल है। शोहरत की तलब और पैसे की भूख कहीं न कहीं ग़ज़ल का तो नुकसान कर ही रही है। शायरी का अनुशासन और तहज़ीब की अज़मत दोनों मजरूह हुए है।
दर्द साहब की शायरी में भी नए तजरबात देखने को मिले हैं।
एक शेर देखिए
ज़ख्म भरने की जगह यारो हरा होगा सुनो
ज़ख्म अपना ये किसी को भी दिखाने का नईं

नुदरत के लिए यहां लफ़्ज़ नहीं की जगह नईं का इस्तेमाल हुआ है। आने का नईं जाने का नईं ,ये मुंबईया अंदाज है, जिसको आजकल शोअरा ख़ूब अपना रहे हैं। दर्द साहब ने भी ये तजरबा किया है जबकि बहर के एतबार से नहीं लफ़्ज़ जामेअ और पुख्ता है। ग़ज़ल के सभी शेर बेहतरीन हुए हैं।
एक और ग़ज़ल ने मुझे बेहद मुतास्सिर किए उसके अशआर देखिएगा:

चैन से बैठे नहीं हैं एक लम्हा भी कभी
ढूंढते ही रह गए हम ज़िंदगी भर ज़िंदगी

असरे हाज़िर का ये सबसे बड़ा दुख इंसान ढोने पर मजबूर है। वक्त की रफ्तार और आदमी को अपना वजूद बचाने की होड़ इस क़दर बढ़ गई है कि ज़िंदगी कब गुज़र जाती है पता ही नहीं चलता और जब होश आता है तो सफ़र तमाम होने को होता है। सिवा हाथ मलने के कुछ नहीं बचता
दूसरा शेर इस ग़ज़ल का

सब अंधेरे के थे शैदा मांगते किससे भला
कोई देता भी कहां से मुझको बोलो रौशनी

क्या ही खूबसूरत शेर है यानी ज्यादातर लोग नेगेटिव हैं, किससे आप पॉजिटिविटी
की उम्मीद रखेंगे। इस माहौल के इस क़दर आदि हो गए हम इसका अब किसी से कोई शिकवा-शिकायत भी नहीं:

ये ग़ज़ल भी पुख्तकारी के साथ कही गई है
मुझे लगता है किताब के तआरूफ के लिए इतना तबसरा काफी है।
आपको दर्द साहब की शायरी को पढ़ने की कुछ प्यास जरूर जगी होगी।
अब आते है आखिरी पायदान पर आखिरी मरहले पर,,, यानी कनक्लूजन, उपसंहार,,इख्तेताम,
दर्द साहब ने अपनी जिंदगी के 33 कीमती साल सहाफत को,, पत्रकारिता को नज़्र किए है और उसके बाद समाज से जुड़े रहने की आदत और ख्वाहिश ने इन्हें साहित्य की ओर मोड़ दिया। दर्द साहब ख़ूब शेर कहते है भरपूर शायरी करते हैं ,एक मेच्योर उम्र में बालिग उम्र में आपने शायरी का दामन थामा और अपनी राह चल पड़े। चंद ही बरसों में चार किताबों का छपना उनकी शेरी सलाहियतों का सुबूत है। आप सोशल मीडिया से भी लंबे समय से जुड़े हुए हैं, जहां कई ग्रुप्स शायरी के तकनीकी पहलुओं पर काम कर रहे हैं और अरूज की जानकारी भी साझा करते है। दर्द साहब ने जो भी हासिल किया है अपनी मेहनत से जिद से जुनून से किया है, उन्होंने शायरी के लिए कभी किसी को अपना उस्ताद नहीं बनाया है। ये बात उनके कलाम से भी अयाँ होती है, चूंकि आप हिंदी के हल्के से आते हैं, इसलिए उर्दू के बोलने में ,,,,तलफ़्फ़ुज़ में कहीं-कहीं खामी होती है, जिसे आप खुले दिल से खुद भी कबूल करते हैं, इसके बावजूद दर्द साहब की शायरी के रंगों आहंग पर कोई खास असर नहीं पड़ता है।
आखिर में मैं तो सिर्फ यही कहूंगा कि आप बेहतरीन शायर हैं ,,खूब शेर कहते हैं। ग़ज़ल में हर काफ़िए पर शेर कहने की कोशिश करते हैं।
इसलिए, ग़ज़ल का हुस्न संवारने के लिए उसे बेहतरीन अशआर का पैकर अता करें ,,यानी ग़ज़ल कहने के बाद उसे दोबारा आलोचक की दृष्टि से जरूर चेक किया करें, ताकि उसमें कोई खामी न रहे और ग़ज़ल का हुस्न निखर कर सामने आए,,


दोस्तो ‘उजाले बांटते रहना’ वो तख़लीक़ है, जिसे आप अगर वाकई सुखन शिनास है तो नजरअंदाज नहीं कर सकते। मेरी तमाम दुआएं दर्द गढ़वाली साहब के लिए हैं, ईश्वर उन्हें उनकी मेहनतों का भरपूर इनआम दे। इसी तरह आगे भी उनकी किताबें आती रहें, सुखन की राह पर वो अपना बुलंदो बाला मक़ाम हासिल करें और अपने दोस्तों को भी रश्क करने का मौका फ़राहम करते रहें।

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