– जैविक खेती का मुख्य उद्देश्य उत्तराखंड को कृषि आधारित, प्रदूषण मुक्त, स्वास्थ्य वर्धक एवं स्वावलंबी राज्य बनाने की ओर अग्रसर करना था।
– स्थानीय उपलव्ध प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते हुए स्थानीय वेरोजगार युवाओं को रोजगार से जोड़ना तथा सीमांत एवं लघु सीमांत गरीब कृषकों की उपज को जैविक मोड़ में ला कर उनकी आर्थिक स्थिति सुधारना था।
-जैविक खेती के नाम पर विभिन्न योजनाओं यथा कृषि विकास योजना , परंपरागत कृषि विकास योजना आदि में आवंटित बजट जिससे कृषकों की आर्थिक मदद करनी थी, विभागों ने केवल और केवल निम्न स्तर के बीज दवा , खाद व अन्य सामग्री उच्च दामों में क्रय कर किसानों को मुफ्त में वांट रहे है*
– विभागों द्वारा क्रय इन जैविक दवा खाद बीजों का प्रयोग कोई भी कृषक नहीं करता। कुछ समय तक ये निवेश सरकारी स्टोरों में पढ़ें रहते हैं बाद में सड़कों के किनारे या गाढ़ गधेरों में पढे मिलते हैं।
– परम्परागत कृषि विकास योजना के अंतर्गत PGS प्रणाली द्वारा प्रमाणीकरण हेतु निर्धारित मानकों का अनुपालन होता हुआ दिखाई नहीं देता, कई स्थानों में ग्रामीणों को पता ही नहीं होता कि उनका जैविक खेती हेतु पंजीकरण हो रखा है। ग्रामीणों को पता ही नहीं है कि उनको प्रशिक्षण देने हेतु सपोर्टिग एजेंसी व विभाग हैं कृषकों की लगातार बैठकें करना तो बहुत दूर की बात है।
-उत्तराखंड जैविक उत्पाद बोर्ड के अनुसार प्रदेश में पांच साल में आर्गेनिक खेती का क्षेत्र फल 2.3 प्रतिशत से बढ़कर 34 प्रतिशत हुआ है। आर्गेनिक खेती के तहत 2.20 लाख हेक्टेयर क्षेत्र फल है इसमें 80 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में आर्गेनिक खेती को थर्ड पार्टी प्रमाणीकरण किया गया है जबकि 1.40 लाख हेक्टेयर पर पी जी एस प्रतिभूति प्रमाणीकरण प्रणाली द्वारा प्रमाण पत्र मिल चुके हैं।
– राज्य में कृषि एवं उद्यान विभाग के नौकरशाहों व दलालों के संगठित भ्रष्टाचार (माफिया) के कारण जैविक खेती दम तोड़ती नजर आ रही है।
-समाचार पत्रों एवं मीडिया में जागरूक पत्रकारों एवं नागरिकों द्वारा राज्य में जैविक खेती की कार्य प्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगाये हैं।
जैविक खेती के नाम पर हो रहा फर्जीवाड़ा।
पारंपरिक कृषि विकास योजना में झोल।
पारंपरिक कृषि विकास योजना में नहीं रहा गाइड लाइन का अनुपालन
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