-जिन सपनों को लेकर पहाड़ी राज्य की स्थापना की गई थी वे सपने, सपने बन कर ही रह गए हैं।
-योजनाओं में हजारों करोड़ों रुपए खर्च करने पर भी, जिन गरीब आमजन के नाम पर योजनाएं बनती हैं , वह अपने आप को विकास की दौड़ में वहीं खड़ा पाता है जहां 25 साल पहले खड़ा था।
– जब तक योजनाओं में धनराशि आवंटित होती रहती है तब तक ही योजनाओं को लेकर शोर शराबा किया जाता है जो सुनाई भी देता है।
– योजनाओं में कमी नहीं है कमी है ईमानदारी से योजनाओं में राज्य की भौगोलिक स्थिति के अनुसार सुधार कर पारदर्शिता से क्रियान्वयन की।
ग्रामीण विकास योजनाओं के नाम पर आपको –
पिरूल से रोजगार ,पिरूल से कोयला, पिरुल से ऊर्जा,पिरूल से बनेगी जेविक खाद और मशरूम उत्पादन भी होगा, पिरूल लाओ, पैसा पाओ, सोलर एनर्जी, जैतून का तेल, लैमन ग्रास, जिरेनियम का तेल, जैट्रोफा बायो डीजल, लैन्टाना कुटीर उद्योग, रामबांस रेसा विकास, भीमल रेसा, बांस विकास, भांग की खेती ,चारा विकास, कुक्कुट पालन, ब्रायलर, क्कड नाथ कुक्कुट उत्पादन, ईमू (EMU) पालन, डेरी विकास, मतस्य पालन, ट्राउट मछली पालन, अंगोरा विकास, मौन पालन, चाय बागान विकास, रेशम उत्पादन, मशरूम उत्पादन, फूलों की खेती, ग्लेडियोलाइ, लीलियम की खेती, सेब मिशन योजना, जड़ी बूटी विकास, फूड प्रोसेसिंग यूनिटों की स्थापना , एग्रीविजनैस ग्रोथसेन्टर, चक्कबन्दी, जैविक खेती , पारम्परिक खेती, Sustainable development, निरंतर विकास,वायो डाइवर्सिटी, जीरो बजट खेती , संरक्षित खेती , हाइड्रो फोनिक ( पानी में खेती) , टिशु कल्चर ,बीज ग्राम, चारधाम यात्रा में जैविक प्रसाद वितरण योजना,अटल आदर्शग्राम,चाल खाल ,रेनवाटर हार्वेस्टिग,जल संरक्षण व जल संवर्धन ,जैविक प्रदेश, आयुष प्रदेश, ऊर्जा प्रदेश,पर्यटन प्रदेश आदि सुने सुनाए शब्द सुनाई देंगे।
योजनाऔ को अमली जामा पहनाने हेतु ज्ञान प्राप्त करने लिए- विदेश भ्रमण , प्रचार प्रसार – विज्ञापनौं पोस्टरौं होर्डिंग व सड़कों के किनारे बने पिलरौं पर लिख कर खूब किया गया। Laminated साहित्य भी खूब छपे 3/5 स्टार वाले होटलौं में जागरूकता व विकास गोष्ठियों , Buyers & Seller Meet, प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण /लाभार्थियों का प्रशिक्षण, मेले व सम्मेलनों का आयोजन किया गया साथ ही योजनाओं के अनुसार विधिवत मशीनें व उपकरणों ( जो बाद में सड़कों के किनारे या कमरों में जंक खाते हुए दिखाई देते हैं) तथा अन्य निवेशौ की खरीद फरोक्त भी खूब हुई । योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी आम जन जिनके लिए योजनाएं बनाई गई है अपने आप को विकास की दौड़ में वहीं खड़ा पाता है जहां पहले था।
काल्पनिक / फर्जी आंकड़े दर्शा कर राज्य को कई राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय एवार्ड भी मिले हैं साथ ही राज्य में फर्जी प्रमाण पत्रों के आधार पर अच्छे विकास कार्य करने पर कई गैर सरकारी संगठनों (NGO) व उनका संचालन कर रहे महानुभावों को भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा गया है।
इस सब के बावजूद प्रदेश के 16793 गांवों में से तीन हजार से अधिक गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं बहुत से गांव में गिनती के ही लोग रह रहे हैं। ढाइ लाख से अधिक घरों में ताले लटके हुए हैं देख रेख के अभाव में ये घर खण्डहरों में तब्दील हो रहे हैं।
पहाड़ी क्षेत्रों से पलायन मूलभूत सुविधाओं का अभाव व अन्य कारणों से हो रहा हो किन्तु क्षेत्र के लोगों के आर्थिक विकास/ पलायन रोकने के लिए बनी योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार , जंगली जानवरों से फसलों की सुरक्षा के कारगर उपाय न होना लोगों के पलायन के मुख्य कारण है।
विभागों द्वारा विकास के नाम पर जिला योजना, राज्य सेक्टर की योजना, केंद्र पोषित योजना,वाह्य सहायतित योजनाओं में हजारों करोड़ों रुपए का बजट प्रति बर्ष विकास योजनाओं पर खर्च किया जा रहा है। आम जनता का विकास तो नहीं दिखाई देता हां राजनेता नौकरशाह सप्लायरों (दलालों) व गैर सरकारी संगठनों के संस्थापकौं/ संचालकों का खूब आर्थिक विकास हुआ।
जब तक योजनाओं में धन राशि आवंटित होती रहती है तब तक योजनाओं का काफी शोर गुल दिखाई/सुनाई देता है योजना बन्द होते ही बाद में योजनाओं में क्रय की गई मशीनों के अवशेष वह योजना के बोर्ड ही दिखाई देते हैं।
*कृषकों द्वारा कुछ जनपदों में जिला अधिकारी व मुख्य विकास अधिकारियों की सक्रियता के कारण विकास मौडल स्थापित किए हैं ऐसे मौडल पहाड़ी जनपदों में 5 से 10 प्रतिशत ही है योजनाओं के मूल्यांकन में इन्हीं को दिखा कर विभाग वाले अपनी पीठ थपथपाते रहते हैं*।
राज्य बनने पर आश जगी थी कि विकास योजनायें राज्य की विषम भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार बनेंगी किन्तु राज्य को दृढ़ इच्छाशक्ति व दक्ष नेतृत्व न मिल पाने के कारण जिसका प्रशासकों ने पूरा लाभ उठाया योजनाएं वैसे ही चल रही है जैसे उतर प्रदेश के समय में चल रही थी। राज्य के भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार योजनाओं में सुधार नहीं हुआ।
योजनाओं में कमी नहीं है कमी है ईमानदारी से योजनाओं में सुधार कर क्रियान्वयन की। योजनाएं नई नहीं है राज्य में हर दस पन्द्रह सालों बाद पुरानी योजनाओं को चमत्कार के रूप में दिखा कर फिर से दोहराया जाता है। किसी ने कभी भी इन योजनाओं का इतिहास जानने की कोशिश नहीं की कि पहले इन योजनाओं से अपेक्षित लाभ क्यों नहीं मिला।
सरकारै नई आती है किन्तु उत्तराखंड के अधिकतर तथा कथित बुद्धि जीवी सलाहकार पुराने ही होते हैं। कोई भी सरकार आये ये तथा कथित बुद्धिजीवी अपनी जगह नई सरकार में बना ही लेते हैं तथा इन बुद्धिजीवियों की सोच यहीं तक है ये बुद्धिजीवी अपने विषय को छोड़ कर अन्य सभी विषयों की जानकारी सरकार को देते हैं। यदि इन बुद्धिजीवियों का पुराना इतिहास याने पढ़ाई-लिखाई टटोली जाय तो आप पाएंगे जिस बिषय पर ये सरकार को सलाह देते हैं वह इनका पढ़ाई लिखाई का विषय था ही नहीं
विभाग योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए कार्ययोजना तैयार करता है कार्ययोजना में उन्हीं मदों में अधिक धनराशि रखी जाती है जिसमें आसानी से संगठित /संस्थागत भ्रष्टाचार किया जा सके या कहैं डाका डाला जा सके।
योजनाओं के क्रियान्वयन में भ्रष्टाचार की कई बार शिकायतें हुई जांच भी हुई कई दोषी भी पाये गये, जैट्रोफा बायो फ्यूल घोटाला, ढैंचा बीज घोटाला , लहसुन बीज व अदरक बीज घोटाला, पौली हाउस घोटाला, मटेला कोल्ड स्टोरेज घोटाला आदि कई चर्चित घोटाले उजागर हुये किन्तु प्रभावी दणडात्मक कार्यवाही किसी पर नहीं हुई सभी को सम्मान पूर्वक बरी कर दिया गया।
विभागों का काम केवल व केवल योजनाओं में आंवटित बजट से निम्न स्तर का सामान उच्च दामों में क्रय कर कृषकों को अनुदान पर वितरित करना ही है। योजनाओं के माध्यम से राज्य को कभी भी आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास नहीं किया गया।
योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए बनी गाइड लाइनों, पारदर्शिता हेतु जारी शासनादेशों एवं एक्टों का विभागों द्वारा अनुपालन नहीं किया जाता।
यदि विभाग को/शासन को सीधे कोई सुझाव/शिकायत भेजी जाती है तो कोई जवाब नहीं मिलता, प्रमाण सहित शिकायत करने पर शिकायत शपथपत्र में लिख कर देने को कहा जाता है , शपथपत्र में की गई शिकायती पत्र जांच हेतु उसी को भेज दी जाती है जिसकी शिकायत की जाती है।माननीय प्रधानमंत्री जी /माननीय मुख्यमंत्री जी के समाधान पोर्टल पर सूझाव शिकायत अपलोड करने पर शिकायत शासन से संबंधित विभाग के निदेशक को जाती है वहां से जिला स्तरीय अधिकारियों को तथा बाद में फील्ड स्टाफ को। विभागों से जवाब मिलता है कि कहीं से कोई लिखित शिकायत कार्यालय में दर्ज नहीं है सभी योजनाएं पारदर्शी ठंग से चल रही है।
उच्च स्तर पर योजनाओं का मूल्यांकन सिर्फ इस आधार पर होता है कि विभाग को कितना बजट आवंटित हुआ और अब तक कितना खर्च हुआ।
राज्य में कोई ऐसा सक्षम और ईमानदार सिस्टम नहीं दिखाई देता जो धरातल पर योजनाओं का ईमानदारी से मूल्यांकन कर योजनाओं में सुधार ला सके।
योजनाओं में भ्रष्टाचार न पहले की सरकारौ को दिखाई दिया और न ही वर्तमान भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस कहने वाली सरकार को।
चल रही योजनाओं का ईमानदारी से मूल्यांकन कर योजनाओं में राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार सुधार ला कर यदि पारदर्शी ढंग से क्रियान्वयन किया जाय तो आम जन तक योजनाओं का लाभ पहुंच सकता है वरन विकास के लिए फिर से पांच साल बाद नई सरकार- इसी मृगतृष्णा में राज्य वासी जीते रहेंगे।
उत्तराखंड रजतजयंती वर्ष 2025 की आप सबको हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
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पुस्तक लोकार्पण
"मॉं जिसके गोद में सभ्यताएं पलीं"
लेखक - राम प्रकाश अग्रवाल कण, प्रकाशन - समय साक्ष्य (देहरादून)
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