देहरादून में हुई षोडश संस्कार प्रयोगात्मक प्रशिक्षण कार्यशाला।
By – Desk
उत्तराखंड संस्कृत संस्थानम द्वारा आयोजित षोडश संस्कार प्रयोगात्मक प्रशिक्षण कार्यशाला का समापन हो गया है।
इस दौरान उपस्थित अतिथियों ने भारतीय संस्कृति में षोडश संस्कारों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संस्कार भारतीय जीवन पद्धति की मूल आत्मा हैं। ये संस्कार मनुष्य के जन्म से लेकर जीवन के विभिन्न महत्वपूर्ण चरणों में उसे आध्यात्मिक, नैतिक और सामाजिक रूप से परिष्कृत करने का कार्य करते हैं। उन्होंने कहा कि आज के समय में संस्कारों की वैज्ञानिकता और प्रासंगिकता को समझना तथा समाज तक पहुँचाना अत्यंत आवश्यक है।
संस्कृत शिक्षा के सचिव दीपक गैरोला ने अपने संबोधन में कहा कि आयोजित इस प्रकार की प्रयोगात्मक कार्यशालाएँ संस्कृत एवं भारतीय परंपरा के संरक्षण और संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। उन्होंने प्रशिक्षुओं से आग्रह किया कि वे इस प्रशिक्षण से प्राप्त ज्ञान और अनुभव को समाज में प्रसारित करें तथा भारतीय संस्कृति की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाने में योगदान दें।
उन्होंने बताया कि उत्तराखंड संस्कृत शिक्षा विभाग के अंतर्गत उत्तराखंड संस्कृत संस्थानम/विश्वविद्यालय/निदेशालय द्वारा संस्कृत शिक्षा के विकास हेतु सतत प्रयास किये जा रहे हैँ. श्री गैरोला ने संस्कृत शिक्षा विभाग के द्वारा प्रदान की जाने वाली विभिन्न योजनाओं से सभी को अवगत करवाया। कहा कि बालिकाओं हेतु गार्गी छात्रवृत्ति योजना, अनुसूचित जाति/जनजाति हेतु डॉ भीमराव अंबेडकर छात्रवृत्ति योजना, संस्कृत विद्यालयों में गणित-विज्ञान विषय की शुरुआत जिससे आने वाले समय में संस्कृत के छात्र भी JEE/NEET की परीक्षा दे सकें, प्रत्येक जिले में एक संस्कृत ग्राम, संस्कृत विषय से सिविल सेवा दे रहे विद्यार्थियों हेतु फ्री IAS कोचिंग, संस्कृत में AI, संस्कृत संभाषण शिविरों का आयोजन इत्यादि योजनाओं के बारे में जानकारी दी। जबकि भविष्य में मंत्र चिकित्सा, प्रज्ञा चक्षु विद्या / वैदिक मानस योग जैसी अनेकानेक योजनाओं पर कार्य करने के बारे में भी जानकारी साझा की है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही कुसुम कंडवाल ने कहा कि षोडश संस्कार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि ये व्यक्ति के जीवन को अनुशासित, संस्कारित और सामाजिक रूप से उत्तरदायी बनाने का माध्यम भी हैं। उन्होंने इस प्रकार की प्रशिक्षण कार्यशालाओं को समाज के लिए अत्यंत उपयोगी बताया।
कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को उपनयन, वेदारंभ, चूड़ाकर्म, विद्यारंभ, विवाह, समावर्तन आदि विभिन्न संस्कारों का प्रयोगात्मक प्रशिक्षण प्रदान किया गया। प्रशिक्षकों द्वारा विधि-विधान, मंत्रोच्चारण तथा संस्कारों की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि का भी विस्तृत मार्गदर्शन दिया गया।
कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र प्रदान किए गए तथा आयोजकों द्वारा सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया गया। इस प्रकार भारतीय संस्कृति और संस्कारों के संरक्षण की भावना के साथ यह प्रशिक्षण कार्यशाला सफलतापूर्वक संपन्न हुई।
टपकेश्वर महादेव मंदिर के महंत श्री 108 कृष्णागिरी महाराज ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की है और विशिष्ट अतिथि के रूप में कुसुम कंडवाल (अध्यक्ष, उत्तराखंड राज्य महिला आयोग) न्यायमूर्ति यू सी ध्यानी उपस्थित रहे है।
इस अवसर पर कार्यक्रम के संयोजक सुभाष जोशी, सहसंयोजक एवं नोडल अधिकारी मनोज शर्मा, आचार्य विशाल मणि भट्ट, आचार्य पंकज, आचार्य अंकित बहुगुणा महाकाल सेवा समिति के अध्यक्ष रोशन राणा, विनय प्रजापति, श्री गुरु राम राय लक्ष्मण संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ शैलेंद्र प्रसाद डंगवाल, डॉ मनीष भंडारी, डॉ मुकेश खंडूरी, आसाराम, रितु कौशिक, इंदु आदि उपस्थित रहे।
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By - dr. Arun Kuksal
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