Friday, March 6, 2026
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पूर्वी उत्तर की तर्ज पर हो उत्तराखंड का परिसीमन, बता रहे है वरिष्ठ पत्रकार प्रभात डबराल

उत्तराखंड में विधानसभा का नया परिसीमन अभी चल ही रहा है। चुनाव आयोग ने जुलाई 2025 में औपचारिक नोटिफिकेशन निकाला था। डिलीमीटेशन कमीशन (जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में) अभी ड्राफ्ट तैयार कर रहा है।

पहला ड्राफ्ट अक्टूबर 2025 में पब्लिश हुआ था – अभी पब्लिक ऑब्जेक्शन/सजेशन लिए जा रहे हैं (15 दिसंबर 2025 तक लास्ट डेट है) – फाइनल ऑर्डर जनवरी-फरवरी 2026 तक आने की उम्मीद है – नई सीटें 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले लागू हो जाएंगी. इस समय काम जोरों पर है। पहाड़ vs तराई के वोटर अनुपात पर सबसे ज़्यादा बहस चल रही है.

इस संदर्भ ये तथ्य ध्यान में रखें:

अरुणाचल प्रदेश (60 सीटें, सब ST रिजर्व्ड, बहुत दुर्गम) – सबसे कम वोटर: लुमला (Luml a) — करीब 9-10 हजार वोटर, एरिया 3000+ sq km (बर्फीले बॉर्डर इलाके)
सबसे ज्यादा वोटर: इतानगर या दोइमुख — करीब 40-50 हजार वोटर, एरिया छोटा (200-500 sq km).

मणिपुर: (60 सीटें, 40 वैली + 20 हिल) – सबसे कम: हिल सीटें जैसे तेंग्नौपाल या चुराचांदपुर क्षेत्र — 20-30 हजार वोटर – सबसे ज्यादा वैली सीटें जैसे थौबल या इंफाल ईस्ट — 50-60 हज़ार

मेघालय (60 सीटें, लगभग सब हिल) – सबसे कम: नोंगक्रेम या उमरोई जैसे — करीब 25-30 हजार वोटर – सबसे ज्यादा: मावलाई (Mawlai) — 50 हजार+ वोटर

मिजोरम (40 सीटें) – सबसे कम: हाचेक (Hachhek) — 18-20 हजार वोटर – सबसे ज्यादा: आइजॉल नॉर्थ — 35-40 हजार वोटर

त्रिपुरा (60 सीटें) – सबसे कम: कुछ आदिवासी रिजर्व्ड हिल सीटें — करीब 40-45 हजार वोटर – सबसे ज्यादा: अगरतला अर्बन क्षेत्र — 60 हजार+ –

सिक्किम (32 सीटें) – सबसे कम: संघा (Sangha) — सिर्फ 4-5 हजार वोटर (मठों के लिए रिजर्व्ड) – सबसे ज्यादा: गंगटोक या नामची क्षेत्र — 18-20 हजार वोटर

पहाड़ी सीटों में दुर्गमता के कारण वोटर हमेशा कम (कभी 10 हजार से भी नीचे) लेकिन एरिया कई गुना ज्यादा होता है — इस तरह इनका प्रतिनिधित्व मैदानी सीटों जितना ताकतवर रखा जाता है।

उत्तराखंड में भी ठीक वही दुर्गमता वाला नियम लागू होता है। 2008 के डिलीमीटेशन और अब 2026 आने वाले नए डिलीमीटेशन में भी चुनाव आयोग ने स्पष्ट लिखा है कि हिल स्टेट्स में सिर्फ आबादी नहीं, भौगोलिक दुर्गमता भी मानी जाएगी।

कुछ साफ उदाहरण (2023 इलेक्टोरल रोल के हिसाब से): सबसे कम वोटर वाली सीटें (पहाड़ी): – बद्रीनाथ – सिर्फ 92-95 हजार वोटर, एरिया ≈ 5,500 sq km (चमोली का ऊपरी हिस्सा, माणा तक) – केदारनाथ – करीब 98 हजार वोटर, एरिया ≈ 4,200 sq km – यमुनोत्री – करीब 95 हजार वोटर, एरिया ≈ 3,000 sq km – गंगोत्री – करीब 1 लाख वोटर, एरिया ≈ 3,500 sq km – धारचूला (पिथौरागढ़) – करीब 1.05 लाख वोटर, एरिया ≈ 4,000 sq km (भारत-नेपाल-चाइना ट्राई-जंक्शन तक) सबसे ज्यादा वोटर वाली सीटें (मैदानी/सेमी-प्लेन): – हरिद्वार – 2.75 लाख+ वोटर, एरिया सिर्फ 150-200 sq km – रुड़की – 2.6 लाख+ वोटर, एरिया 200 sq km के अंदर – किच्छा (ऊधम सिंह नगर) – 2.8 लाख+ वोटर

मतलब एक बद्रीनाथ सीट में जितने वोटर हैं, उतने तो हरिद्वार में सिर्फ दो-तीन वार्डों में हैं, लेकिन एरिया तीस गुना ज्यादा। यही वजह है कि उत्तराखंड में पहाड़ की 40+ सीटों का औसत एरिया 2,000-5,000 sq km रहता है जबकि तराई की 20-25 सीटें 200-500 sq km में सिमट जाती हैं।

उत्तराखंड में भी लगभग उत्तर-पूर्व जैसा ही फॉर्मूला चलता है – वरना पहाड़ के लोग सदियों तक बिना समुचित प्रतिनिधित्व के रह जाते.

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य:

उत्तर पूर्वी राज्यों में दुर्गम स्थिति में रह रहे नागरिकों के वोट का वजन सुगम स्थानों के मुक़ाबले 4 से 6 गुणा रखा गया है. उत्तराखंड में यह मात्र 2.5 गुणा है.

अर्थात् यदि उत्तर पूर्वी राज्यों के नियम सही तरीक़े से लागू हो तो उत्तराखंड में दुर्गम इलाक़ों की सीटें बढ़ जाएँगीं. यही न्याय संगत भी होगा.

हालाँकि हर जगह का वोट समान ताक़त रखता है लेकिन भौगोलिक स्थिति, बूथ की दूरी और अन्य इंडिकेटर्स के आधार पर विश्लेषक वोट का वजन निकाल लेते हैं.

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