Thursday, May 14, 2026
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23 किमी की जगह बना दी 9 किमी सड़क, ग्रामीण आंदोलित। प्रधानमंत्री को भेजा ज्ञापन।

23 किमी की जगह बना दी 9 किमी सड़क, ग्रामीण आंदोलित। प्रधानमंत्री को भेजा ज्ञापन।

9 km road built in place of 23 km, villagers agitated. Memorandum sent to the Prime Minister.
9 km road built in place of 23 km, villagers agitated. Memorandum sent to the Prime Minister.

प्रधानमंत्री श्री मोदी का सपना है कि देश के हर नागरिक को यातायात सुविधा मिले। स्वाभाविक है कि इसके लिए सड़क मांर्ग भी चाकचौबन्द होंगे। इसी बात को लेकर मैं आपको ऐसे क्षेत्र से मिलवाऊंगा जहां के ग्रामीण आज भी मोटरमार्ग से कोसो दूर है।
जी हां। सीमान्त जनपद चमोली के डुमक कलगोठ के ग्रामीण लगातार आन्दोलित है। राज्य सरकार ने जब ग्रामीणो की मांग को नजरअन्दार कर दिया तो तंग आकर ग्रामीणों ने प्रधानमंत्री को एक ज्ञापन भेज दिया। ज्ञापान में ग्रामीणो ने उल्लेख किया है कि उनके गांव में सड़क पंहुचा दो प्रधानमंत्री महोदय। ग्रामीणो की सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी पर अब विश्वास है। वे लिखते है कि डुमक गांव को सड़क मार्ग से जोड़कर यहां के लोगों को देश के अन्य नागरिकों की भांति विकास की मुख्य धारा में शामिल किया जाये। ग्रामीणों ने प्रधानमंत्री को इसलिए ज्ञापन भेजा है कि उत्तराखण्ड सरकार गांव को सड़क से जोडने में विफल रही है। क्योंकि 2010 में स्वीकृत डुमक कलगोठ मोटरमार्ग का दो बार समरेखण बदलने के बावजूद भी पूरा नहीं बन पाया है।
दरअसल सीमान्त जनपद चमोली का सैन्जी लग्गा मैकोट बेमरू डुमक कलगोठ मोटर मार्ग वाला क्षेत्र बहुत ही दूर दराज का है। आज भी यहां के लोग 11 से 18 किमी पैदल चलते है।  जबकि यह क्षेत्र पर्यटन की दृष्टी से भी बहुत महत्वपूर्ण है। यदि यह मार्ग बनता है तो कल्पकेदार और मद्धमेश्वर जैसे धार्मिक पर्यटन को बढावा मिलेगा। हालात इस कदर है कि 23 किमी सड़क निर्माण की जगह, निर्माण करने वाली कम्पनी ने मात्र 9 किमी ही निर्माण किया है।
2010 से अब तक यह सड़क क्यों नहीं बनी। दो दो बार समरेखण भी हुआ। पर्यावरणीय क्लिरियंस भी है। एक बार कम्पनी को निर्माण करने की समयावधी भी बढाई गई, बजट में भी तब्दीली बताई जाती है। पर निर्माण कम्पनी ने विभाग के साथ मिलीभगत करके 23 किमी की जगह 9 किमी ही निर्माण कर दी। यही मामला सवालों के घेरे में है। इसलिए क्षेत्र के लोग पिछले पांच माह से जिला मुख्यालय में क्रमिक अनशन पर बैठे है। जो सड़क 2010 से अधर में है उसके निर्माण में खामियां कहां कहां है। जरा देखते है। जिसे ग्रामीणो ने प्रधानमंत्री को दिए ज्ञापन मे स्पष्ट लिखा है।
डुमक गांव हिमालय क्षेत्र में पंचकेदार श्रृखला के अन्तिम दो केदार रूद्रनाथ और कल्पेश्वर के बीच 8000 फीट की ऊचाई पर स्थित है। इस सीमान्त क्षेत्र के गांव में पहुंचने के लिए आज भी 18 किमी उत्तार चढ़ाव का रास्ता तय करना पड़ता है। यहां खाद्यान और कृषि उपज आदि का ढुलान खच्चरों से ही होता है। जिसका किराया 1000 रूपया प्रति खच्चर होता है। यही नहीं आकस्मिक दुर्घटना, बीमार व्यक्ति, गर्भवती महिला आदि को आज भी डण्डी कण्डी व कन्धों में ढोकर दिनभर चलने के बाद जिला अस्पताल पहुंचाया जाता है। और तो और सरकारी जन कल्याण की योजना इस क्षेत्र में सही सलामत पहुंचती नहीं। सडक सुविधा न होने के कारण शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार आदि का अभाव बना है। फलस्वरूप इसके पलायन निरंतर बढ़ रहा है। देश की तरकी को देखकर क्षेत्र के लोग अपने को उपेक्षित महसूस कर रहे है। मानवाधिकार जैसे शब्दो की यहां मजाक बन रही है।
उत्तराखण्ड सरकार ने वर्ष 2007-08 में दशोली विकासखण्ड के दर्जनों गांव को जोडकर अन्त में गांव स्यूण से डुमक होकर कलगोठ तक 32.43 किमी० सड़क का प्रस्ताव तैयार किया था। सैन्जी लग्गा मैकोट बेमरू डुमक कलगोठ नामक इस परियोजना को वर्ष 2010 में भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मन्त्रालय से स्वीकृति प्राप्त हुई। इसी वर्ष कार्यदायी संस्था पी०एम०जी०एस०वाई० ने सड़क निर्माण के लिए एक अनुबन्ध संजय कस्ट्रक्सन कम्पनी के साथ किया। वर्ष 2013 तक इस कम्पनी ने सिर्फ 9 किमी० सडक बनाकर कार्य छोड दिया। वर्ष 2015 में फिर रेट रिवाइज कर शेष 23.43 किमी० के निर्माण के लिए स्टार कट्रक्सन कम्पनी के साथ अगला अनुबन्ध किया गया। इस कम्पनी ने भी वर्ष 2017 तक सिर्फ 8 किमी० सडक निर्माण किया जबकि विभाग की वार्षिक रिर्पाेट व वेबसाइट पर इस कम्पनी के नाम  14.82 किमी० का निर्माण दिखाया गया है। यदि यह सड़क कागज के साथ-साथ जमीन पर भी बन जाती तो डुमक गांव 2017 में ही सड़क से जुड जाता। यह दुर्भाग्य कहा जायेगा कि यहां सड़क का निर्माण कागजों में ही हुआ है।
लगातार ग्रामीणों की मांग को लेकर वर्ष 2019 में एलाईमेन्ट बदल कर सड़क को 3.53 किमी० कम कर दिया गया। इस पर भी लोग सहमत हुए। दोनो एलाईमेन्ट पर भूगर्भीय रिर्पाेट अनुकूल थी। परन्तु विभाग ने इस पर भी निमार्ण कार्य आरम्भ नही करवाया। वर्ष 2021-22 में फिर से एलाईमेन्ट बदलकर ग्राम डुमक को छोड़ते हुए ग्राम स्यूण से सीधे कलगोठ मिलाने की कोशिश की गई, जो विवादित हो गया। विवाद इस मायने में कि बार-बार समरेखण बदला जा रहा था। यानि अनावश्यक पेंच फसांया जा रहा था। जबकि इससे पहले मार्च 2019 में जब ठेकेदार ने समय वृद्धि के लिए उच्च न्यायालय नैनीताल उत्तराखण्ड में याचिका दायर की तब विभाग और ठेकेदार ने बयान रिकॉर्ड कराया था कि 30 नवम्बर 2019 तक में इस कार्य को पूर्ण कर दिया जायेगा। पर नया समरेखण न किया जाय, इस पर भी समझौता हुआ था। 22 मई 2022 को एक याचिका की सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय उत्तराखण्ड ने निर्देश दिये कि समिति दोनों गांव डुमक और कलगोठ की शिकायत सुनकर एक महीने में समाधान निकाले। और वर्ष 2019 में बनाए गये एलाईमेन्ट के अनुसार सड़क निर्माण पूर्ण कर न्यायालय को अवगत करवायें। परन्तु यह भी नहीं हो सका।
जनवरी 2024 में डुमक और कलगोठ की जनता के आन्दोलन पर उतराखण्ड के मुख्यमंत्री ने सज्ञान लिया। की वर्ष 2010 के समरेखण पर ही शीघ्र सड़क निर्माण सुनिश्चित करें। तब ग्रामीणों में एक बार फिर से आशा जगी कि अब गावं तक सडक पहुंचेगी। यह आदेश भी रद्दी की टोकरी में चला गया। इधर कार्यदायी विभाग लगातार सर्वेक्षण, भूगर्भीय सर्वेक्षण कराकर फिर से पेंच फंसाकर निर्माण कार्य को लटकाये हुए है। वैसे भी इस सड़क पर सात बार भूगर्भीय सर्वेक्षण हो चुके है। वाडिया इस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने भी सर्वेक्षण किया। अब नेशनल ज्योग्राफिकल रिर्सच इस्टीट्यूट के वैज्ञानिक आ रहे हैं। इधर 01 अगस्त 2024 से गांव डुमक की जनता इस सड़क के निर्माण को लेकर क्रमिक धरने पर बैठी है।
डुमक कलगोठ के ग्रामीणों ने उत्तराखण्ड राज्य सरकार के तमाम संबधित विभागों, अधिकारियों और मुख्यमंत्रीयों तक कई बार मौखिक और लिखित रूप से अवगत करवाया है कि डुमक कलगोठ मोटरमार्ग के निर्माण में अवरोधक क्यों है। इस प्रकरण से तो ऐसा मालूम हो रहा है कि बेलगाम अफरशाही पर उत्तराखण्ड सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है।
विकास संघर्ष समिति ग्राम डुमक वि०ख० ज्योर्तिमठ चमोली ज्ञापन के अन्त में डुमक कलगोठ के ग्रामीण प्रधानमंत्री मोदी से बहुत ही भावनात्मक अनुरोध कर रहे है। ग्रामीण ज्ञापन में लिखते हैं कि देश के अन्य नागरिकों की तरह ही उन्हें समझे। गांव को इस बहुबर्चित सड़क से जोडने की असीम कृपा करें। वे आगे लिखते हैं कि यदि यह भी सम्भव न हो तो जैसे अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांगलादेश में सताये गये अल्पसंख्यकों को नागरिकता देकर दया दिखाई जाती है उसी प्रकार उन्हें भी यहां से विस्थापित कर अन्यत्र बसा दीजिए। जहां वे लोग कम से कम मूलभूत सुविधा प्राप्त कर सके।

9 km road built in place of 23 km, villagers agitated. Memorandum sent to the Prime Minister.
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