Friday, March 6, 2026
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मुकुंदी लाल का शहर गोपेश्वर क्यों सिसक रहा है

मुकुंदी लाल का शहर गोपेश्वर क्यों सिसक रहा है

By dr. Yogesh dhasmana

उत्तराखंड के पहले बैरिस्टर और ब्रिटिश उत्तर प्रदेश विधानसभा के 1923 से 1926 तक डिप्टी स्पीकर रहे गोपेश्वर पादुली गांव के निवासी मुकंदीलाल के सपनों का शहर गोपेश्वर अपनी बदहाली और अधकचरे विकास के कारण सिसक रहा है।

डबल नहीं ट्रिपल इंजन की सरकार होने के बाद भी अब गोपेश्वर में शैक्षिक और व्यापारिक गतिविधियों के सिमटने के कारण पलायन भी तेजी से बढ़ा है। इसके साथ ही बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं विशेषज्ञ डाक्टरों के अभाव में विशाल भवन अब भूतवा दिखाई दे रहे है, भाजपा नेता भी तमाशा बनकर शहर की इस दुर्दशा देख रहे है।

गोपेश्वर में कभी जहां सीतापुर आंख का अस्पताल था, वहां अब एक मंत्री की जिद के कारण 52 बैड का अस्पताल क्रिटिकल यूनिट के नाम से ट्रॉमा सेंटर बनाया जा रहा है। एक पहले से संचालित अस्पताल तो सरकार से चल नहीं पा रहा है, तब इस निर्माणाधीन अस्पलाल का औचित्य क्या है।

जिला प्रशासन पहले जनता की मांग पर भूतल पर पार्किंग के साथ एक बहुदेशीय भवन बना कर आडिटोरियम बनाना चाहता था।इससे विभिन्न चुनाव कार्यक्रमों के प्रशिक्षण सेमिनार आदि प्रोग्राम हो, इस तरह से इसका उपयोग करना चाहता था। मगर जन भावना को दरकिनार करते हुए सीमेंट का जंगल तैयार किया जा रह है। इस पर भी पार्किंग की व्यवस्था न होने से जाम की समस्या विकराल होने वाली है।सड़क दूर संचार की सुविधा भी दूरस्थ इलाकों में जर्जर होने, बद्रीनाथ माणा में हुए हिमस्खलन तक सेना के दल को पहुंचने में 03 दिन लग गए। 300 वर्षों के जन आंदोलन के बाद भी दुमक तक सड़क नहीं पहुंच सकी है।
यह जानकर आश्चर्य होगा कि गोपेश्वर सहित गढ़वाल में जहां 200 बेड के अस्पताल नहीं है, वहा पर विशेषज्ञ डाक्टरों के नियुक्ति नियमानुसार नहीं हो सकती है। इस कड़वी सच्चाई के चलते संपूर्ण जनपद में कार्डियोलॉजी सहित अन्य डाक्टरों के पद सृजित नहीं है। इसी कारण गोपेश्वर मुख्यालय का अस्पताल रेफर सेंटर बन गया है।

चमोली के मुकंदीलाल जो कभी इसे हार्टिकल्चर और कृषि का हब बनाना चाहते थे सड़कों के विकास में उन्होंने 1923 से 1930 तक विधानसभा में सुरंगों के निर्माण के बात की थी। उस पर सरकार के 100 वर्ष बीत जाने के बाद भी बड़ी पहल नहीं कर सकी है। जनप्रतिनिधि तो अपनी दूरबीन से विकास कार्यों का जायजा लें रहे है, तब भला विकास कैसे होगा, जब तक जनता अपने जनप्रतिधियों को सवालों के कटघरे में खड़ा नहीं करती। तब तक सरकार और जनप्रतिनिधि जनता को इसी तरह गुमराह करते रहेंगे।

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