Sunday, September 13, 2026
Home lifestyle उत्तराखंड : रजत जयंती समारोह से निराश लौटे ढोल वादक।

उत्तराखंड : रजत जयंती समारोह से निराश लौटे ढोल वादक।

By – Prem Pancholi

प्रधानमंत्री जब आए, जब चले गए और मुख्यमंत्री भी इसी तरह इसी दिन यानी नौ नवंबर को देहरादून स्थित शहीद स्थल पर गए और आंदोलकारियों को संबोधित करते हुए उनकी पेंशन में अमूल चूल बढ़ोतरी करके आए।

यह तो रहा नौ नंबर यानी रजत जयंती के जश्न का मामला। मगर हमारे प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री ने जिस तरह से शहीदों और आंदोलनकारियों को याद किया उस तरह से राज्य के तत्काल आंदोलन में ढोल वादकों ने भी जान फूंकी थी, सो इस वक्त उन्हें ऐसे आंदोलकारियों की बिल्कुल भी याद नहीं आई कि उन दिनों आंदोलनों के हुजूम को ताजगी देने वाले ढोल वादक भी क्या आंदोलनकारी हो सकते है। जबकि इधर हर सत्ता के नेतृत्व का भाषण ढोल और ढोल वादकों को संबोधित करके ही होता है। यही चौंकाने वाला प्रश्न है जो आज 25 वें साल भी जस का तस दिखाई दिया।

उत्तराखंड समता अभियान का मानना है कि रजत जयंती जैसे समारोह पर उन्हें सौ फीसदी विश्वास था कि नौ नवंबर को प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री जब आंदोलनकारियों के पक्ष में कुछ बातें करेंगे या घोषणा करेंगे तो निश्चित ही ढोल वादकों के प्रति भी कुछ घोषणा होगी, जो नहीं हुई। बताए गया कि पांडाल में मौजूद प्रधानमंत्री के स्वागत के लिए अपने ढोल के साथ खड़े ढोल वादक निराश होकर लौटे।

दरअसल जब जब राज्य आंदोलन के लिए सड़को पर जुलूस आए तब तब इन जुलूसों के आगे आगे ढोल बजे। बड़े जुलूस के आगे ही नहीं बल्कि गांव, कस्बों में भी निकलने वाले जुलूसों को यह ढोल वादक अपनी ढोल की थाप से ताजगी देते रहे। यह क्रम आज भी जारी ही रहता है। मगर राज्य आंदोलन के दौरान कई ढोल वादकों के ढोल पुलिस की पड़ताड़ना से फूट भी गए। कई ढोल वादकों को पुलिस की लाठी का सामना करना पड़ा। समता अभियान के संयोजक दिनेश का सवाल है कि जब सबसे आगे चलने वाले को पुलिस ने नहीं पीटा तो बीच वाले, अंतिम वाले और दूसरे तीसरे नंबर पर खड़े आंदोलनकारी को कैसे पुलिस ने पीटा या गिरफ्तार किया। जबकि होता यह आया कि ऐसे जुलूसों में सबसे आगे वाले को पुलिस गिरफ्तार भी करती है और पीटती भी है। मगर उत्तराखंड राज्य आंदोलन के जुलूसों में सबसे आगे आगे ढोल वादक ही रहते थे। क्योंकि उन्हें जुलूस में अपनी ढोल की थाप से जोश भरना था। यह बात तत्कालीन पुलिस अधिकारियों, जिला अधिकारियों आदि आदि को भी मालूम है।

गौरतलब यह है कि मालूम होते हुए भी राज्य के हुक्मरान इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते। आज राज्य में सभी जातियों में से आंदोलनकारी है। किंतु अनुसूचित जाति के ढोल वादक आज भी राज्य आंदोलनकारी नहीं है। यही वह ढोल वादक है जो हर जुलूस के आगे सभी प्रताड़ना झेलता है। ताज्जुब तब होता है जब कोई भी मीडिया का व्यक्ति इन हुक्मरानों से सवाल पूछने की हिम्मत नहीं कर पाता, कि राज्य आंदोलन के जुलूसों में ढोल बजे थे कि नहीं? यदि नहीं बजे तो वह बयान भी सामने आना चाहिए यदि बजे हैं तो इस बात को हर राजनीतिक, सामाजिक कार्यकर्ता चिला चिल कर कह रहा है। वे आंदोलनकारी भी कह रहे हैं कि उन दिनों सभी आंदोलनकारियों के साथ ढोल वादक अपने ढोल के साथ मौजूद रहे थे।

राज्य के 25 वे वर्ष सूचीबद्ध आंदोलनकारियों की पेंशन में मुख्यमंत्री ने बढ़ोतरी की है, पर ढोल वादक अब तक आंदोलनकारी की सूची में नहीं आए जिसका उन्हें मलाला है। इस तरह से रजत जयंती का यह जश्न अधूरा ही माना जा रहा है।

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