अगर आप कनेक्टिंग फ्लाइट्स पकड़ते हैं और हब एंड स्पोक्स मॉडल नहीं जानते तो ये पोस्ट आपके लिए है। बनारस से देहरादून एयर इंडिया फ्लाइट का गजब अनुभव रहा पिछले दिनों। आमतौर पर मैं टर्मिनल चेंज करने वाली कनेक्टिंग फ्लाइट अवॉयड करता हूँ। साथ ही दोनों फ्लाइट्स में कम से कम एक डेढ़ घंटे का अंतर हो। तो इसी भावना से ये बनारस दिल्ली और दिल्ली देहरादून एयर इंडिया फ्लाइट्स बुक की । दोनों ही टर्मिनल 3 की फ्लाइट्स थीं और १ घंटे का सेफ गैप था। चूँकि मैं डिजी यात्रा का उपयोग करता हूँ तो चेक इन सिक्योरिटी सारे कामों में फ़ास्ट ट्रैक लेन मिल जाती है।
लेकिन इस बार जब बनारस से दिल्ली फ्लाइट AI 1111 पर वेब चेक इन करने बैठा तो बार बार एरर और एयरपोर्ट काउंटर पर ही आने को बोला गया। अब यह बड़ा फ्रस्ट्रेटिंग अनुभव था क्योंकि वेब चेक इन हो जाने से एक तो आपको एयरपोर्ट बहुत पहले नहीं पहुंचना होता, दूसरे आपका बोर्डिंग पास जनरेट हो जाता है तो आप आराम से डिजी यात्रा में भी अपना डाटा फीड कर सकते हैं और एयरपोर्ट के बाहर से ही आप डिजी यात्रा की फैसिलिटी का लाभ ले सकते हैं। परंतु बार-बार एरर मैसेज आने से यह पता चल गया कि इस फ्लाइट का वेब चेक इन किसी वजह से नहीं हो पा रहा है और एयरपोर्ट पर ही जाना पड़ेगा तो मुझे अपना सारा ट्रेवल प्लान 20-25 मिनट अर्ली करना पड़ा और फिर मैं अगले दिन निर्धारित समय से भी आधे घंटे पहले एयरपोर्ट पहुंचा। लाइन में लगकर पुराने तरीके से अपनी आईडी दिखाकर मैंने एयरपोर्ट के अंदर प्रवेश किया। फिर मैं एयर इंडिया के काउंटर पर पहुंचा और फिर वहां पर उन्होंने मुझे अपना बोर्डिंग पास इशू किया और तब मैंने उनसे पूछा कि भाई यह बोर्डिंग पास मेरे वेब चेक इन क्यों नहीं हुआ और क्यों इशू नहीं हुआ? तब उन्होंने जो एक बात बताई वह मेरे लिए बिल्कुल नई बात थी और इसलिए मैं यह कहानी यहां लिख रहा हूं।
उन्होंने बोला कि सर यह इंटरनेशनल फ्लाइट है और इंटरनेशनल फ्लाइट में आपका वेब चेक इन नहीं होगा क्योंकि इमीग्रेशन की बहुत सी फॉर्मेलिटीज होती हैं और उन्होंने बताया यह हब एंड स्पोक मॉडल है जो कि अभी एयर इंडिया ने लॉन्च किया है जून में और यहां से फिर मेरे दिमाग की बत्ती जली और मैंने फिर रिसर्च करना शुरू किया कि यह हब एंड स्पोक मॉडल क्या होता है।
दरअसल एयर इंडिया ने 25 जून 2026 को बनारस (लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा) से एयर इंडिया की AI 1111 फ़्लाइट्स के साथ ‘ईज़ी कनेक्ट’ (Easy Connect) नाम से “हब एंड स्पोक” मॉडल की आधिकारिक शुरुआत की। सरल शब्दों में समझें तो साइकिल के पहिये के बीच का केंद्र ‘हब’ होता है और उससे निकलने वाली तीलियाँ ‘स्पोक’ होती हैं। एयरलाइंस का प्लान यह है कि बनारस, देहरादून, अमृतसर या अहमदाबाद जैसे स्पोक शहरों से यात्रियों को उठाकर दिल्ली या मुंबई जैसे बड़े हब पर लाया जाए। जो यात्री लंदन, फ्रैंकफर्ट, दुबई या सिंगापुर जा रहे हैं, वे अपने पहले शहर में ही अपना अंतरराष्ट्रीय इमीग्रेशन और बैगेज चेक-इन पूरा कर लेंगे। दिल्ली पहुँचकर उन्हें दोबारा इमीग्रेशन या सुरक्षा जाँच की लंबी लाइनों में नहीं लगना पड़ेगा और वे सीधे अपनी कनेक्टिंग इंटरनेशनल फ्लाइट में बैठ जाएँगे।
कागज़ों पर और अंतरराष्ट्रीय यात्रियों के दृष्टिकोण से यह एक क्रांतिकारी और ‘सीमलेस’ व्यवस्था है। लेकिन इसी सिक्के का दूसरा पहलू वह है, जिसका सामना मेरे जैसे एक डोमेस्टिक यात्री ने किया। मुझे लगा था कि दिल्ली के टर्मिनल 3 पर उतरकर मैं हमेशा की तरह डोमेस्टिक ट्रांसफर एरिया की तरफ़ आराम से बढ़ जाऊँगा और अपने अगले बोर्डिंग गेट पर पहुँच जाऊँगा।
लेकिन चूँकि यह फ़्लाइट हब एंड स्पोक मॉडल में सीधे इंटरनेशनल अराइवल पर उतरी, इसलिए पूरी फ़्लाइट के यात्रियों को इंटरनेशनल क्षेत्र में ही डी-बोर्ड किया गया।मेरे पास दिल्ली से देहरादून की कनेक्टिंग फ़्लाइट के लिए महज़ 50 मिनट का लेओवर टाइम बचा था। डोमेस्टिक यात्रियों के लिए वहाँ कोई अलग, आसान रास्ता या स्पष्ट साइनबोर्ड नहीं था। एयर इंडिया के एक ग्राउंड स्टाफ ने हमें एस्कॉर्ट करना शुरू किया और उसके बाद जो भाग-दौड़ शुरू हुई, वह किसी मैराथन से कम नहीं थी। अंतरराष्ट्रीय इमीग्रेशन काउंटरों के पास से होते हुए, एयरलाइन स्टाफ की मदद से हमें किसी तरह फास्ट-ट्रैक कराया गया। इसके बाद पूरे टर्मिनल से बाहर निकलकर, इंटरनेशनल अराइवल से वापस ऊपर डोमेस्टिक डिपार्चर एरिया की तरफ़ भागना पड़ा। वहाँ दोबारा से सुरक्षा जाँच की प्रक्रिया से गुज़रना पड़ा। 40 मिनट तक लगातार भागते-दौड़ते रहने के बाद, जब हम हाँफते हुए देहरादून जाने वाले बोर्डिंग गेट पर पहुँचे, तब जाकर जान में जान आई।
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान मैंने देखा कि मेरे साथ कई ऐसे यात्री भी थे, जो ‘फ्रीक्वेंट फ्लायर्स’ नहीं थे। वे पूरी तरह से भ्रमित थे कि उन्हें किधर जाना है। इसके लिए सबसे पहले मेकमायट्रिप, गोइबीबो , एयरलाइन आदि की आधिकारिक वेबसाइट पर टिकट बुकिंग के दौरान ही स्पष्ट रूप से दर्ज होना चाहिए कि यह एक ‘हब एंड स्पोक’ या इंटरनेशनल-लिंक्ड फ्लाइट है, ताकि यात्री को पहले से ज्ञात रहे कि इसका वेब चेक-इन उपलब्ध नहीं होगा। इसके अलावा, ऐप पर केवल कोई तकनीकी खराबी दिखाने के बजाय स्पष्ट संदेश आना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय फ्लाइट और इमीग्रेशन प्रक्रिया के कारण बोर्डिंग पास केवल काउंटर पर मिलेगा, जिससे यात्री पैनिक न हो और समय से पहले एयरपोर्ट पहुँचे। साथ ही, वेब चेक-इन न होने की स्थिति में एयरपोर्ट के मुख्य द्वार पर ऐसे डोमेस्टिक यात्रियों के लिए विशेष काउंटर की सुविधा होनी चाहिए ताकि वे बिना डिजी यात्रा के आसानी से प्रवेश पा सकें, और अंत में, दिल्ली T3 जैसे बड़े हब एयरपोर्ट्स पर इंटरनेशनल टर्मिनल में उतरने वाले डोमेस्टिक यात्रियों के लिए एक अलग व समर्पित ट्रांजिट कॉरिडोर बनाया जाना चाहिए, जो उन्हें इमीग्रेशन या मुख्य निकास क्षेत्र में भेजे बिना सीधे डोमेस्टिक डिपार्चर सुरक्षा क्षेत्र तक पहुँचा सके।







