Sunday, September 13, 2026
Home lifestyle अनुरागी पुण्यस्मृति : हर सुरो में बसी हुई एक कोमल सी नदी...

अनुरागी पुण्यस्मृति : हर सुरो में बसी हुई एक कोमल सी नदी है।

By – Prem Pancholi 

उत्तराखंड लोक संगीत के मर्मज्ञ पंडित केशव अनुरागी की पुण्य स्मृति के अवसर पर दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र देहरादून में विभिन्न समाजसेवियों, सांस्कृतिकर्मियों, पत्रकारों, लेखकों ने श्रद्धांजलि अर्पित की है। जबकि इस दौरान उनकी बहुत चर्चित पुस्तक “नाद नंदनी” के पुनर्प्रकाशन का लोकार्पण गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी, पद्मश्री डॉ० माधुरी बर्थवाल, वरिष्ठ साहित्यकार व धाद संस्था के संस्थापक लोकेश नवानी, वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा, राजनीतिक विश्लेषक विनोद रतूड़ी, दूरदर्शन उत्तराखंड के कार्यक्रम प्रमुख अनिल भारती के हाथों किया गया है। इस दौरान अनुरागी के सुपुत्र डॉ० राकेश मोहन ने सभी आगंतुकों का स्वागत किया है। जबकि पुष्पा रावत एवं अन्य साथियों ने केशव अनुरागी के ख्यातिलब्ध तीन गीत प्रस्तुत किए है।

इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा ने कहा कि केशव अनुरागी का पहला गढ़वाली गीत 1949 में रिकार्डिंग हुआ था। जिसे आकाशवाणी तथा ग्रामोफोन पर खूब सुना गया। इस गीत के बोल उन्हें आज भी याद है। “बिगरेली खूटियों में तेरी झांवरी बाजी छम्म” जब आकाशवाणी से बजता था तो सभी लोग एकटक कान लगाकर सुनते थे। कहा कि ऐसी कालजई रचना को कौन भला जो नहीं सुनना चाहता होगा। श्री बहुगुणा ने अनुरागी जी के साथ बिताए पल को भी साझा किया।

गढ़ रत्न नरेंद्र सिंह नेगी ने कहा कि उनके द्वारा 1958 में लिखी गई “नाद नंदनी” पुस्तक को प्रकाशित करने की कोशिश 1982 में उन्होंने गढ़वाल सभा की तरफ से की थी। जिसमें वे असफल रहे। उन्होंने आगे बताया कि उन दिनों अनुरागी जी कुछ उदास थे, इसलिए उन्होंने उनसे कहा कि वे अपनी पुस्तक हाथरस जी से प्रकाशित करवाएंगे। जबकि तब तक “नाद नंदनी” के बारे में कई पत्र पत्रिकाओं में लेख छप चुके थे। श्री नेगी ने उनसे जुड़े संस्मरण को साझा करते हुए कहा कि जब उनकी (श्री नेगी की) शादी हुई तो अनुरागी जी ने उनसे कहा कि नरेंद्र तुम्हारी शादी हो गई, उनके हिस्से की मिठाई कहां है? वे आगे बताते है कि तब उन्होंने उनके ही पसंद की मिठाई लाकर उन्हें दे दी। उन्होंने यह भी कहा कि कलाकारों के प्रति उनका बेहद सम्मान का भाव रहता था। एक और संस्मरण बताते हुए कहा कि एक दिन आकाशवाणी में रिकॉर्डिंग के दौरान मोहन दा रीठागढ़ी बहुत उदास थे, किंतु अनुरागी जी से उनकी उदासी नहीं देखी गई और उसी दिन मोहन दा रीठागढ़ी को उन्होंने उनके गीतों के साथ सीधा प्रसारित कर दिया। दरअसल वे जितने ज्ञानी थे उतने ही एक बेहद भावनात्मक कलाकार भी थे। श्री नेगी ने कहा कि टिहरी के अंजनीसैन में स्वामी मन्मथन के आश्रम में ढोल पर एक कार्यशाला हुई। जहां ढोल और ढोली की रोजगार की बात सामने आई। कहा कि उन्होंने वापस आकर ढोल विधा के कलाकारों से दिल्ली में जाकर रिकॉर्डिंग करवाई। ऐसा ही अनुरागी जी भी चाहते थे। मगर उनके द्वारा एक दो प्रयास हुए पर वह अधिक समय तक नहीं चल पाए। इसलिए ऐसे कार्यों के लिए सामूहिक प्रयास की जरूरत है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में ढोल नए बच्चे भी बजा रहे है, पर इसके लिए वृहद कार्य करना पड़ेगा। कहा कि अनुरागी जी के भी यही प्रयास थे, इन्हें ही आगे बढ़ाना होगा।

पद्मश्री डॉ० माधुरी बर्थवाल ने कहा कि संगीत की उत्पत्ति जब हमारे हिमालय से हुई है तो उसे ही आगे बढ़ाने का कार्य केशव अनुरागी जी ने किया। वे अपने संस्मरण को साझा करती हुई आगे कहती है कि वे अपने गांव के सुबदास ताऊ जी से “जय भैरव” सुनती थी। सुबदास ताऊ जी अनुरागी जी के नजदीकी थे। जब आकाशवाणी में पहली बार वे स्वर परीक्षा देने गई तो उन्हीं दिनों उनका परिचय अनुरागी जी से भी हुआ। डॉ० बर्थवाल ने कहा कि अनुरागी जी ने उन्हें हमेशा लोक संगीत को बचाने का कार्य करने को कहा है। अनुरागी जी उन्हें यह भी कहते थे कि माधुरी बेटा तुम हमेशा सकारात्मक रहना। नकारात्मकता जीवन के लिए सबसे बड़ा खतरा होता है। जय माता सकल भवानी …। सलाम वालेकुम, तेरी भाभी फातिमा, तेरो रूहेलखंड छुरा। विधि को सुमेरु … जैसे कालजई रचना के गीत गाते थे तो एक बारगी धरती आकाश में इस सुरीली आवाज और सधे हुए संगीत से सब कुछ स्थिर हो जाता था।

राजनीतिक विश्लेषक विनोद रतूड़ी ने कहा कि उन्होंने कभी अनुरागी जी को देखा नहीं, पर उनके बारे में बहुत सुना और पढ़ा है। यहां तक कि रेडियो को जब पहली बार सुना, तो उस दौरान भी केशव अनुरागी जी का ही “हिन्योचौली डंडियों मां” वाला गीत सुना है। कहा कि उनका परिचय जब अनुरागी जी के सुपुत्र डा० राकेश मोहन से हुआ तो उन्होंने “नाद नंदनी” को दुबारा प्रकाशन की तैयारी कर डाली।

प्रख्यात साहित्यकार व धाद संस्था के संस्थापक लोकेश नवानी ने कहा कि अनुरागी जी से उनका पहला परिचय 1983 में देहरादून स्थित एक कवि सम्मेलन में हुआ। कहा कि भाषा का आनंद अनुरागी जी की ही कविताओं में है। उन्होंने कहा कि केशव अनुरागी सहज और सरल व्यक्तित्व थे। जो इस पुस्तक में संग्रहित है और महत्वपूर्ण भी है। उन्होंने कहा कि यह अतिश्योक्ति नहीं होगी कि उत्तराखंडी लोक संगीत के वे पिता है। उन्होंने कहा कि अनुरागी कितने विद्वान व्यक्तित्व रहे होंगे, जिन पर मंगलेश डबराल जैसे ख्यात और अंतर्राष्ट्रीय कवि ने कविता लिखी। जबकि महेश पुनेठा जैसे गंभीर साहित्यकार ने अनुरागी जी के कार्यों और उनके व्यक्तित्व पर कई रूपक लिखे। श्री नवानी ने दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि केशव अनुरागी को भूल जाना हम सभी की कमजोरी है, इसलिए कि 68 साल बाद उनकी पुस्तक का पुनः प्रकाशन होना। अच्छा तो अब यही होगा कि भविष्य में केशव अनुरागी पर “सामाजिक विमर्श” होना चाहिए। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए श्री नवानी ने अनुरागी को श्रद्धा सुमन बावत एक कविता प्रस्तुत की – “मै उन लोगों में शामिल हूं, जिन्होंने केशव अनुरागी को मारा, उन्होंने ठेके में उन्हें खूब पिलाई, पी भी उनके साथ बहुत, कभी उन्हें एक कप चाय पर आमंत्रित नहीं किया।” उन्होंने कहा कि केशव अनुरागी एक आदमी नहीं बल्कि एक बहुवचन है।

इतिहासकार डॉ० योगेश धस्माना ने कहा कि अनुरागी जी शिक्षाविद शिवानंद नौटियाल के बाल सखा थे। श्री नौटियाल अनुरागी जी को उत्तराखंड के गंधर्व कहते थे। उन्होंने कहा कि लखनऊ के उत्तरायणी महोत्सव में जब वे अनुरागी से मिले, तब वह युवा थे। उन दिनों अनुरागी जी का “सलाम वालेकुम, सदेई गीत” बहुत प्रचलित थे। कहा कि शिवानंद नौटियाल ने ही अनुरागी पर पहला आमुख लिखा था। डॉ० धस्माना ने कहा कि आज वे सामाजिक, सांस्कृतिक संगठन कहां है जो लोक की बात करते हैं। कहा कि लोक बाध्य यंत्रों यानी ढोल पर यह पहली किताब है। इस किताब पर ढोल के तालों की कोडिंग की गई है। उन्होंने कहा कि मोहन उप्रेती का कथन था कि लोक कलाकार बनकर आजीविका सुरक्षित नहीं कर सकते। बशर्ते लोक सेवा आयोग में लोक वाद्ययंत्रों के लिए पद सृजित किया जाए, जो अब तक नहीं हो पा रहा है।

कार्यक्रम का संचालन योगेंद्र पोली ने किया और धन्यवाद ज्ञापित दूरदर्शन उत्तराखंड के कार्यक्रम प्रमुख अनिल भारती ने किया है। उन्होंने कहा कि जो हमें प्रिय लगा उसे ही नाद कहा है। केशव अनुरागी के नाद की मधुर धारा में भाव की एक कहानी है, हर सुरो में बसी हुई एक कोमल सी नदी है।

………………

केशव अनुरागी उत्तराखंड के एक महान संगीतज्ञ थे, जिन्हें उनके गढ़वाली लोक संगीत और ढोल वादन के लिए जाना जाता है। उनका जन्म 13 जनवरी, 1929 को पौड़ी गढ़वाल के ग्राम कुल्हाड़ में हुआ था। उन्होंने अपनी संगीत यात्रा की शुरुआत आकाशवाणी, लखनऊ से की, जहां वे कार्यक्रम अधिकारी बने।

अनुरागी जी ने कुमार गंधर्व से प्रेरणा लेकर गढ़वाली लोक संगीत को शास्त्रीय शैली में गाने का प्रयास किया। उन्होंने “नाद नंदिनी” नामक पुस्तक लिखी, जिसमें गढ़वाली लोक गीतों की स्वर-लिपियां और उनकी संरचना पर विद्वतापूर्ण टिप्पणियां हैं। उनकी संगीत प्रतिभा और गायन शैली के लिए उन्हें “उत्तराखंड के कुमार गंधर्व” कहा जाता है।

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