Sunday, June 28, 2026
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सरला बहन का बचाया जंगल अंतिम सांस गिन रहा है।

क्या अनियोजित विकास की भेंट चढ़ते रहेंगे जंगल?
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सरला बहन का बचाया जंगल अंतिम सांस गिन रहा है।
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By – Suresh bhai

उत्तराखंड में बागेश्वर जिले के बाली घाट से कोटमन्या तक मौजूदा मोटर मार्ग की दूरी लगभग 54 किमी है। यहां सघन वनों के बीच से गुजर रही सड़क के दोनों ओर हिमालय का अद्भुत नजारा है। जहां भारी संख्या में वनों के कटान की संभावना से लोग बहुत चिंतित है। यहां पर महात्मा गांधी की शिष्या सरला बहन का आश्रम है जो दुनिया में “हिम दर्शन कुटीर” के नाम से जाना जाता है। जहां उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दिन पूरे किये थे।
सन् 1980 में भी जब यहां पर पेड़ों के कटान की संभावना थी तब सरला बहन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी को पत्र लिखकर इसका विरोध किया था जिसके बाद सड़क चौड़ीकरण के नाम पर पेड़ों का कटान रोक दिया गया था।

यहां पर बड़ी संख्या में बांज, बुरांश, काफल, उतीश जैसी दुर्लभ वन प्रजातियां के वृक्ष मौजूद है जो उत्तराखंड हिमालय में लगभग 6-9 हज़ार फीट के बीच में पाये जाते हैं। यहां लोग काफल जैसे स्वादिष्ट जंगली फल का भरपूर आनंद उठाते हैं। और गांव के लोग भी आने- जाने वाले यात्रियों को टोकरियों में लेकर काफल उपलब्ध कराते हैं। यहां पर अभी सड़क मार्ग की चौड़ाई 5 से 6 मीटर तक है जिसमें दो गाड़ियां आसानी से आना- जाना कर सकती है लोगों का कहना है कि यदि यहां पर 12 से 18 मीटर चौड़ी सड़क बनेगी तो उस स्थिति में यहां के पर्यावरण को भारी नुकसान होगा जिसमें यहां पर्वत की टॉप पर अनगिनत दुर्लभ वन प्रजाति के पेड़ कट जाएंगे। काबिले गौर है कि यहां पर दुर्लभ वन्य जीव प्रजाति कस्तूरी मृग अनुसंधान केंद्र है। जिसका अस्तित्व यहां की जैव विविधता पर टिका हुआ है। यहां से बरड़ और पुंगर नदियां निकलती है।बरड नदी थल के पास राम गंगा में मिलती है और पुंगर नदी बालीघाट में सरयू में मिल जाती है जो कोसी की सहायक नदियां हैं और आगे गंगा में मिलती है। वन संपदा से घिरे हुए इस पर्वतमाला के दोनों ओर सैकड़ों गांव बसे हुए हैं। जहां से लोगों की प्यास बुझाने वाले जल स्रोत और खेती-बाड़ी चलती है। यहां शीतकाल में सघन बर्फ भी पड़ती है जिसको देखने के लिए मसूरी की तरह ही लोग मैदानों से वहां पहुंच जाते हैं। यह उत्तराखंड का एक सुंदर मनमोहक पर्यटन केंद्र भी है जहां प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में लोग हिम दर्शन कुटीर को देखने और यहां की मनोरम प्राकृतिक छटा का आनंद लेने के लिए पहुंचते हैं।

गांधीवादी डॉ० रमेश पंत जी का कहना है कि यहां पर लगभग 13 हजार से अधिक हरे पेड़ों पर निशान लगाए गये हैं जिन्हें सड़क चौड़ीकरण के नाम पर काटने की तैयारी चल रही है। जिसका वे विरोध कर रहे है। उन्होंने कहा है कि उच्च न्यायालय नैनीताल में भी याचिका दायर की गई है जिस पर आगे काम चल रहा है। लेकिन उनकी चिंता है कि विकास के नाम पर सरकार का पक्ष अधिक सुना जा रहा है और पर्यावरण को जो न्याय मिलना चाहिए उस विषय पर खामोशी लगती है। दूसरी ओर गर्मी से राहत पाने के लिए मैदानी क्षेत्र के लोगों का हिमालय की तरफ पहले से अधिक आना- जाना बढ़ गया है। जिनकी सुविधा के लिए पर्वतों की शांत वादियों में पर्यावरण के साथ बहुत बड़ी छेड़छाड़ हो रही है। महसूस किया जा रहा है कि मनुष्य कुछ क्षणों की सुविधा के लिए बहुत बड़ी बर्बादी की तरफ कदम बढ़ा रहा है।

उत्तराखंड जैसे हिमालय राज्य में जहां जलवायु परिवर्तन का प्रभाव बहुत तेजी से बढ़ रहा है और यहां की बची- खुची दुर्लभ वन प्रजातियों का इस तरह से नुकसान होगा तो आस-पास के गांव के जल स्रोत और यहां से निकलने वाली नदियां सूख सकती है। नंगे पहाड़ बरसात के समय तेजी से फिसलने लगेंगे। बार-बार इन गंभीर विषयों पर चर्चा भी हो रही है लेकिन लापरवाही का अंतहीन सिलसिला जारी है।

सरला आश्रम की साधिका शोभा बहन के नेतृत्व में स्थानीय वन पंचायत सरपंचों, ग्राम प्रधानों और क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी सरकार को अक्टूबर 2024 में एक पत्र लिखा है जिसमें मांग की गई है कि यहां मौजूदा सड़क पर जहां अंधे मोड़ के कारण आने-जाने में दिक्कत महसूस होती है, उनका सुधार करने की आवश्यकता है।उनकी इस मांग के साथ प्रख्यात समाजसेविका और पद्मश्री राधा बहन का समर्थन है। लेकिन जिस तरह से हरे पेड़ों को काटने के लिए बड़ी संख्या में निशान लगाए गए हैं उससे पेड़ों का व्यापारीकरण हो सकता है अधिक राजस्व भी मिल जायेगा। लेकिन यहां की भौगोलिक संरचना के अनुसार जितनी चौड़ी सड़क प्रस्तावित की जा रही है उसके अनुसार पर्याप्त स्थान ही उपलब्ध नहीं है। अतः विकास ऐसा हो जो आफत खड़ी न करें। इस अनियोजित कार्य से हिमालय के शिखर तक पहुंचना आसान नहीं होगा। क्योंकि पिछले वर्षों में जहां-जहां पर भीषण बाढ़ और भूस्खलन से तबाही हुई है वहां अनेक स्थान डेंजर जोन का रूप ले चुके हैं। जहां भविष्य में किसी भी प्रकार का निर्माण करना और अधिक जोखिमपूर्ण हो गया है। परिणाम स्वरूप भविष्य में भूस्खलन की बड़ी समस्या बढ़ती जाएगी जो उत्तराखंड में जगह-जगह दिखाई दे रही है। इसलिए लोगों का संदेश है कि हिमालय के वनों को उजाड़ने से कोई लाभ नहीं मिलेगा। अच्छा हो कि जलवायु संकट से बचने के लिए प्राकृतिक वनों की रक्षा करना सर्वोपरि उद्देश्य होना चाहिए।

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लेखक पर्यावरण के जानकार है।

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