Monday, September 14, 2026
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अतीत का प्रतिशोध नहीं लिया जा सकता, उसे केवल समझा जा सकता है : IAS शशि रंजन कुमार

By – Prem Pancholi ।।

अतीत हमारी स्मृतियों में, खंडहरों में, और उन तरीकों में जीवित रहता है जिनसे वह आज भी हमारे अस्तित्व को आकार देता है। आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता यही है कि हम इसकी सुंदरता और इसकी विफलताओं, दोनों का पूरी ईमानदारी से सामना करें।” यह विचार लेखक शशि रंजन कुमार ने दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में ‘द डिक्लाइन ऑफ हिंदू सिविलाइजेशन: लेसन्स फ्रॉम द पास्ट’ पुस्तक पर चर्चा के दौरान कही।

इस पुस्तक के लेखक शशि रंजन कुमार, आईएएस हैं, जो वर्तमान में संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के सचिव के रूप में कार्यरत हैं।

शशि रंजन कुमार ने कहा कि यह पुस्तक चार प्रमुख खंडों – चरमोत्कर्ष (The Zenith), पतन (The Decline), पराजय (The Defeats) और कारण (The Reasons) – में विभाजित यह पुस्तक गहन शोध और तुलनात्मक ऐतिहासिक दृष्टिकोण पर आधारित है। यह किताब इस विषय का गंभीर विश्लेषण करती है कि संस्कृति, राजनीति, समाज और बौद्धिक चिंतन जैसे कई क्षेत्रों में हिंदू सभ्यता कैसे लड़खड़ाई।

इतिहास के प्रति संतुलित दृष्टिकोण पर जोर देते हुए, श्री रंजन ने कहा कि इतिहास को न तो केवल अतीत की यादों के स्रोत के रूप में देखा जाना चाहिए और न ही शिकायत के रूप में। दर्शकों के साथ संवाद में उन्होंने कहा कि, “अतीत का प्रतिशोध नहीं लिया जा सकता, इसे केवल समझा जा सकता है।”

यह पुस्तक अनेक प्राथमिक स्रोतों के विस्तृत अध्ययन पर आधारित है, जिनमें अली कुफी का चचनामा, मिनहाज-ए-सिराज की तबकात-ए-नासिरी, अल-उतबी की किताब-ए-यामिनी, अल-बलाधुरी की फुतूह अल-बुलदान, अल-बरूनी की किताब-उल-हिंद, और अल-इस्तखरी के यात्रा वृत्तांत प्रमुख रूप से शामिल हैं।

प्राचीन भारत के बौद्धिक आधार पर प्रकाश डालते हुए, श्री रंजन ने बताया कि हिंदू गणित की जड़ें ऋग्वेद में खोजी जा सकती हैं, जहाँ एक सुस्थापित दशमलव प्रणाली का उपयोग कम से कम एक ट्रिलियन (खरब) तक की मात्रा व्यक्त करने के लिए किया जाता था। उन्होंने समझाया कि ब्रह्मांड की विशालता को समझने के लिए जटिल गणनाओं की आवश्यकता ने एक सरल और अधिक कुशल संकेतन प्रणाली के विकास को प्रेरित किया, जिसकी परिणति दशमलव प्रणाली के विकास और ‘शून्य’ को एक स्वतंत्र संख्या के रूप में मान्यता मिलने में हुई।

‘जीवन विज्ञान’ की ओर रुख करते हुए, श्री रंजन ने यूनानी और चीनी चिकित्सा परंपराओं के साथ तुलनात्मक समानताएं प्रस्तुत कीं। उन्होंने बताया कि जहाँ सामान्य शल्य प्रक्रियाएं (सर्जरी) विभिन्न सभ्यताओं में ज्ञात थीं, वहीं प्लास्टिक सर्जरी जैसी परिष्कृत तकनीकों का विकास विशिष्ट रूप से भारत में हुआ था। यह पुस्तक हिंदू सौंदर्यशास्त्र और संगीत परंपराओं का भी विश्लेषण करती है, जो भारतीय ज्ञान प्रणालियों की गहराई और विविधता को रेखांकित करती है।

अपने अंतिम अध्याय “war is deception” का संदर्भ देते हुए, श्री रंजन ने इस बात पर खेद व्यक्त किया कि यह त्रासदी ही थी कि स्थानीय शासक कौटिल्य की शिक्षाओं को भूल गए थे। तुर्कों का मुकाबला करने के लिए ‘कूटयुद्ध’ (kutayuddha or covert warfare) के प्रयोग के बहुत कम प्रमाण मिलते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि तत्कालीन भारतीय शासकों के लिए युद्ध अक्सर ‘सामूहिक रणनीति’ के बजाय ‘व्यक्तिगत वीरता’ का विषय बन गया था।

The decline of Hindu Civilization: lessons from the past इतिहास, अस्मिता और बौद्धिक आत्म-नवीनीकरण (intellectual self-renewal) पर एक गंभीर और तथ्यपरक संवाद शुरू करने का प्रयास है। यह पाठकों को अतीत का ईमानदारी से सामना करने के लिए आमंत्रित करती है, ताकि वर्तमान को बेहतर ढंग से समझा जा सके और भविष्य को सवारा जा सके।

कार्यक्रम की अध्यक्षता एन. रवि शंकर, आईएएस (निदेशक, दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर) ने की।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि आनंद बर्द्धन, आईएएस (मुख्य सचिव, उत्तराखंड) ने कहा कि यह किताब वर्तमान और अगली पीढ़ी के लिए इतिहास का दस्तावेज बनेगी”।

मुख्य वक्ता की भूमिका में प्रो. सुरेखा डंगवाल (कुलपति, दून विश्वविद्यालय) रही जिन्होंने प्रस्तुत की ऐतिहासिक रूपरेखाओं को रेखांकित करते हुए कहा कि आज़ादी के बाद हिंदुस्तान के इतिहास को एक सेलेक्टिव तरीके से परोसा गया। आज हम सभ्यता के इतिहास, बदलावों और संरचनात्मक सीखों पर बात करने लगे हैं।

इस कार्यक्रम में इतिहासकार, साहित्य प्रेमी, पत्रकार, वरिष्ठ अधिकारियों समेत कई लोगों ने प्रतिभाग किया।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शिक्षाविद, साहित्यकार, शोधार्थी, प्रशासनिक अधिकारी और बुद्धिजीवी वर्ग उपस्थित रहे। पूरे आयोजन का माहौल गंभीर बौद्धिक विमर्श और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से समृद्ध रहा।

अपने संबोधन में लेखक शशि रंजन कुमार ने कहा कि यह पुस्तक केवल इतिहास का विवरण नहीं, बल्कि सभ्यता के उत्थान और पतन के पीछे छिपे सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक कारणों को समझने का एक प्रयास है। उन्होंने कहा कि हिंदू सभ्यता विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध सभ्यताओं में से एक रही है, लेकिन समय के साथ इसमें आए बदलावों और चुनौतियों को समझना बेहद आवश्यक है।

मुख्य अतिथि आनंद वर्धन ने पुस्तक के विमोचन पर लेखक को बधाई देते हुए कहा कि इतिहास केवल अतीत का लेखा-जोखा नहीं, बल्कि भविष्य के लिए मार्गदर्शक होता है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की पुस्तकें समाज को अपनी जड़ों, परंपराओं और मूल्यों को समझने का अवसर प्रदान करती हैं। उन्होंने विशेष रूप से युवाओं को ऐसी पुस्तकों के अध्ययन के लिए प्रेरित किया।

विशिष्ट अतिथि प्रो. सुरेखा डंगवाल ने अपने वक्तव्य में कहा कि वर्तमान समय में जब समाज तेजी से बदल रहा है, ऐसे में सभ्यता और इतिहास पर गंभीर अध्ययन और विमर्श की आवश्यकता और बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक न केवल शोधार्थियों बल्कि आम पाठकों के लिए भी उपयोगी साबित होगी।

कार्यक्रम के दौरान उपस्थित अतिथियों और विद्वानों ने पुस्तक की विषयवस्तु पर अपने विचार साझा किए और इसे भारतीय सभ्यता के इतिहास को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण योगदान बताया। वक्ताओं ने कहा कि यह पुस्तक पाठकों को इतिहास के विभिन्न पहलुओं को नए दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित करेगी।

समारोह के अंत में लेखक Shashi Ranjan Kumar ने सभी अतिथियों, आयोजकों और उपस्थित जनों का आभार व्यक्त किया। पुस्तक विमोचन के बाद अतिथियों ने लेखक के साथ संवाद भी किया और पुस्तक के विभिन्न अध्यायों पर चर्चा की।

यह पुस्तक हिंदू सभ्यता के विकास, उसके संघर्षों, उपलब्धियों और पतन के कारणों पर आधारित एक गंभीर अध्ययन है, जो समाज और इतिहास के विद्यार्थियों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
……………………………………
– अतीत का प्रतिशोध नहीं लिया जा सकता, उसे केवल समझा जा सकता है: देहरादून में लेखक शशि रंजन कुमार ने रखे विचार।

– दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में ‘द डिक्लाइन ऑफ हिंदू सिविलाइजेशन: लेसन्स फ्रॉम द पास्ट’ पुस्तक पर हुई विस्तृत चर्चा

– इस पुस्तक के लेखक शशि रंजन कुमार, आईएएस
हैं, जो वर्तमान में संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के सचिव के रूप में कार्यरत हैं

– कार्यक्रम में मुख्य अतिथि आनंद बर्द्धन, आईएएस (मुख्य सचिव, उत्तराखंड) रहे।

– “यह किताब वर्तमान और अगली पीढ़ी के लिए इतिहास का दस्तावेज बनेगी”- श्री आनंद बर्द्धन, आईएएस (मुख्य सचिव, उत्तराखंड)

– “आज़ादी के बाद हिंदुस्तान के इतिहास को एक सेलेक्टिव तरीके से परोसा गया”- प्रो. सुरेखा डंगवाल (कुलपति, दून विश्वविद्यालय

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