Friday, March 6, 2026
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अप्रत्याशित परिवर्तन, विकास की नई योजनाएं पहाड़ के सौंदर्य और पर्यावरण के लिए खतरा।

अप्रत्याशित परिवर्तन, विकास की नई योजनाएं पहाड़ के सौंदर्य और पर्यावरण के लिए खतरा।

साल 1974 में पहली बार ख्यात पर्यवारणविद सुंदरलाल बहुगुणा की पहल पर असकोट से आराकोट तक की यह पैदल यात्रा आरंभ की गई थी। इस वर्ष यात्रा का छठवां पड़ाव था। तब से यह यात्रा हर 10 साल के अंतराल में होती गई। इस यात्रा से अपने पर्यावरण और अपने लोगो के संकट, जन विकास की योजनाओं को समझना है। इसीलिए यह यात्रा हर 10 साल के अंतराल में होती है।

Aakot Aarakot abhiyan 2024
Aakot Aarakot abhiyan 2024

2024 की छटवी इस यात्रा में यात्रा दल के सदस्यों ने दून पुस्तकालय एवम शोध केंद्र के सभागार में मौजूद सैकड़ों लोगो के साथ अपने अनुभव साझा किए है। यात्रा दल के सदस्यों ने कई चौंकाने वाले अनुभव प्रस्तुत किए है।

यात्रा दल के प्रमुख और वरिष्ठ इतिहासकार, पद्मश्री प्रो० शेखर पाठक ने अपने अनुभव में खतरनाक तथ्य प्रस्तुत किए है। उन्होंने बताया कि 25 साल उत्तरप्रदेश के हिस्सा और 25 साल अलग उत्तराखंड राज्य यानि 50 साल की इन छः यात्राओं में कई जन संकट सामने आए है। पहली यात्रा में जहां स्कूलों में मात्र गिनती की लड़किया दिखती थी, अब स्कूलों में बालिकाएं स्कूल जाती दिखाई दी है। पिछली यात्राओं में जहां सड़क नहीं थी वहां सड़क तो पहुंचाए गई, पर जन यातायात की समुचित व्यवस्था अब तक नही बन पाई है। अधाधुंध सड़क निर्माण, जल विद्युत परियोजनाओं ने उत्तराखंड का पर्यावरण ही बदल दिया है, भारी भूस्खलन और जंगलों की आग ने राज्य का बेशकीमती प्राकृतिक संसाधन खत्म कर दिया है।

उन्होंने आगे बताया कि गांव गांव में लोग उदासी में जी रहे है। लोगो को धार्मिकता की झूठी दिलासा दिलाई जा रही है और लोग आपस में बुरी तरह बंट गए है। इन हालातो से राज्य की सांस्कृतिक पहचान खोती जा रही है। प्रो० पाठक ने बताया कि राज्य में धार्मिक उन्माद फैलाया जा रहा है। जबकि इसी राज्य में धार्मिक स्थल लोगो के लिए स्वरोजगार के साधन बनाए जा सकते है। उन्होंने चारधामों में गंदगी का जो आलम देखा वह बहुत ही विभत्स था। केदारनाथ और यमनोत्री में घोड़ों खच्चरों की लीद ने नदियों के पानी को बहुत प्रदूषित किया है।

उल्लेखनीय हो कि लगभग 1200 किमी की लंबी पैदल यात्रा को 45 दिन में पूरा किया गया है। इस अंतराल में असकोट आराकोट अभियान के पदयात्रियों ने प्रकृति व संस्कृति, रोजगार और उधमिता, लोक भागीदारी और हरित शासन तीर्थतान, पर्यटन अन्य साहसिक खेल, महिलाओ के स्तर, संसाधन आदि विषयों की पड़ताल की है।

चौदास घाटी के छोटे गांव पांगू के गबला मंदिर से आरंभ हुई यह यात्रा सीमांत जनपद उत्तरकाशी के आराकोट में संपन्न हुई है।

डा० गिरिजा पांडे ने यात्रा का अनुभव बताते हुए कहा कि इस दौरान उन्होंने देखा कि अलग अलग संस्कृतियों ने अपनी विरासत को संजोए रखा हुआ है। यह यात्रा 36 नदी घाटियों से गुजरते हुए लगभग 300 से अधिक गांव तक पहुंची है। देखा गया कि हर नदी पर एक जल विद्युत परियोजना बन रही है। कुछ परियोजनाएं बन चुकी है। पर यह

सभी योजनाये आपदा से जूझ रही है। इसके अलावा डा० प्रकाश उपाध्याय, जेएनयू की शोधार्थी अंकिता, आसाम से आए अधेता प्रवेश क्षेत्री, कनिका, डा० सुनील कैंथोला आदि यात्रा दल के सदस्यों ने यात्रा के अनुभव लोगो के साथ साझा किए है।

बताया गया कि राजी समाज संकट में है। यह शांत समाज है। इनके पास जमीन नही है और न ही कोई पहचान पत्र है। इनकी परंपरा में है कि जब उनके परिवार में किसी की मृत्यु होती है तो वे वह घर छोड़कर दूसरी जगह अपना बसेरा कर लेते है।यह भी देखा गया कि राज्य बनने के 25 सालो में लोगो की आवाजाही के लिए काली, गोरी, टौंस आदि नदियों पर पुल नही है।

दूरदराज गांव में आज भी रोजगार का अभाव दिखाई दिया है। इसलिए ग्रामीण अंचल में कुछ नौजवान रोजगार के अभाव में ताश के पत्ते खेलते दिखाई दिए है।

इस यात्रा में यह भी देखा गया कि पहाड़ की महिलाओं का बोझ आज भी वैसे ही है, सिर्फ काम का तरीका बदला है। दरअसल पहाड़ में महिलाए ट्रैक्टर चलाती दिखीई दी है। जबकि ऊंचाई के क्षेत्र में आज भी भेड़ बकरी पालन जिंदा दिखाई दिया है।

दिलचस्प यह है कि हम लोग ग्रीन टेक्नोलोजी की बात करते है। मगर आज भी किमू गांव में सड़क नही है।नदियों में गाद भरा जा रहा है। सरे राह पहाड़ में विशालकाय मशीने बेतरतीब ढंग से निर्माण कार्यों में जुटी है। यहां तक कि अब पहाड़ों पर खनन का कारोबार भी तेजी से बढ़ा है। यह उन्हे सर्वाधिक पिंडर नदी के जलागम क्षेत्र में दिखाई दिया है।

पर्यटन यहां के ग्रामीणों का रोजगार का साधन बन सकता है। बशर्ते यह कार्य सरकार नियोजित ढंग से करे। जिसके लिए यहां के लोक उत्सव को पर्यटन से जोड़कर रोजगार के साधन जुटाए जा सकते है। जो इस राज्य में हो नहीं रहा है। गांव में सिर्फ होमस्टे के बोर्ड लगे है, पर वे सभी पर्यटकों के इंतजार में खराब हो रहे है।

इस यात्रा में यात्रा दल को एक नया दृश्य दिखाई दिया है। यमनोत्री के गरम कुंड  में जो भी महिला स्नान करती है वह नहाने के बाद अपनी साड़ी नदी में विसर्जित कर देती है। यह पाखंड भी स्पष्ट दिखाई दिया है जो कभी यमनोत्री में होता नही था। यहां तक कि स्थानीय लोग भी इस परंपरा की कोई जानकारी नही रखते है।

जबकि यात्रा मार्गो पर गंदगी का आलम उन्हे दिखाई दिया। अकेले केदारनाथ में 8 हजार घोड़े, खच्चर पंजीकृत है, 4 हजार खच्चर अवैध बताए गए है यानी 12 हजार घोड़े खच्चरों की लीद कें लिए कोई निश्चित स्थान उन्हे नही मिला है।

केदार घाटी में 12 हेली एजेंसीयां है। एक ऐजेंसी के पास 15 हेलिकप्टर है। हर 7 मिनट में एक हेलीकप्टर केदार घाटी में उड़ रहा है, जिससे वायु प्रदूषण भारी मात्रा में बढ़ रहा है।जबकि केदारनाथ वन्य जीव पार्क है।

उत्तराखंड का सबसे सुंदर कर्जन रूट है, जिसे 1903 में बनाया गया था, वह जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा है।

इस यात्रा में यदि उन्हें थोड़ा आशा की किरण दिखी, तो वह मल्ला दानपुर, पैनखंडा, रवाई आदि क्षेत्रों में। यहां कुटकी और प्याज, राजमा सहित अन्य नगदी फसलों की खेती करते लोग दिखाई दिए है। यही वजह है कि इन क्षेत्रों में पालयन शून्य मात्र भी नही दिखा है।

यात्रा दल अनुभव साझा करते हुए बता रहे थे कि पिछली यात्रा यानी 2014 में उन्हे ऊंचाई के क्षेत्रों में लोग झूला घास निकालते देखे गए, जो इस बार नही दिखा है। हां इस दौरान की यात्रा में वन हल्दी निकालते लोगो को देखा गया है।

अधिकांश गांव खाली मिले है, क्योंकि लोग कीड़ा जड़ी निकालने जा रखे थे, पर वे निराश होकर गांव लौट रहे थे कि उन्हे  किडाजड़ी नही मिली है। यानी जलवायु परिवर्तन का सीधा सीधा कारण उनके सामने खड़ा हो गया है। गांव के मकानों को बनाने का बदलता हुआ दृश्य देखा गया है। अधिकांश नए भवनों की छत टीन शेड से बनाई गई है।

रैणी, सिलक्यारा, और श्रीनगर में जगह जगह भारीभरकम मशीने विकास का कार्य करते हुए दिखाई दी, जिसके कारण पहाड़ का सौंदर्य कुरूप होता दिखाई दे रहा है।

टिहरी के शिवजनी को लोक कलाकार वाली पेंशन नहीं मिल रही है। यह वही शिवजानी है जिन्होंने वर्ष 1957 में 26 जनवरी को केदार नृत्य की प्रस्तुति गणतंत्र दिवस की परेड में दी थी।

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