टम्टा समुदाय: अल्मोड़ा की ताम्रशिल्प परंपरा का 500 वर्षों का स्वर्णिम इतिहास।
By – Dr. Sanjay Tamta
उत्तराखंड का प्राचीन नगर अल्मोड़ा केवल अपनी नैसर्गिक सुंदरता और सांस्कृतिक चेतना के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी अनूठी ताम्रशिल्प कला के लिए भी प्रसिद्ध है। यह कला सदियों पुरानी है और इसके केंद्र में है – टम्टा समुदाय, जिसने अपने शिल्प कौशल से न केवल अल्मोड़ा को वैश्विक पहचान दी, बल्कि एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी संरक्षित किया।
चंद राजाओं के साथ आरंभ हुआ ताम्रशिल्प का स्वर्ण युग
16वीं शताब्दी में जब चंद शासकों ने अपना मुख्यालय चम्पावत से अल्मोड़ा स्थानांतरित किया, तभी टम्टा समुदाय के शिल्पियों को भी साथ लाया गया। उस समय टम्टा परिवार चम्पावत के समीप गोश्नी व भौर्याल जैसे गांवों में बसे थे। चंद राजाओं की मुद्रा (सिक्के) ढालने और राजाज्ञाओं पर विशेष टम्टा छाप लगाने का कार्य इन्हीं शिल्पियों के जिम्मे था। यह छाप इतनी अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती थी कि इसके बिना कोई भी राजपत्र वैध नहीं माना जाता था।
कला में दक्ष, विज्ञान में निपुण
टम्टा शिल्पी केवल बर्तन बनाने तक सीमित नहीं थे, वे धातु विज्ञानी भी थे। वे बिना किसी आधुनिक वैज्ञानिक उपकरण के यह पहचान लेते थे कि ज़मीन के किस भाग में तांबा मौजूद है। खुदाई से प्राप्त ताम्र पत्थर को परिष्कृत कर वे शुद्ध तांबे के गोले बनाते और फिर उससे बर्तन, सिक्के व कलात्मक वस्तुएं तैयार करते। इस प्रक्रिया में ‘आगरी’ नामक सहायक वर्ग की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती थी।
वाद्य यंत्रों से लेकर पूजन पात्रों तक
एक समय था जब टम्टा शिल्पकारों द्वारा बनाए गए तौले, गागर, परात, पूजा के पात्र, रणसिंघा, तुतरी आदि कुमाऊं की हर रसोई और हर मंदिर का हिस्सा हुआ करते थे। विशेषकर तांबे की गागर तो उत्तराखंड के विवाहों में कन्या को शुभ-चिह्न रूप में दी जाती थी।
ब्रिटिश काल में आया पतन
18वीं सदी में अंग्रेजों के आगमन के साथ ही भारत के पारंपरिक शिल्पों पर संकट गहराने लगा। ब्रिटिश शासन ने स्वदेशी तांबे के खनन पर रोक लगाकर इंग्लैंड से आयातित तांबे को बढ़ावा दिया। इससे कुमाऊं की ताम्रशिल्प परंपरा को भारी नुकसान हुआ। बागेश्वर के खरही क्षेत्र में तांबे के खनन पर प्रतिबंध ने टम्टा समुदाय के पारंपरिक व्यवसाय को लगभग ठप कर दिया।
आज भी गूंजती हैं हथौड़ों की ध्वनि
स्वतंत्रता के बाद अल्मोड़ा की यह ताम्र परंपरा फिर से धीरे-धीरे जाग्रत हुई। आज भी मल्ली बाजार के टम्ट्यूरा मोहल्ले में कुछ परिवार ताम्र शिल्प को जीवित रखे हुए हैं। हालांकि आधुनिकता, प्लास्टिक और स्टील के उपयोग ने तांबे के बर्तनों की मांग को कम कर दिया है, लेकिन परंपरा अब भी ज़िंदा है।
टम्टा नाम की उत्पत्ति और सामाजिक स्थिति
‘टम्टा’ शब्द वास्तव में ताम्रकार का अंग्रेजी अपभ्रंश है। अंग्रेजी में हिंदी के ‘त’ के लिए ‘T’ प्रयुक्त होने के कारण ताम्ता से टम्टा बन गया। टम्टा समुदाय को कुमाऊं में सामाजिक दृष्टि से कुलीन और उच्च शिक्षित माना जाता है। अनुमानतः यह समुदाय आज भी कुमाऊं की जनसंख्या का लगभग 1% है, लेकिन इनकी साक्षरता दर 80% से अधिक है।
कहाँ से आए टम्टा?
ऐतिहासिक दृष्टि से टम्टा समुदाय की उत्पत्ति राजस्थान के खेत्री व अलवर क्षेत्रों से मानी जाती है। कुछ परिवार नेपाल से भी कुमाऊं आए। राजस्थान से आए टम्टा अक्सर अपने नाम के साथ ‘सिंह’ जोड़ते थे, जिससे वे अपने ठाकुर वंश से संबंध होने का संकेत देते थे। इनकी कुछ ऐतिहासिक कृतियां आज भी जयपुर के निकट चौकी घानी संग्रहालय में संरक्षित हैं।
टम्टा समुदाय का इतिहास केवल एक जातीय या व्यवसायिक गाथा नहीं है, यह उस सांस्कृतिक जीवटता का प्रतीक है, जिसने विषम परिस्थितियों में भी अपनी पहचान को न केवल संजोया बल्कि भविष्य की पीढ़ियों तक पहुँचाया। आज आवश्यकता है इस कला को संरक्षित करने की, ताकि हमारी अगली पीढ़ी भी उस गौरवशाली ताम्र परंपरा से परिचित रह सके, जो कभी कुमाऊं के हर घर की पहचान हुआ करती थी।
स्रोत – विभिन्न आलेखों से साभार







