Saturday, March 7, 2026
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पचास वर्षीय यात्रा की पृष्ठभूमि, अनुभव और परिवर्तन की पड़ताल

@अस्कोट-आराकोट अभियान 1974-2024’
@पचास वर्षीय यात्रा की पृष्ठभूमि, अनुभव और परिवर्तन की पड़ताल
@’कुछ इस यात्रा में नहीं होगें, पर वे हर यात्री के साथ होंगे’

@Dr. Arun Kuksal

Askot arakot yatra
Askot arakot yatra

उत्तराखण्ड में 20वीं शताब्दी का 70 का दशक कई मायनों में महत्वपूर्ण रहा। असल में, आज के उत्तराखण्ड के चेहरे और मिज़ाज के तह का रेखांकन इसी काल में सर्वाधिक हुआ है। स्वाभाविक है कि, पचॉस साल पहले के उस उत्तराखण्ड को गहराई से जानना और समझना आज के अध्येयताओं और आम आदमी के लिए बेहद जरूरी है।

देश की स्वाधीनता के दो दशकों के उपरान्त तब के अधिकांश उत्तराखण्ड़ी युवा देश में सामाजिक चेतना के सर्वोदयी खोल से इतर स्थानीय मुद्दों पर मुखर हो रहे थे। साथ ही, उनमें गांधी, मार्क्स, बिनोवा, लोहिया और जयप्रकाश नारायण की विचारधारा को अपने जीवनीय आचरण में लाने की प्रबल उत्सुकता थी। उच्च शिक्षा और उसके बदौलत देश-दुनिया में रोजगार हासिल करने के लिए उनके एक लम्बे जन-आन्दोलन से वर्ष- 1973 में गढ़वाल और कुमाऊँ विश्वविद्यालय की स्थापना हो पाई।

इसी काल में स्थानीय जल-जंगल और जमीन की सुरक्षा और उन पर स्वयं के प्रथम हक के लिए उत्तराखण्डी जन-मानस सरकारों को सचेत करता रहा। निरन्तर हो रहे वन आन्दोलनों से आयी जागरूकता ने रैणी गाँव की महिलाओं को 26 मार्च, 1974 को अपने गाँव के जंगल को बचाने में सफलता मिली। यह घटना ‘चिपको आन्दोलन’ के रूप में चर्चा का विषय बनी। आगामी वर्षों में वन आन्दोलनों में पुरजोर आवाजों के क्रम में 24 फरवरी, 1978 को उत्तराखण्ड का पहला ऐतिहासिक और समग्र बन्द हुआ। इससे पहले कभी भी पूरा उत्तराखण्ड एक साथ बन्द नहीं हुआ था। नतीजन, राष्ट्रीय स्तर पर वन और पर्यावरण के प्रति बनी नई समझ के दृष्टिगत वन संरक्षण अधिनियम, 1980 अस्तित्व में आया। वन अधिनियम 1980 के लागू होते ही चिपको विचार को देश-दुनिया में वैचारिक समर्थन मिला। परन्तु अपनी जमीन पर उसे सामाजिक शंका और विरोध का सामना करना पड़ा। स्थानीय लोग मानने लगे कि यह अधिनियम उनके जंगलों के परम्परागत अधिकारों की रक्षा के बजाय सत्ता के हित में जंगलों के संरक्षण और विकास के लिए बना है।

इसी दौर में, उत्तराखण्ड के कुछ सर्वोदयी और साम्यवादी विचारों के निकट सामाजिक कार्यकर्ताओं की सक्रियता में एक नया मोड़ आया। पर्वतीय युवा मोर्चा, युवा निर्माण समिति और उत्तराखण्ड सर्वोदय मण्डल ने आपसी सहमति से 25 मई, 1977 को गोपेश्वर में ‘उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी’ का गठन किया। ‘उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी’ ने युवाओं को ‘पढ़ाई के साथ लड़ाई’ ध्येय विचार के बल पर सन् 1984 में ‘नशा नहीं रोजगार दो आन्दोलन’ का कुशल संचालन किया था। यह भी उल्लेखनीय है कि ख्याातिप्राप्त वैज्ञानिक प्रो. देवी दत्त पंत के नेतृत्व में 25 जुलाई, 1979 को मसूरी में उत्तराखण्ड क्रान्ति दल का गठन होना उत्तराखण्ड के परिपेक्ष्य में महत्वपूर्ण घटना रही है।

इस काल के प्रारम्भिक वर्षों में टिहरी बांध बनने के लिए ठक-ठक शुरू हो चुकी थी। विरोध स्वरूप ‘टिहरी बाँध विनाश का प्रतीक है‘ नारे को सुन्दरलाल बहुगुणा पुरजोर किए हुए थे। संपूर्ण हिमालयी राज्यों के अभिमत को तैयार करने के उद्वेश्य से सुन्दरलाल बहुगुणा ‘कश्मीर से कोहिमा तक’ की 120 दिनों की यात्रा करके चर्चा में थे।

इसी क्रम में अल्मोड़ा में 18 जनवरी, 1974 को उन्होने युवाओं को ग्रामीण उत्तराखण्ड को जानने-समझने के दृष्टिगत ‘अस्कोट-आराकोट अभियान’ की रूपरेखा षेखर पाठक, शमशेर बिष्ट, प्रताप शिखर, कुवंर प्रसून के सम्मुख रखी। इस पर सहमत होते हुए इन जुनूनी युवाओं ने उनके आवाह्न पर ‘अस्कोट-आराकोट अभियान’ आरम्भ किया।

इस अभियान के तहत कुमाऊँ-गढ़वाल के युवाओं की साझे भागेदारी में उत्तराखण्ड के पूर्वी हिस्से अस्कोट (पिथौरागढ़) से पश्चिमी हिस्से आराकोट (उत्तरकाशी) तक की पैदल यात्रा की तैयारी की गई। ‘अस्कोट-आराकोट अभियान’ के बैनर तले संग्रामी श्रीदेव सुमन के जन्मदिन 25 मई, 1974 को अस्कोट से यह यात्रा आरम्भ होकर 08 जुलाई, 1974 को आराकोट में सम्पन्न हुई थी। सुन्दरलाल बहुगुणा भी इसके शुभारम्भ के अवसर पर स्वयं उपस्थित थे। यात्रा के दौरान विभिन्न पड़ावों में अनेकों अन्य युवा इसमें शामिल होते रहे। पदयात्रियों ने 200 से अधिक पहाड़ी गाँवों के जन-जीवन का हाल-चाल जानते हुए लगभग 1000 किमी. की दूरी तय की थी।

प्रमुखतया, उत्तराखण्ड की सामाजिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक और वानस्पतिक विविधता को जानने-समझने, जंगलों के मायने एवं उनकी सुरक्षा, नशाबन्दी, सामाजिक भेदभाव, जनजागृति और दुर्गम इलाकों में विकास की पड़ताल करना इस अभियान के उद्देश्य थे। इस तरह यह पहला अभियान था, जिसमें कुमाऊँ तथा गढ़वाल के युवाओं को उत्तराखण्ड के दूरस्थ दुुर्गम क्षेत्रों को गहराई से जानने-समझने का मौका मिला।

शेखर पाठक स्वीकारते हैं कि ‘हमें अपनी पहली यात्रा में यह अन्दाजा आ गया था कि पहाड़ों के बाबत हम या हमारे विश्वविद्यालय बहुत कम जानते हैं और उससे भी कम बताते हैं।’’

इस बारे में शमशेर बिष्ट के अनुभवों को गौर फरमाइये ‘‘…जब मैं अपने साथियों के साथ कुमाऊँ के सुदूर 7000 फीट तक की ऊँचाई पर स्थित बदियाकोट गाँव में पहुँचा तब वहाँ एक ग्रामीण से यह पूछने पर कि ‘तुम्हारा एम.एल.ए. कौन है,’ उस ग्रामीण का सहज उत्तर था कि ‘यहां एम.एल.ए. नहीं होता है।’ जैसे एम.एल.ए. जानवर या फसल हो। ऐसे ही ग्रामीण सर्वेक्षण के दौरान मैंने जब कुछ प्रष्न पूछने की इच्छा से बागेश्वर तहसील के ग्राम मदकोट के ग्रामवासियों से सम्पर्क किया, उस समय वार्ता के दौरान एक वृद्ध ग्रामवासी ने सहज भाव से कहा, ‘यो कुकुरीच्याल फिर ए गई (ये कुत्ते के बच्चे फिर आ गए हैं।)। तब मुझे स्थिति को स्पष्ट करते हुए एक साथी ग्रामवासी ने बताया कि असल में यह आपको विकास-विभाग का कार्यकर्त्ता समझ रहा है।’’

यात्रा के उपरान्त शमशेर बिष्ट का कथन महत्वपूर्ण है कि ‘उत्तराखण्ड के बारे में पहले तक हम युवकों के मन में दूसरा ही दृष्टिकोण था। किंतु इस यात्रा के बाद वह मिट गया। एक नए दृष्टिकोण ने जन्म लिया…1974 में अस्कोट से आराकोट की 45 दिन की पदयात्रा ने पहाड़ में बने रहने का मन बना दिया। इसीलिए जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छोड़कर मैं पहाड़ लौट आया।’’

वास्तव में, कुमाऊँ-गढ़वाल के जन-जीवन को जानने और समझने के मकसद से पैदल निकले चार युवा यथा- शमशेर बिष्ट, शेखर पाठक, कुवंर प्रसून और प्रताप शिखर जब 45 दिनों में 1000 किमी. की यात्रा के बाद आराकोट (उत्तरकाशी) पहुँचे, तो तब तक केवल तारीखें ही नहीं बदली थी वरन इन युवाओं का भविष्य के जीवन का कर्म-पथ भी बदल चुका था। उनके तन थके जरूर थे लेकिन अपने भविष्य की नई राह मिलने से उनके मन-मस्तिष्क तरो-ताजा महसूस कर रहे थे। यह सच भी है कि यात्राओं से आदमी के व्यक्तित्व की दृष्टि और दिशा परिपक्वता की ओर उन्मुख होते हुए समाजोन्मुखी होने लगती है। यही इन युवाओं के साथ भी हुआ था।

शेखर पाठक मानते हैं कि ‘‘इस यात्रा ने उनकी और उनके साथियों की जिन्दगी की राह के लिए पथप्रदर्शक का कार्य किया। यात्रा के बाद हममें वैचारिक रूप में सामाजिक समझदारी, संवेदनशीलता, सृजनशीलता और दायित्वशीलता का बोध अधिक परिपक्वता से होने लगा था। यात्रा के बाद उसमें शामिल युवा स्वयं बदल गये थे। कम से कम पहाड़ों को वे किताबों से उतना नहीं जान या समझ सके थे, जितना इस यात्रा से’’

‘अस्कोट-आराकोट अभियानों’ में भाग लेने वाले युवा बाद मेें उत्तराखण्ड के समग्र विकास के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय हुए और वे उत्तराखण्ड और देश-दुनिया में अपनी एक लोकप्रिय सामाजिक पहचान बनाने में कामयाब रहे। महत्वपूर्ण यह भी है कि, वर्ष 1974 के अस्कोट-आराकोट अभियान के 10 साल बाद पहाड़ संस्था द्वारा सन् 1984 में यह अध्ययन यात्रा की गई। इस यात्रा को ज्यादा व्यापक देने के उद्वेश्य से सन् 1984 से अस्कोट से आगे चौंदास घाटी के पांगू स्थल से शुरू किया गया। उसके बाद हर 10 साल बाद पांगू से यह यात्रा आरम्भ होती है, पर नाम के तौर पर ‘अस्कोट-आराकोट अभियान’ ही दर्ज किया जाता है। सन् 1974 के बाद यह यात्रा 1984, 1994, 2004 और 2014 में आयोजित की गई। इस अभियान में सन् 1974 में कुछ गिनती के नौजवान शामिल थे, यह संख्या वर्ष 2014 में 280 से अधिक रही, जिसमें 60 महिलायें थी।

उक्त यात्राओं के बारे में शेखर पाठक कहते हैं कि ‘‘हमने इन यात्राओं को पूरी तरह जनता पर निर्भर रखा था।…पैसा साथ में न रखने का निश्चय हुआ था, ताकि ग्रामीण-जीवन और जन से अधिक जुड़ पाएं। भोजन जिस गाँव में गए वहीं किया। हर ग्रामवासी से एक रोटी देने का निवेदन था। वास्तव में, यह उनके लिए सभा में आने का निमंत्रण भी था।…अभियान से पहले तथा बाद की मोटर यात्रा भी लोगों पर निर्भर थी। कुछ साथी शुरू में घबराये भी पर कोई कभी भूखा या अधपेट नहीं रहा। हमने इस पद्धति को इसलिए जरूरी माना क्योंकि इस तरह ही हम लोगों के अधिक करीब जा सकते थे। घर तथा रसोई तक जाकर ही हम असली उत्तराखण्ड के दर्शन कर सकते थे। दरअसल तब हम भी उस घर के सदस्य हो जाते थे। यह पहाड़ के परिवारों को जानना अपने को जानना ही था। यह अपने समाज का प्यार पाने का भी अत्यन्त दुर्लभ सौभाग्य था।…शुरू से ही यह स्पष्ट था कि हम सीखने जा रहे हैं। कहने और बताने भी हम जा रहे थे पर यह सीखने के मुकाबले बहुत कम था।’’

पिछली पाँच यात्राओं के मंतव्य और तरीकों को ही आत्मसात करते हुए पचास साल और छटवीं यात्रा के रूप में आगामी 25 मई से षंष्यै-गबला मंदिर प्रांगण, पांगू (पिथौरागढ़) से ‘स्त्रोत से संगम’ थीम के तहत ‘अस्कोट-आराकोट अभियान-2024’ का आगाज़ किया जा रहा है। यह यात्रा 08 जुलाई को राजकीय इंटर कालेज, आराकोट (उत्तरकाशी) में समाप्त होगी।

इस बार इस यात्रा का प्रमुख आधार सर्वेक्षण प्रश्नानावली को बनाया गया है। इस प्रश्नावली के दस खण्ड हैं। ये खण्ड क्रमशः प्रशासनिक परिदृश्य, सामाजिक और पारिवारिक परिदृश्य, गाँव की भौगोलिक स्थिति, गाँव की शैक्षणिक स्थिति, गाँव की आर्थिक और व्यावसायिक स्थिति, मनोरंजन की स्थिति, स्वास्थ्य की स्थिति, महिला एवं शिशु की स्थिति, कोविड महामारी और माइग्रेशन की स्थिति, भू-कानून और भूमि के सवाल हैं। यात्रा की थीम का अनुसरण करते हुए मुख्य यात्रा के समानान्तर गाँव-इलाके के जलागम क्षेत्रों की ओर भी अन्य यात्रा दल गाड-गधेरे और नदियों के अभिसिंचित क्षेत्रों में ‘स्त्रोत से संगम’ तक की यात्रायें की जायेंगी।

‘अस्कोट-आराकोट अभियान-2024’ में एक अभिनव प्रयोग के तौर पर उत्तराखण्ड हिमालय की ओर के महत्वपूर्ण यात्रा पथों को भी खोजने का प्रयास किया जायेगा। जिन यात्रा-पथों से ऋषियों, पाण्डवों, बुद्ध, शंकराचार्य, ऋषभदेव, मणिपद्म, गुरुनानक, गोरखनाथ, फाहियान, मार्कोपोलो, ह्वेनसांग, अलबरूनी, जैसुइट बंधु, मूरक्रोफ्ट, सोमा द कोरोसी, हूकर, स्ट्रैची बंधु, रोरिक, विवेकानन्द, नैन सिंह रावत, किशन सिंह रावत, स्वेन हेडिन, कावागुची, राहुल सांकृत्यायन, विल्सन, जिम कार्बेट, महात्मा गांधी, कालेलकर, मीरा बहन, रवीन्द्रनाथ टैगोर, बाबा नागार्जुन, प्रणवानन्द, विमल डे, सरला बहन, प्रो. चितरंजन दास जैसे तमाम संतों, विद्वतजनों, समाजसेवकों, अन्वेषकों, पर्वतारोहियों, पथारोहियों, लेखकों आदि ने विभिन्न कालखण्डों में यात्रायें की थी।

वैसे, उत्तराखण्ड में सबसे पुरानी यात्रा के रूप में चीनी यात्रियों के संस्मरण दस्तावेज के रूप में उपलब्ध हैं। चीन के तांग राजवंश के बौद्ध गुरु ह्वेनसांग ने सन् 629 से 645 के बीच भारत की यात्रा के दौरान कष्मीर से उत्तराखण्ड की यात्रा की थी। इसके बाद अरब यात्रियों, मार्कोपोलो अर जैसुइट पादरियों का वर्णन मिलते हैं। मध्यकाल के बाद उत्तराखण्ड की लिखित यात्राओं के बारे में पता चलता है। अग्रेंज थामस हार्डविक ने सन् 1796 में कोटद्वार-श्रीनगर (गढ़वाल) और विलियम मूरक्रोफ्ट ने सन् 1812 में कैलास मानसरोवर तथा सन् 1825 में अल्मोड़ा से टिहरी कि यात्रा की थी। नैनीताल बसाने वाले पिलग्रिम ने यहां घुमक्कड़ी सन् 1840 के आस-पास की। प्रसिद्व घुमक्कड़ और अन्वेषक पंडित नैन सिंह रावत ने 19वीं षताब्दी में ही तिब्बत और मध्य ऐशिया के साथ ही ‘देहरादून से ल्हासा’ कि घुमक्कड़ी की थी। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने भी सन् 1871 में अपनी हरिद्वार यात्रा का वर्णन किया है। इन अधिकांश यात्रा-पथों पर भी अस्कोट-आराकोट यात्री अथवा अन्य सहायक यात्रा दल विचरण करेगें।

कहना होगा कि, इस दुनिया को बेहतर और जीवंत बनाने की पहली पहल करने वाले भी ऐसे ही घुमक्कड़ रहे होगें। भारी-भरकम बंद किताबों में ठूंसे गए गरिष्ठ ज्ञान-ध्यान से कहीं अधिक रोचकता और अपनेपन का अहसास उन घुमक्कड़ों के पद्चापों में आज भी दुनिया-भर की पगडंडियों में दर्ज होगी। वैसी ही पगडंडियों पर अपने पूर्व की घुमक्कड़ी के पद्चापों के निशाँ खोजने की मंशा ‘अस्कोट-आराकोट अभियान-2024’ के घुमक्कड़ों को है।

नियति का सच ये भी है कि विगत यात्राओं कुछ अग्रज यात्री अपनी जीवन यात्रा को विराम देते इस इहलोक से अलविदा कह चुकें हैं। वे इस यात्रा में नहीं होगें, पर वे हर यात्री के साथ जरूर होगें।

निःसंदेह, ‘अस्कोट-आराकोट अभियान-2024’ के यात्रीगण उत्तराखण्ड हिमालय के प्राकृतिक और मानवीय सुख-दुःखों को आत्मसात करने और उनसे प्रेरणा ग्रहण करने की भावना के साथ वापस अपने घरों को लौटेंगे। और, सुख-दुःखों का यह आधी शताब्दी का प्राकृतिक/मानवीय अहसास उनके संस्मरणों/यात्रा-वृतांतों के सारथी बनेगें।

‘अस्कोट- आराकोट अभियान-2024’ से जुड़ने और विस्तृत जानकारी के लिए आप प्रो. गिरजा पांडे, मोबाइल नंबर – 9412351759 अथवा https://forms.gle/uzWZYKRMHf4EgaHc6 से संपर्क कर सकते हैं।

संदर्भ-
1. हरी भरी उम्मीद, शेखर पाठक, वर्ष-2019, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली।
2. पहाड़ 14-15, अस्कोट आराकोट अभियान अंक, वर्ष-2008, ‘परिक्रमा’, तल्ला डांडा, तल्लीताल, नैनीताल।
3. उत्तराखण्ड का पर्वतीय समाज और बदलता आर्थिक परिदृश्य (तीन दशक के अतंराल की दो शोध यात्राएं)- अरुण कुकसाल एवं चन्द्रशेखर तिवारी, वर्ष-2021, दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र और समय साक्ष्य, देहरादून।
4. जननायक डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट- कपिलेश भोज, वर्ष-2020, साहित्य उपक्रम, दिल्ली।

डाॅ. अरुण कुकसाल
ग्राम- चामी, पोस्ट- सीरौं- 246163
पट्टी- असवालस्यूं, विकासखण्ड- कल्जीखाल
जनपद- पौड़ी (गढ़वाल), उत्तराखण्ड

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