Friday, March 6, 2026
Home lifestyle गांधी जी की पुण्यस्मृति पर विशेष : बापू के सपनों का भारत...

गांधी जी की पुण्यस्मृति पर विशेष : बापू के सपनों का भारत की कल्पना को रेखांकित कर रहे है प्रख्यात पर्यावरणविद सुरेश भाई।

बापू के सपनों का भारत ।

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15 अगस्त 1947 के दिन बापू की एक पुस्तक अंग्रेजी में प्रकाशित हुई थी जिसका नाम“ इंडिया ऑफ़ माय ड्रीम्स“ जिसे हिंदी में नाम दिया गया “मेरे सपनों का भारत“ इसकी भूमिका तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने लिखी है। जिसमें उन्होंने कहा है कि हमने जो स्वतंत्रता प्राप्त की है उसके फलस्वरूप हमारे ऊपर गंभीर जिम्मेदारियां आ पड़ी है- “हम चाहे तो भारत का भविष्य बना सकते हैं और चाहे तो बिगाड़ भी सकते हैं।“ हमें जो स्वतंत्रता मिली है उसमें अधिकांश महात्मा गांधी के ही नेतृत्व का फल है।

सत्य और अहिंसा के जिस अनुपम हथियार का उन्होंने उपयोग किया है। आज दुनिया को उसकी बड़ी आवश्यकता है। इस हथियार के द्वारा ही उन सारी बुराइयों से जीत हासिल की जा सकती है जिससे आज दुनिया पीड़ित है। आजादी के आंदोलन में अपने साधन के रूप में गांधीजी को जिनका उपयोग करना पड़ा वह कितने अधूरे थे क्योंकि इतिहास गवाह है कि सामान्य स्थिति में किसी भी दूसरे देश को अपने उद्देश्य हासिल करने में जो बलिदान करना पड़ता है उसकी तुलना में हमें वर्षों के संघर्ष में बहुत ही कम बलिदान करना पड़ा क्योंकि गांधीजी के अहिंसक हथियार के बल के कारण यह हो सका था।

बापू कहते थे कि भारत को फौलाद के हथियारों की उतनी आवश्यकता नहीं है। वह दैवी हथियारों से लड़ा है और आज भी वह उन्हीं हथियारों से लड़ सकता है। दूसरे देश पशुबल के पुजारी रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत को यूरोप का अंधानुकरण नहीं करना है। क्योंकि भारत के द्वारा तलवार का रास्ता स्वीकार नहीं है और देश का धर्म भौगोलिक सीमाओं से मर्यादित नहीं है। बापू ने कहा कि जिस दिन यदि भारत ने हिंसा को अपना धर्म स्वीकार कर लिया और उस समय मैं जीवित रहा तो मैं भारत में नहीं रहना चाहूंगा।

मेरे सपनों का भारत में बापू ने स्वराज्य का अर्थ समझाते हुए बताया कि स्वराज्य एक पवित्र शब्द है और यह एक वैदिक शब्द है। जिसका अर्थ आत्मशासन और आत्म संयम है ।अंग्रेजी शब्द इंडिपेंडेंस अक्सर सब प्रकार की मर्यादाओं से मुक्त निरंकुश आजादी का या स्वछंदता का अर्थ देता है। वह अर्थ स्वराज्य शब्द में नहीं है। सच्चा स्वराज्य थोड़े लोगों के द्वारा सत्ता प्राप्त कर लेने से प्राप्त नहीं होता है। बल्कि जब सत्ता का दुरुपयोग होता हो तब सब लोगों के द्वारा उसका प्रतिकार करने की क्षमता प्राप्त करके हासिल किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में स्वराज्य जनता में इस बात का ज्ञान पैदा करके प्राप्त किया जा सकता है कि सत्ता पर कब्जा करने और उसका नियमन करने की क्षमता भी जनता के पास हो। दूसरे शब्दों में बापू ने कहा है कि स्वराज्य का अर्थ है सरकारी नियंत्रण से मुक्त होने के लिए लगातार प्रयत्न करना। फिर वह नियंत्रण विदेशी सरकार का हो या स्वदेशी सरकार का यदि स्वराज्य हो जाने पर लोग अपने जीवन की हर छोटी बात के लिए सरकार का मुंह ताकना शुरु कर दें तो वह स्वराज्य किसी काम का नहीं होगा।

इस कल्पना की मूल भावना है कि स्वराज्य तो गरीबों का स्वराज्य होगा जीवन की जिन आवश्यकताओं का उपयोग राजा और अमीर लोग करते हैं। वही गरीबों को भी सुलभ होनी चाहिए। इसमें फर्क के लिए स्थान नहीं हो सकता है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि गरीबों के पास उनके जैसे महल होने चाहिए। सुखी जीवन के लिए महलों की कोई आवश्यकता नहीं है। गरीब व्यक्ति को रोटी, कपड़ा, मकान और जीवन के लिए अन्य आवश्यक साधन दिए बिना महलों में रख दिया जाए तो वह घबरा जाएंगे लेकिन जीवन की वह सामान्य सुविधाएं अवश्य मिलनी चाहिए जिनका उपभोग अमीर आदमी करता है। अतः बिल्कुल भी संदेह नहीं है कि स्वराज्य तब तक पूर्ण स्वराज्य नहीं हो सकता जब तक गरीब को सारी सुविधाएं देने की पूरी व्यवस्था नहीं होती है। इसके लिए प्रजातंत्र ऐसा हो कि जहां नीचे से नीचे और ऊंचे से ऊंचे आदमी को आगे बढ़ने का सामान अफसर मिलता हो। ध्यान रहे कि लोकतंत्र और हिंसा का मेल नहीं बैठ सकता है जो राज्य आज नाम मात्र के लिए लोकतंत्रात्मक है उन्हें या तो स्पष्ट रूप से तानाशाही का हमी हो जाना चाहिए या अगर उन्हें सचमुच लोकतंत्रात्मक बनना है तो उन्हें साहस के साथ अहिंसक बन जाना चाहिए। प्रजातंत्र का सार ही यह है कि उसमें हर एक व्यक्ति उन विविध स्वार्थों का प्रतिनिधित्व करता है जिनसे राष्ट्र बनता है।

यह सच है कि इसका यह मतलब नहीं कि विशेष स्वार्थों के विषय प्रतिनिधियों को प्रतिनिधित्व करने से रोक दिया जाए लेकिन ऐसा प्रतिनिधित्व उसकी कसौटी नहीं है या उसकी अपूर्णता की एक निशानी है। सच्ची लोकसत्ता या जनता का स्वराज्य कभी भी असत्य या हिंसक साधनों से नहीं आ सकता है। कारण स्पष्ट है कि यदि असत्य में और हिंसक उपयोग का प्रयोग किया गया तो उसका स्वाभाविक परिणाम यह होगा कि सारा विरोध या तो विरोधियों को दबाकर या उनका नाश करके उन्हें समाप्त कर दिया जाएगा। प्रजातंत्र में लोगों को चाहिए कि वह सरकार की कोई गलती देखते हैं तो उसकी तरफ उसका ध्यान खींचे और संतुष्ट तभी हो जब तक उनकी बातों की तरफ ध्यान न दिया जाए।

लेकिन जनता के आक्रोश का प्रभाव ऐसा हो कि उसके खिलाफ आंदोलन करके उसके कामों में बाधा न डालें। क्योंकि उसका बल तो जनता ही है और उसे जनता के ही दरवाजे में दोबारा जाना पड़ेगा। अतः मेरे सपनों का भारत में गांधी जी ने ऐसे अनेकों सपने संजोए थे जिसे आजादी के बाद पूरा करना चाहते थे, जिसका दायित्व भारत के लोकतंत्र के ऊपर है। इच्छाशक्ति हो तो इन सपनों को पूरा किया जा सकता है।

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