उत्तराखंड का मूलनिवासी कौन है?
उत्तराखंड राज्य में मूलनिवासी, भू कानून पर विचार-विमर्श से पूर्व ऐतिहासिक दस्तावेजों को खंगालने का काम जरूर कर लिया जाना चाहिए। जिस से वास्तविक मूलनिवासियों के हको को संरक्षित किया जा सके।
कुमाऊं का इतिहास – बद्री दत्त पांडे
1- डोम या दस्यु (वर्तमान में शिल्पकार या हरिजन) भारतवर्ष के प्राचीन निवासी माने जाते हैं। उनसे पूर्व यहां कौन लोग रहते थे यह बात ज्ञात नहीं है। इन दोनों को खस जाति ने हराकर अपनी प्रजा बनाया या कत्यूरियों ने इन्हें हराया। तत्पश्चात खस जाति के लोग यहां आए I (पेज 184)
2- शूद्र जाति के भी एक बार कुमाऊं के राजा होने की किवदंतियां प्रचलित है। किंतु इसका प्रमाण इतना ही है कि कुमाऊं में एक चांडालगढ़ उर्फ चमार कोर्ट नामक एक नुकीली चोटी है, कहते हैं कि यहां कुछ समय तक यानी केवल 21 दिन तक ही एक डोम राजा ने राज्य किया था। उसने चमड़े का सिक्का चलाया था (पेज 184)।
3- शूद्र लोग को डोम, दानव, दैत्य अस्पृश्य, अछूत, चांडाल, शूद्र न जाने किस किस नाम से पुकारे जाते रहे हैं। अब यह हरिजन कहते हैं कि इनको पहले खस जाति ने, फिर आर्यों ने हराया।
जिन लोगों ने आर्य धर्म को किसी प्रकार मान लिया, वह शूद्र वर्ण में गिने गए। जिन्होंने नहीं माना वह बुरे बुरे विशेषणों से याद किए गए।
यह लोग सदियों से एक प्रकार के खस राजपूत, ब्राह्मण व राजपूत के दास रहे है। गोरखा शासन काल में यदि कोई अत्यंत किसी द्विज का हुक्का छूता था या गौ वध कर देता था या कोई जाति के बंधन को तोड़ता था तो उसको प्राण दंड होता था। (पेज 514)
4- सातवीं शताब्दी तक यहां बुद्ध धर्म का प्रचार था, क्योंकि ह्वेनसांग ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि गोभीषण तथा ब्रह्मपुर (लखनपुर) दोनों में बौद्ध लोग रहते थे। कहीं-कहीं सनातनी थे, पर मंदिर व मठ साथ-साथ थे। आठवीं शताब्दी में शंकराचार्य के धार्मिक दिग्विजय से यहां बौद्ध धर्म का ह्रास हो गया।
नेपाल एवं कुमाऊं दोनों देशों में शंकराचार्य गए और सब जगह के मंदिरों में बुधमार्गी पुजारी को निकालकर सनातनी पंडित वहां नियुक्त किए।
बद्रीनारायण, केदारनाथ व जागेश्वर के पुजारी को भी उन्होंने ही बदला और बौद्ध के बदले दक्षिण के पंडित बुलाए गएI (पेज 189)
साभार विनोद आर्य की फेसबुक वाल से







