‘सनद रहे, नई पीढ़ी इन किताबों को इसलिए भी पढ़े कि वे गम्भीरतापूर्वक यह समझ सके कि उनके सुखद और सम्पन्न वर्तमान को लाने के लिए अग्रज पीढियों ने अपने जीवनकाल के सर्वोत्तम समय और संसाधनों को कैसे खपाया था।’
धारा के विरुद्ध जीवन प्रवाह- चमन लाल प्रद्योत।
‘घोड़ीखाल के इर्द-गिर्द ढलानों पर मैं बैठा-बैठा प्राइमरी स्कूल के प्रांगण में अध्ययनरत बच्चों की तरफ देखता। वे पंक्तिबद्ध होकर ईश-वंदना गाते, कवितांए पढ़ते, अध्यापक उन्हें पढ़ाते और मध्यान्तर में वे खेलते। मेरा मन करता कि मैं भी स्कूल में होता तो कितना अच्छा होता। मैं ललचाता।
उम्र बढ़ती गई और मेरी यह चाह तीव्र होती रही। परन्तु स्कूल से विरक्त रखने के लिए मैंने अपने मां-बाप को कभी नहीं कोसा। मां-बाप की मजबूरी मेरे अन्तर्मन में गहरे से बैठ गई थी। अतः उनके सामने स्कूल जाने की मेरी ललक कहीं दब सी जाती थी।
मैं दिवास्वप्न देखता और अपने को स्कूल में बच्चों के बीच पाता। बहुत आनन्दित होता। छुट्टी होती और छात्र के रूप में मैं घर पहुंचता। तभी जानवरों की आवाज से हड़बड़ाहट में मेरी तंद्रा टूट जाती और मैं फिर चरवाहा बन जाता।
स्कूल की छुट्टी होते ही मैं भी स्कूल से वापस आने वाले दोस्तों के साथ-साथ घर की राह पर होता। बस फर्क इतना होता उनके कंधों में स्कूली बस्ते का बोझ होता और मेरा बोझ मेरी जिम्मेदारी में साथ-साथ चल रहे गांव भर के जानवर होते। इस बोझ से मैं पीछा छुड़ा कर स्कूल जाना चाहता था। मेरी स्कूल जाने की तीव्र इच्छा, वर्षों इसी तरह ललकती रही और उसे मैं आकाश से तारे तोड़ने के समान समझता रहा।’ (पृष्ठ-35)
‘…मैं दसवीं कक्षा में चला गया था और तिमाही-छमाही परीक्षाओं में प्रथम स्थान पर रहा। उन दिनों पौड़ी-कोटद्वार मोटर मार्ग को पक्का करने के लिए रोड़ियां तोड़ी जा रही थी। मैं भी इसी काम में शामिल हो गया। ग्राम डोबल्या और परसुण्डाखाल के मध्य मार्ग पर रोड़ियां तोड़कर मैंने अपनी आगे की पढ़ाई के लिए कुछ मुद्रा अर्जित कर ली थी।
आज जब मैं उस सड़क पर गुजरता हूं तो सड़क-निर्माण में अपने योगदान को याद करके अपनी कर्मठता और आत्म विश्वास पर गर्व होता है।’ (पृष्ठ-44)
‘मैं आई.पी.एस. में चयन के उपरान्त सीधे अपने गांव गया तो मेरी मां बजाय खुश होने के रोने लगी। मां से रोने का कारण पूछा। …..उसका विचार था कि पुलिस की नौकरी पकड़कर मैं लोगों को सताऊंगा, …..
वह मुझे समझाने लगी, ‘बेटा इस अफसरी को छोड़। इससे बेहतर तो यह होगा कि तू कहीं बाबू या चपड़ासी बन जा……
मैने मां का समझाया और उसे आश्वस्त किया कि मैं, उसकी अपेक्षानुसार ही अपने पुलिस दायित्व का निर्वाह करूंगा।’ (पृष्ठ-64)
‘….मैंने न कोई बडे सपने देखे, न कोई महत्वाकांक्षाए ही पाली। जो प्राप्त हुआ उसे विनम्रता/कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार किया और उसी में सन्तुष्ट रहा। जो नहीं मिला उससे निराश नहीं हुआ। लेकिन यह अहसास हमेशा साथ रहा कि जो भी और जब भी मिलेगा, वह कर्म ही का फल होगा। अतः कर्म-पथ पर डटे रहो, लापरवाह मत होओ और निराशा के चंगुल में मत फंसो। जीवनभर इसी सिद्धांत पर चला और बहुत कुछ मिला भी। (पृष्ठ-258)
उक्त अशं बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी वरिष्ठ आई.पी.एस. अधिकारी एवं यशस्वी साहित्यकार चमन लाल प्रद्योत की आत्मकथा ‘मेरा जीवन प्रवाह’ पुस्तक के हैं। इस किताब में उनके जीवन के क्रमबद्ध पड़ावों के ऐसे कई अन्य संघर्षों का लेखा-जोखा है। प्रद्योत जी ने सीधी-सपाट भाषा में जीवन में जो भोगा, हुआ, देखा और समझा उसे बेबाकी से अपनी आत्मकथा में सार्वजनिक कर दिया।
यह उनकी लेखकीय ईमानदारी, हिम्मत, उदारता और साफगोई का ही कमाल है। ऐसा करके उन्होने पाठकों को भी अपनी-अपनी जिन्दगी के सच को स्वीकार करने का हौसला प्रदान किया है। इन अर्थों में यह जीवनगाथा केवल प्रद्योत जी की न होकर एक आम व्यक्ति की कथा-व्यथा का बहीखाता है।
प्रद्योत ने अपनी आत्मकथा को संवेदनाओं की सरिता में निर्बाध रूप से बहने दिया है। उसे बांध कर एक निश्चित दिशा देने की उन्होने अनावश्यक चेष्टा नहीं की है।
पहाड़ी नदी की तरह एक ठेठ पहाड़ी आदमी के निरंतर प्रवाहमान व्यक्तित्व की कहानी है यह, जिसे कहीं ठौर नहीं। और जिसकी नियति मैदान की ओर ही बहने की होती है।
किताब में आज से 80 साल पूर्व के पहाड़ी जीवन जिसमें चारों और अभाव ही अभाव थे परन्तु प्रकृति प्रदत्त जीवंतता हर जगह मौजूद थी को टटोला जा सकता है।
ग्राम- भीमली तल्ली (पालसैंण तोक), पट्टी- पैडुलस्यूं, जनपद- पौडी गढवाल में 3 मई 1936 को जन्में चमन लाल प्रद्योत आर्थिक अभावों के कारण 9 साल की उम्र तक स्कूल नहीं जा पाये थे।
इस किताब में घनघोर आर्थिक, सामाजिक और भौगोलिक विषमताओं और विपदाओं से जूझते हुए आत्मकथा का नायक अपने जीवन के समय दर समय के दृड संकल्पों को कठोर संयम, मेहनत और निष्ठा के बल पर हासिल करता जाता है। पर ऐसा कुछ है कि, जो उससे हर समय अनायास ही छूटता जाता है। यद्यपि उसको पाने की लालसा और चाह उसमें दिखती नहीं है, परन्तु उसकी भावनात्मक बैचैनी उसे हर समय इनसे बांधे रखती है।
वास्तव में, यह अकेले प्रद्योत जी की ही बैचेनी नहीं है वरन उस पीढ़ी के हर उस पहाड़ी व्यक्ति की है, जिसने नाम एवं धन तो खूब कमाया परन्तु जिस समाज में वह पला-बढ़ा और पढ़ा-लिखा वह समाज वहीं का वहीं रह गया। नतीजन उसके मूल समाज से अलगाव की पीड़ा उसे हर समय उद्धेलित करती रहती है।
यह पुस्तक इन अर्थों में भी महत्वपूर्ण है कि उत्तराखंडी समाज से पहली पीढ़ी के रूप में भारतीय पुलिस सेवा में चयनित चमन लाल प्रद्योत ने अपने 32 साल के पुलिस महकमे के अनुभवों को उद्घाटित किया है।
पुलिसिया रौब-दाब से दूर रहकर विकट से विकट परिस्थितियों में भी सामान्य व्यवहार से समस्याओं को सुलझाया जा सकता है, इसके अनेकों उदाहरण इस पुस्तक में है।
सामाजिक चेतना के अग्रदूत ‘भरपुरू नगवान’ –
देश में सत्तर के दशक तक सामाजिक सेवा के क्षेत्र में सर्वोदय आंदोलन अग्रणी भूमिका में रहा है। आजादी के बाद सत्ता से अलग रहकर अनेकों जागरूक युवाओं ने सर्वोदयी कार्यकर्त्ता के रूप में सामाजिक समानता के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
इसी सर्वोदयी प्रेरणा से प्रेरित होकर उत्तराखंड में भिलंगना घाटी के तीन युवा मित्रों ने जातीय भेदभाव को दरकिनार करते हुए 26 जनवरी, 1950 से एक साथ संयुक्त परिवार के रूप में रहने का संकल्प लिया था। टिहरी गढ़वाल जनपद में धर्मगंगा और बालगंगा के संगम पर स्थित बूढ़ाकेदार (पट्टी-थाती कठूड़) के धर्मानन्द नौटियाल (सरौला-ब्राह्मण), बहादुर सिंह राणा (थोकदार-क्षत्रिय) और भरपुरू नगवान (शिल्पकार) का यह संयुक्त परिवार 12 साल तक निर्बाध रूप में जीवन्त रहा था।
उक्त तीन मित्रों के सहजीवन के एक पात्र थे भरपुरू नगवान (जन्म-12 जनवरी, 1920, मृत्यु-9 अगस्त, 2008)। रक्षिया गांव (बूढ़ा केदारनाथ, टिहरी गढ़वाल) के पांचवीं पास, शिल्पकार भरपूरू नगवान का व्यक्तित्व अदम्य साहसी, हुनरमंद, व्यसनों और अंधविश्वास से मुक्त और जीवन की स्पष्ट दृष्टि वाला था। वे आजीवन एक निडर और समर्पित सर्वोदयी सामाजिक कार्यकर्ता थे। यह प्रसन्नता की बात है कि भरपुरू नगवान जी की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए आज उनके सुपुत्र आदरणीय बिहारी भाई जी और दामाद सुरेश भाई जी की सामाजिक सेवा के प्रति ख्याति उत्तराखंड से बाहर पूरे देश-दुनिया में है।
यह सुखद संयोग है कि कर्मवीर भरपुरू नगवान जी के संपूर्ण जीवन और जीवन संघर्ष पर समय साक्ष्य, देहरादून और लोक जीवन विकास भारती, बूढ़ाकेदारनाथ, टिहरी गढ़वाल ने मिलकर एक पुस्तक का प्रकाशन किया है। इस पुस्तक का मूल लेखन बिहारी भाईजी और संपादन युवा पत्रकार प्रेम पंचोली एवं जयशंकर नगवान ने किया है।
यह पुस्तक 11 अध्यायों में भरपुरू नगवान जी के जीवन के पन्नों को ही नहीं खोलती वरन देश के स्वाधीनता के बाद के हालातों की पड़ताल भी बखूबी करती है। यह पुस्तक साफ कहती है कि सामाजिक विषमतायें चाहे कितनी भी कठोर हों उनको सामुहिक चेतना से कम किया जा सकता है। समाज की वर्जनायें तभी टूटेगीं जब हर वर्ग और जाति में धर्मानन्द नौटियाल, बहादुर सिंह राणा और भरपुरू नगवान जैसे जागरूक और साहसी लोग अपनी सामाजिक सक्रियता और सेवाभाव से समाज का नेतृत्व करेंगे।
महत्वपूर्ण यह है कि लगभग 70 साल पहले बूढ़ाकेदारनाथ क्षेत्र में सामाजिक और आर्थिक उत्थान के लिए तीन युवाओं भरपुरू नागवान, बहादुर सिंह राणा और घर्मानन्द नौटियाल ने जो अलख जगाई थी उससे आज हमारे सामाजिक व्यवहार में कितना बदलाव आया है।
यह पुस्तक इस संदर्भ में एक शोधपरक संदर्भ साहित्य के रूप में सामने आयी है। मेरा अनुरोध है कि युवा और सामाजिक कार्यकर्ताओं को इस पुस्तक का अवश्य अध्ययन करना चाहिए।
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