Sunday, June 28, 2026
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संस्मरण : राहुल सांकृत्यायन को पढ़ना दुनिया को समझना है, बता रहे है वरिष्ठ पत्रकार चारू तिवारी।

महापंडित राहुल सांकृत्यायन: घुमक्कड़ी जिनकी वृत्ति नहीं धर्म था।

 

By – Charu Tiwari

 

हमारे पाठ्यक्रम में एक निबंध था- ‘अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा।’ लेखक थे- राहुल सांकृत्यायन। इस निबंध के अंत में इस्माइल ‘मेरठी’ का एक शे’र था- ‘सैर कर दुनिया की गाफ़िल, जिन्दगानी फिर कहां?/जिन्दगी गर कुछ रही, तो नौजवानी फिर कहां?’ उस समय तो इस निबंध को हम अपने पाठ्यक्रम का हिस्सा मानकर पढते थे, लेकिन बाद में राहुल सांकृत्यायन को पढने का मतलब था दुनिया को जानना। अलग दृष्टि से। यह जानना कोई किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि राहुल ने दुनिया में घूमकर इसे व्यावहारिक बनाया। काशी के पंडितों ने उन्हें ‘महापंडित’ कहा। बौद्ध उन्हें अपना मानते थे। आंदोलनकारी और प्रगतिशील लोगों का उनके बिना काम न चले। वे ‘दिमागी गुलामी’ को निरंतर चुनौती देते रहे। ‘भागो नहीं, दुनिया बदलो’ को उन्होंने चेतना का हथियार बनाया। वे भले ही अपने को ‘संयोग से बना लेखक’ कहते हों, लेकिन उन्होंने जो लिखा वह अद्भुत है। हम उन्हें भारतीय मनीषा के अग्रणी विचारक, साम्यवादी चिन्तक, सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत, व्यापक दृष्टि वाले घुमक्कड़, इतिहासकार, तत्वान्वेशी और साहित्यकार के रूप में जानते हैं। उनकी घुमक्कड़ी का मतलब था गतिशीलता। आज उनकी जयंती (9 अप्रैल, 1893) है। उन्हें हम कृतज्ञतापूर्वक याद करते है

उनकी हिमालय यात्रा और हिमालय से प्रेम पर एक लेख लिखा था, लेकिन कंप्यूटर खराब होने से नहीं दे पा रहा हूं। संक्षिप्त में इतना ही कि हिमालय के बारे में राहुल ने कहा- ‘हिमालय के साथ पर्यटक के तौर पर मेरा घनिष्ठ संबंध है, मैं नगाधिराज का परम भक्त हूं।’ यही हिमालय प्रेम था कि उन्होंने ‘हिमालय परिचय’ के नाम से पुस्तकें लिखीं- कुमाऊं (1950), गढ़वाल (1950-52), नेपाल (1952-53), जौनसार-देहरादून (1953) और हिमाचल प्रदेश (1954)। इसके अलावा ‘दार्जिलिंग परिचय’ और ‘किन्नर देश में’ भी हिमालय को समझने के महत्वपूर्ण ग्रन्थ हैं। ‘वीर चन्द्र सिंह गढवाली’ पुस्तक से राहुल ने गढ़वाली जी के जीवन को जिस तरीके से रखा है वह अद्भुत है। गढ़वाली जी को उन्होंने बड़े भाई का संबोधन दिया।

राहुल ने स्वयं लिखा- ‘सारे हिमालय का मुझ पर ऋण था। मैं वर्षों हिमालय की शीतल छाया और शीतल जल का आनंद लेता आया था। उसके पर्वतों, उपत्यकाओं, हिमानियों और सीधे-सादे लोगों से आत्मीयता पैदा की, उनसे परिचय प्राप्त किया। यात्रा करते समय मेरा ध्यान रहा कि वह केवल स्वान्तः सुखाय नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसके आनंद में दूसरों को भी सहभागी बनना चाहिए। अब हिमालय कह रहा था, हमारे ऋण से भी तुम्हें उऋण होना चाहिए। इसलिए मैंने निश्चय किया, दार्जीलिंग पर लिखना चाहिए।—दार्जीलिंग परिचय लिखने के बाद नैनीताल में रहते ‘कुमाऊं’ में हाथ लगाया। मसूरी में आने पर गढ़भूमि (गढ़वाल) का आग्रह हुआ, और उसे भी लिखा। फिर नेपाल कहने लगा, मुझे क्यों बीच में छोड़ रहे हो। उसे भी लिख डाला। और अंत में ‘देहरादून-जौनसार’ और ‘हिमाचल’ लिखकर भूटान की पश्चिमी सीमा से जम्मू-कश्मीर की पूर्वी सीमा तक फैले हिमालय के बारे में लिखकर मैंने अपने को उऋण करना चाहा।’

हालांकि महापंडित राहुल सांकृत्यायन किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। उनके बारे में कितना बताया जा सकता है! फिर भी एक जीवन यात्रा है इस महान यायावर की। कई देशों, अनेक धर्मों, विभिन्न समाजों-संस्कृतियों को आत्मसात कर उनकी मीमांसा करने वाले अध्येता का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के पंदहा गांव में 9 अप्रैल,1893 में हुआ था। उनका बचपन का नाम केदारनाथ पांडे था। पास के कस्बे से मिडिल तक पढाई की। कुछ दिन कलकत्ते में नौकरी की। पोस्टरों से बंग्ला सीखी। काशी, आगरा और लाहौर में संस्कृत तथा अरबी-फारसी का अध्ययन किया। परसा मठ के उत्तराधिकारी बने। नाम मिला- रामचंद्र साधु।

राहुल 1921 में सक्रिय राजनीति में आये। दो साल बॉक्सर और हजारीबाग जेलों में काटे। बौद्ध साहित्य का विशेष अध्ययन करने 1927 में श्रीलंका गये। यहां विद्यालंकार कालेज में अध्यापन के साथ-साथ ‘त्रिपिटक’ का गहन अध्ययन किया और ‘त्रिपिटकाचार्य’ की उपाधि अर्जित की। वर्ष 1929-30 में भारत से लुप्त प्राचीन बौद्ध-ग्रंथों की खोज के लिये तिब्बत गये। इसके लिये वे तीन बार और तिब्बत गये। इन यात्राओं से अनेकानेक दुर्लभ ग्रन्थों और हस्तलिपियां, चित्र तथा प्रतिलिपियां खच्चरों में लादकर लाये।

तिब्बत से लौटकर बौद्ध भिक्षु राहुल सांकृत्यायन बने। राहुल ने 1932-33 में इंग्लैंड और यूरोप की तथा 1935-36 में जापान, कोरिया, ईरान व सोवियत संघ की यात्रा की। दुबारा 1937 में सोवियत संघ पहुंचे। वर्ष 1939 में अमावरी किसान-सत्याग्रह में भाग लिया और जेल गये। माक्सर्वाद अपनाया, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने। 1944 में लेलिनग्राद में प्राच्य-संस्थान में प्राध्यापक रहने के बाद भारत के स्वतंत्र होने पर स्वदेश लौटे। उसी साल 1947 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के मुंबई अधिवेशन में सभापति चुने गये। इसके बाद 1948 में चीन गये। चीन से लौटकर श्रीलंका में दर्शन शास्त्र के प्राचार्य के रूप में काम किया। 14 अप्रैल, 1963 में दार्जीलिंग में उनका निधन हुआ।

राहुल ने लगभग डेढ सौ ग्रन्थों की रचना की। इनमें मध्य एशिया का इतिहास, बोल्गा से गंगा, मानव समाज, दर्शन-दिग्दर्शन, भागो नहीं दुनिया बदलो, अकबर, मेरी जीवन यात्रा, दिमागी गुलामी, जीने के लिये, वीर चन्द्रसिंह गढवाली, वैज्ञानिक भौतिकवाद, स्टालिन एक जीवनी, घुमक्कड़ शास्त्र प्रमुख हैं। हम उनकी जयंती पर उन्हें कृतज्ञतापूर्वक याद करते हैं।

(- लेखक वरिष्ठ पत्रकार और अध्येता है)

(नैनीताल की फोटो प्रो गिरिजा पांडे की है जो ‘पहाड़’ में छपी है। मसूरी और दार्जिलिंग की फोटो भी ‘पहाड़’ से साभार।)

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