Sunday, September 13, 2026
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अल्मोड़ा में खीम सिंह-मोहन सिंह की बाल मिठाई, तो श्रीनगर (गढ़वाल) में धनाई के पेड़ों का जबा़ब नहीं है।

अल्मोड़ा में खीम सिंह-मोहन सिंह की बाल मिठाई, तो श्रीनगर (गढ़वाल) में धनाई के पेड़ों का जबा़ब नहीं है।

@Dr. Arun kuksal

दशकों पहले अपर बाजार, श्रीनगर (गढ़वाल) में स्थित ‘धनाई मिष्ठान भण्डार’ से बूंदी का प्रसाद लेकर हनुमान मंदिर में चढ़ाने वाले भक्तों की भीड़ हर शाम दिखती थी। एक शताब्दी का फैलाव लिए यह प्रतिष्ठान श्रीनगर (गढ़वाल) के विगत 100 सालों की कही-अनकही बातों और घटनाओं का अहसास दिलाता है।

वर्तमान में इसके संचालक कोठड निवासी दिगम्बर सिंह धनाई (65 वर्ष) बताते हैं कि ‘मेरे दादा फतेसिंह धनाईजी ने सन् 1919 में इस दुकान की शुरुवात पेड़ा, सिंगोरी, कलाकंद, जलेबी, सेल और चाय-पकौड़ी बेचने से की थी। तब ये सब मालू के पत्तों में लपेटकर दिया जाता था। सन् 1964 में दादाजी की मृत्यु के बाद पिताजी (गोपालसिंह धनाई) ने दुकान संभाली और सन् 1991 में उनके स्वर्गवास होने पर मैं इस पैतृक व्यवसाय को संचालित कर रहा हूं। बड़े परिवार (5 भाई एवं 3 बहिन) में बड़ा होने का दायित्व निभाते हुए बचपन से ही पिता के साथ उनके इस काम में बराबर सहयोगी रहा हूं। सन् 1975 में राइका, श्रीनगर (गढ़वाल) से इंटर पास करने के बाद जीवकोपार्जन के लिए इसी पैतृक कार्य करने का मैंने मन बनाया था।’

Dhanai mishtan bhandar
Dhanai misthan bhandar

देश-दुनिया में श्रीनगर (गढ़वाल) से ताल्लुक रखने वाले लोगों के लिए ‘धनाई मिष्ठान भण्डार’ के पेड़े और सिंगोरी आज भी पहली पंसद हैं। ‘अल्मोड़ा से बाल मिठाई लाना’ जैसे लोकप्रिय संदेश की तरह ‘श्रीनगर से धनाईजी की दुकान के पेड़े जरूर लाना’ कहने का रिवाज हमारे समाज में बखूबी प्रचलन में है। मावा, बूरा, चीनी और बड़ी ईलाईची के निर्धारित मिश्रण को घोटने की कलात्मक कला का ही यह कमाल है। दशकों पहले मिट्टी की गहरी कटोरियों में पेडे़ और मालू के पत्तों में लिपटाकर सिंगोरियां बनाई जाती थी। लिहाजा पेड़ों में मिट्टी और सिंगोरियों में मालू के पत्तों की सुंगध उनके स्वाद को और स्वादिष्ट बना देता था। मिट्टी की वे कटोरियां अब बनती नहीं है, इसलिए पेड़ों की वो रंगत कम होना लाज़िमी है। उसी तरह सिंगोरियों का प्रचलन अब बहुत कम हो गया है, क्योंकि मालू के पत्ते अब मिल नहीं पाते हैं।

सन् 1919 में श्रीनगर मोटर सड़क की सुविधा से वर्षों दूर था। उच्च पर्वतीय से मैदानी इलाकों को पैदल आने-जाने वाले लोगों के लिए श्रीनगर प्रमुख विश्राम स्थल था। उस चहल-पहल वाले दौर में धनाईजी की दुकान के पेडे़, सेल, जलेबी और सिंगोरियां मशहूर होने लगी थी। श्रीनगर के आस-पास के गांवों यथा- भिऊंपाणी, पनसौड़, मरगांव, उपणधारी, सुपांणा, लक्षमोली, बगवान, मलेथा, तल्लाकोट आदि गांवों से मावा, दूध, दही, मालू के पत्ते, तरकारी और जलाऊ लकड़ी रोजाना भरपूर मात्रा में आती थी। तब अलकनंदा नदी पर कई जगह नाव चला करती थी। लोगों और सामान का आदान-प्रदान का यही प्रमुख साधन था। समय के साथ गांवों की जीविका के तौर-तरीके जैसे-जैसे बदलते गए उसी के अनुरूप नगरीय व्यवसायों में भी तब्दीली आती गई।

दिगम्बर सिंह धनाई बताते हैं कि पहले के मुकाबले अब गांवों से मावा और दूध 10 प्रतिशत भी नहीं आ पाता है। मालू के पत्ते तो दुर्लभ हो गए हैं। जाहिर है कि मैदानी शहरों से आने वाले कच्चे माल से पेड़े और अन्य मिठाईयां बनती हैं। लेकिन यह बात भी है कि अपने युवाकाल में फुटबाल और हाकी के लोकप्रिय खिलाड़ी रहे दिगम्बरसिंह धनाई पूरे विश्वास से मानते हैं कि निजी जीवन के खान-पान में सात्विकता और शुद्धता को अपनाते हुए वे अपनी व्यावसायिक साख को बरकरार रखे हुए हैं। साथ ही पेड़े बनाने में जो विशिष्ट महारथ उन्होने हासिल है, उससे श्रीनगरी पेड़ों की लोकप्रियता देश-दुनिया में कम नहीं हुई है।

यही बात है कि इस बातचीत में शामिल मित्र अनिल स्वामी धनाईजी को श्रीनगर (गढ़वाल) के गौरव कहकर संबोधित करते हैं।

लेखक का पत्ता – अरुण कुकसाल
ग्राम-चामी, पोस्ट- सीरौ- 246163
पट्टी- असवालस्यूं, विकासखण्ड -कल्जीखाल
जनपद- पौड़ी (गढ़वाल), उत्तराखण्ड

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