स्कूल ऑफ थॉट्स, श्रीनगर (गढ़वाल), भारतीय-हिमालयी ज्ञान परंपरा, मुख्य वक्ता- प्रो. मोहन पंवार।

भारतीय : हिमालय ज्ञान परंपरा पर अपनी बात शुरू करते हुए मुख्य वक्ता प्रोफेसर मोहन पंवार ने स्कूल ऑफ थॉट्स की इस पहल को उपयोगी बताया और इस प्रकार के विमर्श की निरंतरता बनाए रखने का सुझाव दिया। उन्होंने 21 फरवरी को गढ़वाल विश्वविद्यालय सभागार में सीडीएस जनरल अनिल चौहान के भाषण के उसे अंश को उद्धृत किया जिसमें उन्होंने हिमालय से निकलने वाली जीवन दायिनी गंगा और यमुना नदियों और उससे पोषित होने वाली देश की बड़ी आबादी का जिक्र किया और कहा कि हिमालय से मौलिक विचारों की गंगा भी निकलनी चाहिए।
बातचीत के क्रम को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि प्राचीन सभी महत्वपूर्ण ग्रंथों में हिमालय का वर्णन मिलता है। पूरे विश्व का लगभग 24% भूभाग पर्वतीय है जो कि विश्व की कुल 14 प्रतिशत जनसंख्या के पोषण का आधार भी है। पर्वतीय भाग का लाभ केवल पर्वतीय और स्थानीय समुदायों को ही नहीं मिलता बल्कि इसके आसपास का विस्तृत भूभाग और विशाल जनसंख्या भी इससे स्वत: ही लाभान्वित होती है। विश्व की आधी जनसंख्या को स्वच्छ पेयजल भी यहीं से मुहैया होता है।दुनिया की 25% समृद्ध जैव विविधता इन पर्वतीय क्षेत्रों से ही है।
पहाड़ हमेशा से आध्यात्मिक रुचि संपन्न व्यक्तियों, प्रकृति प्रेमियों और साहसिक पर्यटन के शौकीन लोगों के आकर्षण का केंद्र रहे हैं। हिंदूकुश पर्वत श्रृंखला जो कि 3500 किलोमीटर तक विस्तृत है और इससे आठ महत्वपूर्ण देश जुड़ते हैं। विश्व की प्रमुख 12 नदियों का उद्गम भी पर्वतीय क्षेत्रों में है। इस तरह इन नदियों ने उच्च और निचली बसावटों को विभिन्न स्तरों और माध्यमों से तो जोड़ा ही है। यह संस्कृति की एक महत्वपूर्ण संवाहक के रूप में भी इनका अतुलनीय योगदान रहा है। विश्व की महत्वपूर्ण सभ्यताएं भी नदी तटों पर ही फली-फूली और विकसित हुई हैं. बातचीत जारी रखते हुए उन्होंने इको सिस्टम सर्विसेज से मुफ्त में ही प्राप्त होने वाले लाभों की जानकारी दी।
बातचीत के क्रम को आगे बढ़ते हुए उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग और संरक्षण में स्थानीय व्यक्ति और समुदायों के पारंपरिक ज्ञान और कौशल का सम्मान किया जाना चाहिए।पेरिस समझौते का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि 193 देशों द्वारा हस्ताक्षरित समझौते में 15 वर्षों में 17 लक्ष्यों पर काम करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की गई है. और यदि इनमें से 13वें गोल को देखें तो उसमें स्पष्ट रूप से यह उल्लेख किया गया है कि मानव हस्तक्षेप, कार्बन उत्सर्जन और ग्रीन हाउस प्रभाव का सर्वाधिक दुष्प्रभाव हिमालय क्षेत्र पर पड़ा है। चरम मौसम की घटनाएं और जलवायु परिवर्तन के पीछे ये ही कारक जिम्मेदार हैं।
उन्होंने स्थानीय ज्ञान और कौशल विषय पर कहा कि वे स्किलस जो कि कभी किसी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं रहे और अभ्यास व अनुभव से ही पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होते रहे हैं। उनके संरक्षण के लिए मेकैनिज्म को विकसित करने की आवश्यकता है।
अपनी बात को समाप्त करने से पहले उन्होंने छोटी-छोटी फैलोशिप इंट्रोड्यूस करने की बात की जिसके तहत कुछ प्रासंगिक और समसामयिक मुद्दों पर युवाओं को रिसर्च हेतु प्रोत्साहित किया जाए, और उनसे प्राप्त निष्कर्षों को नीतियों के निर्माण और कार्यान्वयन में स्थान मिले.
अंत में संक्षिप्त प्रश्नोत्तरी और धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम की समाप्ति हुई.
कार्यक्रम का संचालन स्कूल ऑफ थॉट के संयोजक डॉ. प्रदीप अंथवाल किया। इस अवसर पर डॉ. विजयकांत पुरोहित, डॉ. अरुण कुकसाल, डॉ. योगेंद्र कांडपाल, सीताराम बहुगुणा, डॉ. राजेंद्र कुमार, जी. एस. दानू, अंकित उछोली, हिमांशी, विभोर बहुगुणा आदि उपस्थित थे।
रिपोर्ट- डॉ प्रदीप अंथवाल एवं सीताराम बहुगुणा







