Sunday, September 13, 2026
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भारी भूस्खलन और जंगलों की आग ने राज्य का बेशकीमती प्राकृतिक संसाधन खत्म कर दिया है – प्रो॰ पाठक

भारी भूस्खलन और जंगलों की आग ने राज्य का बेशकीमती प्राकृतिक संसाधन खत्म कर दिया है – प्रो॰ पाठक

साल 1974 में पहली बार प्रसिद्ध पर्यवारणविद् सुंदरलाल बहुगुणा की पहल पर असकोट से आराकोट तक की यह पैदल यात्रा आरंभ की गई थी। इस वर्ष यात्रा का छठवां पड़ाव था। तब से यह यात्रा हर 10 साल के अंतराल में होती गई। इस यात्रा से अपने पर्यावरण और अपने लोगो के संकट, जन विकास की योजनाओं को समझना है। इसीलिए यह यात्रा हर 10 साल के अंतराल में होती है। 2024 की छटवी इस यात्रा में अलग अलग स्थानो पर लगभग 300 लोगों ने हिस्सा लिया है। और 250 से भी अधिक गांवो से यह यात्रा गुजरी है। जबकि एक दर्जन से भी अधिक लोग असकोट से आराकोट तक निरन्तर इस यात्रा के सहभागी रहे है। जिसमें प्रमुख रूप से पत्रकार, लेखक, फोटो जर्नलिस्ट, शोधार्थी और अन्य समाजविज्ञानी, इतिहासकार आदि शामिल रहे है। यात्रा दल के प्रमुख और वरिष्ठ इतिहासकार, यायावर व पद्मश्री प्रो० शेखर पाठक ने अपने अनुभव में खतरनाक तथ्य प्रस्तुत किए है। उन्होंने बताया कि 25 साल उत्तरप्रदेश के हिस्सा और 25 साल अलग उत्तराखंड राज्य यानि 50 साल की इन छः यात्राओं में कई जन संकट सामने आए है। पहली यात्रा में जहां स्कूलों में मात्र गिनती की लड़कियां दिखती थी, अब स्कूलों में बालिकाएं स्कूल जाती दिखाई दी है। पिछली यात्राओं में जहां सड़क नहीं थी वहां सड़क तो पहुंचाए गई, पर जन यातायात की समुचित व्यवस्था अब तक नही बन पाई है। अधाधुंध सड़क निर्माण, जल विद्युत परियोजनाओं ने उत्तराखंड का पर्यावरण ही बदल दिया है, भारी भूस्खलन और जंगलों की आग ने राज्य का बेशकीमती प्राकृतिक संसाधन खत्म कर दिया है। इसके इतर आज भी समाजो में जातिवाद का दंश कूट कूटकर नजर आता है। इन सभी विषयो पर पद्मश्री प्रो० शेखर पाठक ने खुलकर बातचीत की है। प्रस्तुत है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश –

Dr. shekhar pathak
Dr. shekhar pathak

– यात्रा, असकोट आराकोट अभियान।
प्रो॰ पाठक – 1974 में मैं एम॰ ए॰ का छात्र था, उन दिनों उत्तराखंड हिमालय में चिपको आंदोलन की शुरूआत हुई थी। यह पहली असकोट आराकोट यात्रा थी, इसके प्रेरक आदरणीय सुंदरलाल बहुगुणा थे। सुंदरलाल बहुगुणा की प्रेरणा से हम यात्रा में शामिल हो गए। विजय जड़धारी, कुंवर प्रसून, शमशेर बिष्ट और अन्य तमाम लोग इस यात्रा में शामिल हुए। पेड़, पानी बचाने का यह आंदोलन जन जन का हो चुका था। 1984 में इसी यात्रा के दौरान सम्पूर्ण उत्तराखंड में शराब नहीं रोजगार दो आंदोलन, 1994 में राज्य का आंदोलन और 2004 में जगह जगह बांध विरोधी आंदोलन चल रहा था। 2014 में विकास के मुद्दो पर अलग अलग जगहों पर लोग आंदोलित दिखे है। पर 2024 में इस यात्रा के अंतराल में लोगो में उदासी दिखी है। मगर इस साल के यात्रा में सबसे भयावह स्थिति वनाग्नि की दिखी है। यात्रा काल के 28 दिन तक लगातार जंगलों में आग लगी दिखाई दी है। इतनी खतरनाक वनों की आग हमे कभी जीवन में नही दिखाई दी है। ऐसा लग रहा था कि उत्तराखंड के जंगलों को किसी साजिश के तहत आग के हवाले किया जा रहा है।
– इस दौरान की यात्रा में सबसे बड़ा संकट क्या दिखाई दिया।
प्रो॰ पाठक – मैने कहा कि जंगलों की भयावह स्थिति किसी बड़े संकट को इंगित कर रही है। दूसरा इस दौरान ऊंचाई के गांव पेयजल के संकट से जूझ रहे थे। उनके पानी के प्राकृतिक जलस्रोत सूख चुके है। वे ग्रामीण कारण को ढूंढ रहे है कि इस समय उनके प्राकृतिक जलस्रोत कैसे सूख गए है। लोगो ने उन्हे बताया कि उनके गांव और नगर में जल जीवन मिशन के तहत करोड़ो की पेयजल योजना पंहुचाई गई है, पर उनके घरो में लगे नलो में अब तक पानी का बूंद तक नहीं टपका है।
– और यात्रा के सुखद पल।
प्रो॰ पाठक – यात्राकाल में कुछ कुछ स्थानों पर सुखद पल जरूर मिले है। जब हम मुनस्यारी, चमोली के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में थे तो वहां कुछ लोग कुटकी जैसी जड़ी बूटी की खेती कर रहे थे। जिनकी आजीविका बहुत सुखद दिखाई दी है। इसी तरह उत्तरकाशी के रवांई क्षेत्र में लोग नगदी फसल और बागवानी करते दिखाई दिए है। इन क्षेत्रों से पलायन बिल्कुल भी नही था। जबकि इस वर्ष किड़ाजड़ी लेने गए लोग हिमालय क्षेत्र से निराश लौट रहे थे। उन्होंने असकोट आराकोट यात्रियों को बताया कि इस साल किड़ाजड़ी मिल नही रही है, बहुत ही कम मात्रा में मिल रही है। उन्होंने यह आशंका जताई कि जलवायु परिवर्तन के कारण ऊंचाई के हिमालय क्षेत्र में किड़ाजड़ी पैदा नहीं हो रही है। गांव-गांव सड़क पहुंच गई, पर जन यातायात का एक बड़ा अभाव राज्यभर में देखा गया है। सुखद पल के साथ आप जानना नही चाह रहे कि दुखद पल क्या रहा है। दरअसल जो समस्या पहली यात्रा में सामने आई थी, वह समस्या इस बार दुबारा दिखाई दी है। बीच की यात्राओं में ऐसा लग रहा था कि जातिवाद की यह समाप्त होने वाली है। यह समाज में घुन की तरह बढ़ रही है। राज्य में जातिवाद की समस्या बहुत ज्यादा दिखाई दी है। लोग आधुनिक विकास की ओर नही बढ़ रहे है, लोगो में पाखंड और अंधविश्वास जैसी स्थिति पैदा की जा रही है जो जातिवाद को बढ़ावा दे रही है।
– यात्रा ही क्यों, कोई और माध्यम।
प्रो॰ पाठक – आजकल माध्यम बहुत है। पर जो अनुभव आप निश्चित स्थान पर पहुंचकर ले सकते है, इसके लिए यात्राएं जरूरी है। जैसे हमने देखा कि 1974 की यात्रा में लोक भाषा का जो प्रभाव था, उसके कारण लोगो में सामूहिकता अधिक दिखाई देती थी। वाह चाहे उनके प्रतिदिन के कार्यों में हो या अन्य सुख दुख के आयोजन में। इस बार की यात्रा में लोक भाषा का प्रभाव कम दिखाई दिया है, जिसके कारण लोग मुद्दो पर एक साथ नही दिख रहे थे। अर्थात यात्राएं जीवन में करनी चाहिए। अच्छा हो कि लोक सेवकों, जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों को यात्राएं करनी ही चाहिए। यात्राओं से सीखने को बहुत कुछ मिलता है। इस बार की यात्रा में जो नया अध्याय जुड़ा है वह है चारधाम यात्रा रूट पर गंदगी का आलम जो हमें दिखा, वह भविष्य के लिए बहुत चिंता का विषय है।
– खास अनुभव।
प्रो॰ पाठक – राज्य में धार्मिक उन्माद फैलाया जा रहा है। जबकि इसी राज्य में धार्मिक स्थल लोगो के लिए स्वरोजगार के साधन बनाए जा सकते है। चारधामों में गंदगी का जो आलम देखा वह बहुत ही विभत्स था। केदारनाथ और यमनोत्री में घोड़ों, खच्चरों की लीद के निस्तारण हेतु कोई व्यवस्था नहीं है। सीधे नदियों में उड़ेला जा रहा है। लगभग 1200 किमी की लंबी पैदल यात्रा को 45 दिन में पूरा किया गया है। इस अंतराल में असकोट आराकोट अभियान के पदयात्रियों ने प्रकृति व संस्कृति, रोजगार और उधमिता, लोक भागीदारी और हरित शासन, तीर्थतान, पर्यटन अन्य साहसिक खेल, महिलाओ के स्तर, संसाधन आदि विषयों की पड़ताल की है। अलग अलग संस्कृतियों ने अपनी विरासत को संजोए रखा हुआ है। यह यात्रा 36 नदी घाटियों से गुजरते हुए लगभग 300 से अधिक गांव तक पहुंची है। उन्हे बताया गया कि राजी समाज संकट में है। यह शांत समाज है। इनके पास जमीन नही है और न ही कोई पहचान पत्र है। इनकी परंपरा में है कि जब उनके परिवार में किसी की मृत्यु होती है तो वे वह घर छोड़कर दूसरी जगह अपना बसेरा कर लेते है। यह भी देखा गया कि राज्य बनने के 25 सालो में लोगो की आवाजाही के लिए काली, गोरी, टौंस आदि नदियों पर पुल नही है। इसलिए ग्रामीण अंचल में कुछ नौजवान रोजगार के अभाव में ताश के पत्ते खेलते दिखाई दिए है। पहाड़ की महिलाओं का बोझ आज भी वैसे ही है, सिर्फ काम का तरीका बदला है। दरअसल पहाड़ में महिलाए ट्रैक्टर चलाती दिखीई दी है। जबकि ऊंचाई के क्षेत्र में आज भी भेड़ बकरी पालन जिंदा दिखाई दिया है। सरे राह पहाड़ में विशालकाय मशीने बेतरतीब ढंग से निर्माण कार्यों में जुटी है। यहां तक कि अब पहाड़ों पर खनन का कारोबार भी तेजी से बढ़ा है। यह उन्हे सर्वाधिक पिंडर नदी के जलागम क्षेत्र में दिखाई दिया है। यमुनोत्री के गरम कुंड में जो भी महिला स्नान करती है वह नहाने के बाद अपनी साड़ी नदी में विसर्जित कर देती है। यह पाखंड भी स्पष्ट दिखाई दिया है जो कभी यमनोत्री में होता नही था। यहां तक कि स्थानीय लोग भी इस परंपरा की कोई जानकारी नही रखते है।
इस यात्रा में यदि उन्हें थोड़ा आशा की किरण दिखी, तो वह मल्ला दानपुर, पैनखंडा, रवाई आदि क्षेत्रों में। यहां कुटकी और प्याज, राजमा सहित अन्य नगदी फसलों की खेती करते लोग दिखाई दिए है। यही वजह है कि इन क्षेत्रों में पालयन शून्य मात्र भी नही दिखा है। गांव के मकानों को बनाने का बदलता हुआ दृश्य देखा गया है। अधिकांश नए भवनों की छत टीन शेड से बनाई गई है। टिहरी के शिवजनी को लोक कलाकार वाली पेंशन नहीं मिल रही है। यह वही शिवजानी है जिन्होंने वर्ष 1957 में 26 जनवरी को केदार नृत्य की प्रस्तुति गणतंत्र दिवस की परेड में दी थी।
– उम्र के 74 बरस।
प्रो॰ पाठक – क्यों यात्राओं में उम्र का कोई बैरियर है। मैं इतिहास का विद्यार्थी हूं। इसलिए मुझे इतिहास के साथ साथ वर्तमान समझना जरूरी है। हर इतिहास के छात्र को यात्रा अवश्य करनी चाहिए।

– पहाड़ ग्रंथ।
प्रो॰ पाठक – पहाड़ का जब हम प्रकाशन करते है तो इस बात का विशेष ध्यान दिया जाता है कि जिस मुद्दे पर अध्याय, आलेख, वृतांत आदि आदि लिखा जाता है, उसमे प्रामाणिकता का विशेष स्थान होता है। यही वजह है कि देश और दुनिया के शोधार्थी पहाड़ दस्तावेज को जरूरी पढ़ते है। आज तक की उपलब्धता यही है। पहाड़ को पढ़ने से लोक से लेकर विकास और आजीविका तथा मानवाधिकारों के कई आयाम मिलते है। पहाड़ दस्तावेज को हर अध्येता संदर्भ के रूप में इस्तेमाल करता है।
अंत में
प्रो० पाठक – बहुत कुछ है। कुछ बाते है जो इस यात्रा में हमारे सामने आई है। उनका जिक्र करना जरूरी है। अप्रत्याशित परिवर्तन, विकास की नई योजनाएं पहाड़ के सौंदर्य और पर्यावरण के लिए खतरे का संकेत कर रही है। लोगो को धार्मिकता की झूठी दिलासा दिलाई जा रही है और लोग आपस में बुरी तरह बंट गए है। इन हालातो से राज्य की सांस्कृतिक पहचान खोती जा रही है।

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