उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, शोध और इतिहास के दो दिग्गज समकालीन हिंदी प्राध्यापक (डॉ. राम सिंह और डॉ. शोभाराम शर्मा)
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पौड़ी गढ़वाल के पतगाँव में 6 जुलाई,1933 को जन्मे डॉ. शोभाराम शर्मा हिंदी अध्यापक और शोधार्थी के रूप में अपने जीवन के नौ दशक पूरे करेंगे. उनकी अकादमिक उपलब्धियों को सम्मानित करने के लिए 29 सितंबर, 2023 को उन्हें विद्यासागर नौटियाल सम्मान से नवाजा जा रहा है. 60 के दशक में उत्तराखंड के लगभग अनजान रहवासी राजी जनजाति की भाषा का बेहद चुनौतीपूर्ण काम उन्होंने हाथ में लिया और तत्कालीन उत्तर प्रदेश के सरकारी कालेजों में हिंदी प्राध्यापक के रूप में काम करते हुए 1992 में राजकीय कॉलेज, बागेश्वर से सेवामुक्त हुए. उत्तराखंड के मिथकीय इतिहास को लेकर भी उन्होंने बहुत काम किया, खासकर लोकगाथा प्रसंगों को लेकर लिखा गया उनका कहानी-संग्रह ‘तीलै धारो बोला’ खासा चर्चित हुआ. भारत-नेपाल की सीमा पर रहने वाली आदिम जाति वनरावतों के सामाजिक-सांस्कृतिक-संबंधों पर आधारित उनका उपन्यास ‘काली वार-काली पार’ और उत्तराखंड के कत्यूरी राजवंश के मिथकीय इतिहास पर किया गया काम शोधकारों को एकदम नयी दृष्टि प्रदान करता है. चीनी क्रांति और जन-अपेक्षाओं की राजनीति की पक्षधरता उनकी एक निजी पहचान है. नब्बे वर्ष की उम्र में रचनात्मक दृष्टि से सक्रिय इस विचारवान मनीषी को साक्षात् देखना सचमुच हम-सबकी उपलब्धि होगी.

17 जुलाई, 1937 को पिथौरागढ़ में जन्मे डॉ. राम सिंह ने लखनऊ विवि से हिंदी में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त कर स्वर्णपदक ग्रहण किया. 1970 में लोकसेवा आयोग से चयनित होकर उनकी नियुक्ति ठाकुर देवसिंह बिष्ट राजकीय कॉलेज, नैनीताल में हुई और 1997 में वह राजकीय कॉलेज, लोहाघाट के प्राचार्य पद से सेवामुक्त हुए. उत्तराखंड के इतिहास, साहित्य और पुरातत्व को लेकर लिखा गया उनका योगदान अविस्मरणीय है उनकी असाधारण कृति है ‘राग-भाग काली कुमाऊँ’, जो उत्तराखंड के जन-कंठ से अंकुरित हिदी का प्रथम मौखिक इतिहास है. इतिहास, पुरातत्व तथा जन-पक्षधरता के आधार पर कई वर्षों के परिश्रम से तैयार की गई वृहत पुस्तक ‘सोर (मध्य हिमालय) का अतीत’ उत्तराखंड के समग्र इतिहास की पहली प्रमाणिक पुस्तक है. दुर्भाग्य से डॉ. राम सिंह असमय हमसे छीन लिए गए.
डॉ. शर्मा और डॉ. राम सिंह नई पीढ़ी के शिक्षकों के सामने एक ऐसी नजीर हैं जो हमें बताते हैं अपने विषय के साथ गहराई के साथ जुड़ने के साथ ही अपने समय की वैचारिक चिंताओं को अपने अतीत तथा सांस्कृतिक धरोहरों के साथ कैसे जोड़ा जा सकता है. शोध और अध्ययन किसी एक विषय का मुंहताज नहीं होता, वह सर्वांगीण दृष्टि प्रदान करता है.







