Friday, March 6, 2026
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तिल तिल कर मर रहा है द्रोण होटल

तिल तिल कर मर रहा है द्रोण होटल

Drona Hotel is dying slowly
Drona Hotel is dying slowly

कभी देहरादून के गांधी रोड पर स्थित द्रोण होटल राजनीतिक गलियारों की सुर्खियों में रहता था। सत्ता और विपक्ष के हुक्मरानों का यह बहुत ही महत्वपूर्ण अड्डा था। जहां से उत्तराखंड सरकार पूरी तरह से चलती थी।

दरअसल व्यवस्थाएं बदली और व्यवस्था में कई तरह के सुधार आये। लेकिन द्रोण होटल की स्थिति दिन-ब-दिन बदतर होती चली गई। बता दें कि राज्य बनने से पहले यह होटल बहुत ही सुंदर, साफ – सुथरा और ऐतिहासिक रहा है। जो होटल राज्य बनते ही विधायकों और मंत्रियों का एक निश्चित स्थान होता था वह मौजूदा वक्त कुंठाओ से भर चुका है। जबकि कभी यहीं से नई सरकार का शुभारंभ हुआ था। यहीं बैठकर तमाम हुक्मरान सरकार के तमाम कामकाज संचालित करते थे। अब हालत ऐसी हो गई है कि होटल की स्थिति बदस्तूर जारी है।

गढ़वाल मंडल विकास निगम द्वारा संचालित यह सरकारी होटल इन दिनों तिल तिल कर मर रहा है। होटल अपनी कमजोरी पर हताशा और निराशा के बीच झूल रहा है। हालांकि इस होटल में ढांचागत व्यवस्था पूर्ण है, मगर अव्यवस्थाओ का आलम जारी है।

Drona Hotel is dying slowly
Drona Hotel is dying slowly

होटल के वर्षो पुराने गद्दों को बदलने तक की इस सरकारी होटल के व्यवस्थापको को फुर्सत तक नही है। सालभर पहले खरीदे गए सैकड़ों गद्दे होटल के एक स्टोर में दीमक और फफूंदी का अड्डा बनते जा रहे है। पिछले एक साल से इन गधों को होटल के कमरो तक नहीं पहुंचाया गया है। ताज्जुब यह है कि द्रोण होटल में चूंकि कर्मचारियों की भी कमी नहीं है।
यही नहीं द्रोण होटल की हालात इसे भी और खराब होती जा रही है। होटल की कैंटीन जिसे गढ़वाल विकास निगम संचालित करती है में खाना इतना महंगा है की जिसे कोई भी सामान्य नागरिक वहन नहीं कर सकता है। यहां पानी की 20 रुपए वाली बोतल 30 रुपए की मिलती है, चाय 55 रुपए, रोटी तवा 20 रूपए की मिलती है एक व्यक्ति को 300 रूपय से 400 रुपए तक के खाने का बिल भुगतान करना पड़ता है। इतने महंगे भोजन में विशेष कुछ भी नही है। होटल में बने तृष्णा बार व बारबर की दुकान की हालत भी महंगे की वजह से नाजुक हो गई है। होटल के कमरों की हालत इतनी खराब है कि सफाई, पंखे और तमाम अन्य सुविधाएं तिल तिल कर के मर रही है। यहां तैनात कर्मचारी कुछ कहने को राजी नहीं है। वह कहते हैं कि महंगाई का जमाना है और यह तो सरकारी प्रॉपर्टी है। यहां जो रेट तय होते हैं उसी को उन्हें स्वीकार करना पड़ता है। उनसे ₹30 पानी वाली बोतल का बिल मांगते हैं तो वह भी नहीं मिलता है। खाने का बिल मांगते हैं तो पक्का बिल नहीं देते हैं। कच्चे बिल पर जीएसटी और तमाम चीजों को जोड़कर के ग्राहकों को सुपुर्द किया जाता है। यही वजह है कि इस होटल में ग्राहक सिर्फ एक ही बार आता है, दुबारा आने की सोचता तक नही है।

कुल मिलाकर होटल इन दिनों घुट घुट कर मर रहा है। कोई देखने वाला नहीं है और ना ही इस होटल को व्यवसायिक रूप से सरकार ने संचालित करने का मन बनाया है। जानकारी का कहना है कि यदि होटल को व्यवसायिक रूप से संचालित किया जाए तो यह होटल सरकार को राजस्व एकत्रित करके ही देगा।

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