सच से साक्षात्कार कराती पताल-ती और सुनपट फिल्म

अनुभूती उत्तराखण्ड सिनेमा स्कूप के बैनर तले राज्य बनने के बाद यह पहला मौका था जब एक साथ दो पहाड़ी बैकग्राउण्ड की शॉट फिल्में सफलता की सीढीयां चढ रही हो। देहरादून के एसजे पराडाइज होटल में प्रदर्शित दोनो फिल्मों के क्लाइमेक्स ने श्रोताओं को सोचने के लिए विवश कर दिया है। पताल-ती नामक शॉट फिल्म पानी की महत्ता और पहाड़ के कठीन जीवन की प्राकाष्टा को प्रदर्शित कर रही है। जबकि ‘सुनपट’ नामक फिल्म पहाड़ की सबसे बड़ी समस्या ‘पलायन’ के दंश को रेखाकिंत कर रही है।
पताल-ती फिल्म में पहाड़ के सर्वाधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जल की महति आवश्यकताओं की कहानी को आधा घण्टे में बहुत ही सरल और नाम मात्र के संवाद से बता रही है कि पहाड़ के लोगों को मरने से पहले भी उस पहाड़ी तालाब का पानी चाहिए। दरअसल पताल-ती भोटिया समुदाय का शब्द है। गढवाली में इसे पताल-पाणी कहते है। अर्थात एक पोता जो अपने बीमार दादा को पताल-ती देना चाहता है। वह घर से रोटी, पानी, वर्तन आदि लेकर चलता है और सबसे ऊंचाई वाले स्थान पर जहां पताल-ती मिलता है की खोज में निकलता है।
पहाड़ के जन जीवन में कुछ चीजें है जिसे फिल्म में बिना संवाद के बताया गया है। अतः जब कोई घर में बीमार हो और आपके बाहर बहुत सारे कौवे रेंगने लग जाये तो अमुक नहीं बच पायेगा। इस फिल्म में निर्देशक सन्तोष रावत ने ऐसा ही दिखाया है कि जब उस पोते को अन्ततः पताल-ती मिल गया तो उसके बाहर कौवे रेंगने बैठ गये। वह समझ गया कि उसका दादा ने अब अलविदा कह दिया है। तो, वह पताल-ती नहीं लेकर आता है। इस फिल्म में बहुत कुछ है। सिर्फ तीन पात्र तथा मामूली से संवाद ने इस फिल्म को अन्तर्राष्ट्रीय पहचान दिलाई है। अब तक राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी इस फिल्म को देखना आवश्य है।

इसी तरह राहुल रावत द्वारा निर्देशित ‘सुनपट’ शॉट फिल्म ने आज के सिनेमा से जुड़े लोगों को एक दिशा दी है। सुनपट भी पहाड़ी गढवाली शब्द है। जिसका अर्थ सुनसान या शान्त है। फिल्म के शिर्षक से ही लगता है कि पहाड़ का वह दर्द जो सुनसान हो चुका है वह सुनपट में दिखाया जा रहा है। यह भी शॉट फिल्म है जो तकनीकी से लेकर संवाद और अभिनय तक मंझे हुए रूप में परोसी गयी है। फिल्म की कहानी भी पहाड़ के उस पलायन की पीड़ा को रेखांकित कर रही है जो अब नासूर बन चुकी है। फिल्म की कहानी में पहाड़ में सड़क, टेलीफोन को दर्शाया गया है। स्कूल थोड़ा दूर है जहां गांव के सभी बच्चे झुण्ड बनाकर पहुंचते है। मगर इन स्कूली बच्चों की परस्परता और मित्रता एक बारगी हर किसी को सोचने के लिए मजबूर कर देती है।
अर्थात आम फिल्मो की तरह प्रेम-मुहब्बत से हटकर इस फिल्म की कहानी बहुत ही खूबसूरती से प्रस्तुत की गई है। आरम्भ में जहां यह फिल्म दर्शको को हंसाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती है वहीं मध्य में यह फिल्म दर्शको के आंखो में आंसू भर देती है। कुलमिलाकार राहुल रावत के कुशल निर्देशन में बनाई गई ‘सुनपट’ शॉट फिल्म को राज्य के हुक्मरानो को अवश्य देखनी चाहिए।









उत्तराखंड का मान वर्धन करती हुए ये आधुनिक सिनेमा की ये नवीन विषय, एवम विधाएं पर आधारित फिल्में जो वर्तमान दौर की सबसे बड़ी चुनौतियो का मार्मिक वर्णन कर सारे जनमानस को झकझोर कर रख देती है।।
Hats to u Both🙏🙏