लोक संस्कृति पर अप संस्कृति का ग्रहण
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उत्तराखंड राज्य निर्माण के पीछे मूल भावना अपनी सांस्कृतिक पहचान और प्राकृतिक संसाधनों को बचाना था। किंतु आज सरकार जिस संस्कृति को परोस रही है,उसके चलते हमारी संस्कृति पर ग्रहण लग गया है । मैं पहाड़न मेरा ठुमका पहाड़ी, और गुलाबी सरारा जैसे फूहड़ गीत आज स्टेज शो , और समारोह की पहली पसंद हो सकती है I उससे लोक संस्कृति गीत संगीत का संरक्षण कतई संभव नहीं है। सरकार का संस्कृति विभाग भी दूर पहाड़ों में गुरबत में जी रहे कलाकारों को मातृ 1000, रुपए की पेंशन देकर लोक संस्कृति को बचाए रखने का ढोल पीट रही है।आज के युवा गायक यू ट्यूब पर एक रणनीति के तहत फर्जी आईडी बना कर जिस तादाद में अपने फालोवर्स दिखा कर वाह वाही लूट रहे है उससे लोक संस्कृति और कलाकारों का भला नहीं हो सकता है । रिमिक और प्हूजन का अत्यधिक प्रयोग भी पारंपरिक लोक संस्कृति के संरक्षण में बाधक है।
लोक के पारंपरिक वाद्य यंत्रों और कलाकारों कि न सिर्फ सरकार उपेक्षा कर रही है , साथ ही परिश्रमिक देने में भी भेद भाव कर रही है। राज्य के मंदिरों और संस्कृति विभाग में लोक वाद्य के पद सृजित कर उन्हे पूर्णकालिक रोजगार प्रदान कर ढोल और ढोली को बचाया जाना चाहिए। इनके गीत संगीत की स्थल रिकार्डिंग कर सभी लोक कलाकारो को लोक संग्रहालय में सुरक्षित किया जाना चाहिए । युवा कलाकारों को भी अध्ययन के बाद इस पेशे में उतरना चाहिए। अन्यथा इस राज्य की गौरव शाली लोक गाथा और संस्कृति अतीत का गौरव बन कर रह जायेगी।








