लोक-कवि, गिदार हीरा सिंह राणा ज्यूक पुण्यतिथि (13 जून, 2020) पर विशेष : जमीन दगै जुड़ी कवि-गिदार
By Charu Tewari
लोक कवि कवि और गिदार हीरा सिंह राणा ज्यू गीत-कविता हमेशा आम लोगनक क्वीण-कहाणि कैते रई। गौं-गाड़ाक मैंसनक जतुक ले कष्ट और संघर्ष उनूल देखी, वै बै उनूल शब्द और कथ्य उठाई। उनर रचनाओं में जीवनक भोगी यथार्थ छू। जीवनाक कष्ट खालि उनार आपण न्हैंतन, बल्कि उ पुर जमानाक छन जनूल उनकैं गीत-कविता लेखणाक लिजी जमीन देछ। उनरि रचनाओं विशेषता य छू कि ऊं समाजाक बिषयों कैं भौत कसि बेर पकड़नी और लोगोंक कष्टों और विडम्बनाओं कैं उमैं शामिल करनी। उनार गीत-कविताओं में कथ्य तो छनै छन, दगडै आपण उद्गार व्यक्त करणी गैर भाव लै छन। उनर रचना-संसार में शब्द छांटणकि कला छु तो लोगों तक पहुंचणकि सम्वेदना लै छु। आम लोगों सरोकार में रची-पगी उनरि रचनाओंक आकाश लै भौत ठुल छू।
पहाड़ाक स्यैंणियौंक कष्ट, आम लोगोंकि तकलीफ, प्राकृतिक सौन्दर्य, श्रृंगारकि खूबसूरती, प्रेम बिछोहकि कहाणि, लोक स्वरोंकि सामूहिक अभिव्यक्ति, हिमालयाक संकट, व्यवस्था प्रति गुस्स, आपण हकों लिजी लड़नकि ताकत, सांचि बात दगाड़ ठाड़ हुणकि तराण, हमार जीवनकि जो लै दार्शनिकता छू उकैं इतिहास और संस्कृति बोधक साथ लोगनक बीच ल्यौंणकि क्षमता छू। जो लोग विपिन्न छन, मुख्यधारा बै पिछाड़ि छुट जानी उनरि छटपटाहटों कैंलै उनरि रचना अवाज दिनी। लोकभाषा सौन्दर्य, कथ्य, शिल्प, बिम्ब, प्रतीक और शब्द चयनक दगै जब राणा ज्यू आपण मधुर कंठैल गीत गानी तो उमैं प्रकृतिक संगीत आफी-आफी शामिल है जां। उसी देखी जाओ तो हीरासिंह राणा मूल रूपल म्याल- ठ्यलांक गीतकार-गायक छन। यैं बटि उनूल आपण रचनाओंक बिम्ब उठाईं। उनूल हमेशा आपूं कैं ‘गिदार’ बता। राणा ज्यू कभैं लै भौत लोकप्रिय गायक-गीतकार-कवि या कलाकार बनणक फैर में न पड़। यई कारण छु कि उनार कतुक रचना भ्यार नि ऐ पाय। ज्याधातर गीत रिकौड ले नि है पाय। उनूल जो लै रचै-गा उ सब लोक बै लिबेर लोकै कैं समर्पित छु। एक फक्कड़, सरल, उदार, सम्वेदनशील मनखी और ठोस रचनाकारक सबै गुण उनकैं ‘गिदार’ हीरासिंह राणा बनूनी।
हीरासिंह राणा ज्यूक रचना-यात्रा में उनर इलाक सल्ट कि राजनीतिक और सामाजिक चेतनाक भौत ठुल प्रभाव छू। उनीस सौ बयालीसक ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में सल्टक भौत ठुलि भूमिका रै। खुमाड़ गौंक चार आन्दोलनकारियोंल आपणि शहादत दैछ। महात्मा गांधी ज्यूल सल्ट कैं ‘कुमाऊंक बारादोली’ नाम दे। अल्माड़ जनपदक सीमान्त बिकासखण्ड छू सल्ट। प्राकृतिक सौन्दर्यल परिपूर्ण एक जाग छू मानिला। मानिला कै पास डढोली गौं में 16 सितम्बर, 1942 हूं हीरासिह राणा ज्यूक जनम हौ। उनर बौज्यूक नाम मोहन सिंह और इजक नाम नारंगी देवी छी। परिवारिक माली हालत भौत भलि नी छी। यैक कारण उनरि औपचारिक शिक्षा आठवीं तकै है सकी। उनर जादा टैम दिल्ली में बितौ। घर में सबूहै ठुल हणक वील परिवारिक जिम्मेदारी लै राणा ज्यू कै ख्वार में छी। आपणि रचनात्मकता कैं उनूल रामलीला मंचों बै अघिल बढ़ौण शुरू करौ। उनूल आपण पैंल प्रसिद्ध गीत ‘आ लिली बाकरी लिली छू…’ 1962 में देशाक पूर्व प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री ज्यूक उपस्थिति में गा। साल 1971 में मोहन उप्रेती ज्यूक निर्देशन में चलणी सांस्कृतिक संस्था ‘पर्वतीय कला केन्द्र’ दगै जुड़ीं। सुप्रसिद्ध रंगकर्मी लेनिन पन्त ज्यूक सहायताल राणाज्यू ‘गीत एवं नाटक प्रभाग’ नैनीतालकि टोली में भर्ती हईं। एक कलाकाराक रूप में प्रभाग में एक साल लै नि टिक सक। बाद में ब्रजेन्द्र लाल साह ज्यूक सुझाव पर ‘नव युवक केन्द्र ताड़ीखेत’ नामल एक रंगटोली गठन करौ। य संस्था माध्यमल उत्तराखण्डाक अलग-अलग इलाकों में कार्यक्रम प्रस्तुत करी।
उन दिनों देशकि प्रतिष्ठित पत्रिका ‘दिनमान’ में फिल्म और साहित्य बिषयों कैं पहाड़कै नेत्र सिंह रावत ज्यू देखछी, उन दगै राणाज्यूकि मुलाकात है। रावत ज्यूल राणा ज्यू कैं लेखण और गीत गाणक ठुल मंच प्रदान करौ। दूरदर्शनल 1976 में आपण पैल स्वतन्त्र प्रसारण शुरू करौ। नेत्र सिंह रावत ज्यूल उनुकैं दूरदर्शनक पैंल दिनक कार्यक्रम प्रस्तुत करणक मौक देैछ। बाद में आकाशवाणी, दूरदर्शन और देश-बिदेशाक कई मंचों बै राणा ज्यूल आपणि प्रस्तुति देईं। उनार तीन कविता संग्रह ‘प्योली और बुरांस’ (1971), ‘मानिलै डानि’ (1976) और ‘मनखों पड्यौव में’ (1987) प्रकाशित र्हइं। राणा ज्यूक पैंल कैसेट ‘रङिल बिन्दी’ (1986) बजार में ऐछ। वीक बाद ‘सौ मनों की चोरा’ (1991), ‘रंगदार मुखड़ि’ (1994), ‘हाई कमाल’ (1996), ‘त्येरि आंखि’ (2000), ‘अहा रे जमाना’ (2002) और ‘हंसनि मुखिम’ (2007) कैसेटों और सीडी में संकलित गीत श्रोताओंल भौत पसन्द करीं।
आपण पुर जीवन में संघर्षों और मूल्योंक दगाड़ चलणी राणा ज्यूल आपण पारिवारिक जीवन लै भौत बाद में शुरू करौ। उनूल श्रीमती विमला राणा दगै ब्या करौ। उनर एक च्यल और एक च्यैलि छी। च्यैलिक बीमारी कारण 2012 में मौत हैगे। उनर च्यल और घरवाइ दिल्लीक विनोदनगर में रौनी। दिल्ली सरकारल जब 2019 में ‘गढ़वाली, कुमाउनी, जौनसारी भाषा अकादमी’ घोषणा करी तो राणाज्यू कैं वीक पैंल उपाध्यक्ष मनोनीत करौ। कुमाउनी लोक साहित्य कैं आपण भौत ठुल योगदान दिणी जनकवि राणा ज्यूक 13 जून, 2020 हैं निधन है पड़ौ।
हीरासिंह राणा ज्यूक गीत-कविता सिर्फ मनोरंजन नि करन, बल्कि उनुमैं पाठकों कैं भितेर तक झकझोर द्यणैकि क्षमता छू। आन्दोलित कर सकण कि चेतना छू। उनर पैल कविता संग्रै ‘प्योली और बुरांस’ प्रकाशित हौ। उ टैम पर राणा ज्यूक उमर तीस साल है बेर लै कम छी। यौ संग्रै में संग्रहित रचनाओं कि परिपक्वताल उनर कविताओंक गहरी पैंठ कैं देख बेर समझी जै सकौं। यौं कविताओं स्तर देख बेर कतई नि लागन कि यौ कवि’क पैल कविता संग्रै छू। इमैं ज्याधातर कविता देशप्रेम और आपण जन्मभूमि पर रची छन। उनार कविताओंक बिम्ब और प्रतीक बतौनी कि उनूल कतुक गूढ़ताक दगै आपण रचना-यात्रा शुरू करी। यकैं जन्मभूमि पर लेखी एक गीतल समझी जै सकौं-
अजुठी उज्याइ, रतब्याणै की रुपसा उदंकार,
किरण सुनुका झलकै बै, छलकैं त्यर स्यौनि सिंगार
धौं चरण त्यर सागर मणि मोत्यों लै हरदम।
य गीत में ‘अजुठी उज्याइ रतब्याणै की रुपसा उदंकार’ जास उपमान और शब्द चयन अद्भुत छन। राणा ज्यूल देशकि आजादीक उपमा यसि रत्तै दगै करी, जैक उज्याव आइ जुठ नि है रय। यसि रत्तीयकि कल्पना अचम्भित करणी छू। भारतक बहुरंगी चित्र कैं बतौणक लिजी उनूल बता कि रत्तीयक उगणीं सूरज आपण पैंल किरणल भारत माताक मांग भरों। सागर त्यर खुटां कैं मोतियोंल धूंछ।
हीरासिंह राणा ज्यूक एक सुप्रसिद्ध गीत छु- ‘लस्का कमर बांदा, हिम्मता का साथा/फिर भोलो उज्याली हली, कां लै रली राता।’ य गीत में विचार, संघर्ष, उमीद और जीतक लिजी जो आग्रह छु उ बता कि हीरांिसंह राणा ज्यूक रचनाओं में आम लोगनक हकों लिजी लड़नै प्रेरणा दिणी चेतना भौत शुरू बै छी-
हण चैं मनम हौंस, छु क्या चीज घबराणौं,
धरि खुटि अघीला फिरी के पछिला आणौं
छौ आपण हातौं मजा तकदीर बनाणौ
जब क्वै मानो बाता, खुट-हात फौलादा
शीर पाणिकी वां फुटली, जां मारुलो लाता।
राणा ज्यूक य गीत एक टैम पर उत्तराखण्डक आन्दोलनोंक शीर्षक गीत बन गोछी। उनर एक गीत छु- ‘हम पीड़ लुकानै रया…’ य गीत में बिम्ब, प्रतीक, शिल्प, अलंकार और शब्द चयन अद्भुत छन-
दिन आनै-जानै रया
हम बाटी कैं चानै रया
सांसों की धागिमा आंसों का
हम फूल गछ्यानै रया।
य गीत में सांसोंक धागल आंसुक फूल गछ्यौंण अकल्पनीय प्रतीक छू। जीवनाक बिडम्बनाओं और संघर्षों बै निकली आवाजों में इतुक गैर पीड़ कैं हीरांिसंह राणा ज्यू समझ सकनी।
हीरासिंह राणा ज्यूक एक प्रतिनिधि कविता छू- ‘हिरदी पीड़।’ समाजकाक आखिरी लैन में ठाड़ हई लोगनकि पीड़ कैं भौत गहराई में उतर बेर रची य गीतक दार्शनिक पक्ष देखण लैक छू-
चढ़न सूरज कणि अरग चढ़ानी,
बढ़नी डाई कणि पाणि प्यवानी।
निगरह्याई रात कैले नि देखी,
चायो सबूंलै राती उज्याणी।
य गीत में ‘निगरह्याई’ शब्द राणा ज्यूक शब्द चयन और कथ्य पर उनर मजबूत पकड़ कैं बतौं। असल में य खालि एक काइ रात न्हैंतन, यसि गैर काष्टोंल भरी रात छू जैकैं आसानील नि देखी जै सकन। वीक लिजी उतुकै पीड़ में उतरण पडौं। लोगन में कष्टभरी रातक बाद एक यस रत्तीयकि उमीद छू जो उनर जीवन में उज्याव ल्हिबेर आल। राणा ज्यू हर कष्ट भरी रात कैं आपण जीवन में यसिक शामिल कर ल्हिनी कि उ हर नई रात्ती ब्याणक आस जगौं। उनरि य आस में भौत अघिल तक हिट सकणी चेतना छू। य चेतना कैं समझणक लिजी एक दृष्टि लै चैंछ। हम कै सकनूं कि राणा ज्यू शब्दों और भावों दगड़ै सृष्टिक साथ चलणी कवि लै छन। जीवनाक संघर्षों दगै लड़नी, आपण स्वैणों कैं कुचलते देखणी। समाज कैं भौत बार दिनक उज्याव लै अन्यार जस लागूं।
आम लोगनक तकलीफों कैं इतुक पीड़कि साथ धरणकि कला राणा ज्यू कैं हौरों है अलग करैं। ये पीड़ कैं राणा ज्यू ‘गरीबै चेली ख्वट डबला…’ कविता में व्यक्त करनी। पहाड़ाक गौंनूंक गरीबी-लाचारी बटिक पैद हई निराशा मजि आम आदिम भौते स्वैंण बुण बेर आपण एक ठुल संसार बणै द्यौं। परिस्थितियों चलते कसिक वीक उमीद बिखरनी-टुटनी, उकैं पकड़नकि संवेदना हमेशा हीरासिंह राणा ज्यूक कविताओं में छू। टाल हाली कपड़ों में गरीब कि चेलिक पास एक डबलक सिक्क छू। उ इकैं लिबेर भौते रौंती रैं। हावम उड़नै। वीक खुट जमीन में न्हैंतन। आपण हातम उ सिक्क कैं कस्स कै पकड़ बेर उ दुकान में जैंछ। गाण-माणि लगैं कि य डबलल उ पुर दुनी कैं खरीद सकैं। आपण इजाक लिजी चरेऊ, बौज्यूक लिजी साफा, छ्वाट भैक लिजी खिलौंण, ठुल दादीक लिजी मुरुलि, भौजिक लिजी नौ पल्लै जंजीर खरीद सकैं। आपण गोरुक नानि बाछिक गाव में बादणाक लिजी एक घण्टी लै खरीदण चांछ। वील य डबलक सिक्क में आपण भौत ठुल दुनी बसै है। उ समझें कि दुनी में जो लै सबूहैं भलि चीज छू उकैं खरीद ल्हेलि। उ आजि य सब सोच बेर बुदबुदै रैछी। आपण स्वैणेंक एक नई दुनी बसौण रैछी। दुकानदारल वीक भावों कैं समझ बेर वीक झगुलि में मूंगफलि-चाणक कुछ दांण धरते हुए बता कि त्यर सिक्क ख्वट छू। फाटी झगुलि बे सब मूंफलि और चांण जमीन में बिखर गईं।
इज हैं चर्यो, बौज्यू हैं टांकौ,
नान भुलि मरिय छुण मुण्यांकौ।
एक मुरुली दाज्यू हैं दियौ,
भौजि हैं जंजीर जो हो नौ पला।
बांकि रहै गेछ गोठै कि बाछि,
घानि दि दिना त बड़ै दया छी।
‘कौतिकौ थौ’ हीरासिंह राणा ज्यूक श्रेष्ठ रचनाओं में एक छू। समाजक मनोविज्ञान कैं ध्यान में धरि बेर य कविता कैं जसी बुण राखौ, उ देखण लैक छू-
पुरण ‘घौ’ फिरि गय उचेड़ी,
हैंसि खितकर आंसौं रौ में।
जुग बिता आजी लै बितिला,
हनै रैंल म्यर घौ हिकौ में।
तुम गया पर मैं कथां जौं,
हौय तो आंखर कौतिकौ थौ में।
कौतिक में आपण जाणी-पछ्याणी भौत लोगनक जमघट। साल में एक बार य जमीन पर लागणी कौतिक में एक अलगै रौंत छू। दूर गौं-गाड़ बे मिलहूं औणी सबूंक मिली-जुली सुख-दुख छन। कौतिका रौंत में नाचणी-गाणी लोगन कैं कौतिक थौ सालों बे देखणौ। उकैं लागूं कि जब लै य कौतिक हुं सब म्यर घौनू कैं सेकनी। एक-द्वि दिन बाद जब य मायावी भीड़ छंट जैंछ तो कौतिक्यार आपण-आपण घरौ हैं ल्है जानी। कौतिक्यारौंल आबाद कौतिकौ थौ फिर बीरान है जां। कौतिकौ थौ यस प्रतीक छू जो समाजक बीच में लै आदिमक इकलपन कै बतौंछ।
राणा ज्यूक एक प्रसिद्ध गीत छू ‘आ लिली बाकरी लिली छ्यू…।’ साठक दशक में आकाशवाणी लखनऊ बटि ‘उत्तरायण’ कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध लोक गायिका बीना तिवारी ज्यूक अवाज में य गीत के श्रोताओंल भौत पसंद करौ। बकार और वीक गुसैंक माध्यमल समाजाक अन्र्तसम्बन्धों के देखणकि य अद्भुत दृष्टि छू। राणा ज्यूक गीतों में मनुष्य और मनुष्यकि वेदना अलावा बकार-बैल जास पालतू जानवर लै छन। बकार और ग्वावक सुख-दुख, हंसी-खुशी साझा छन। बकारौंक लिजी ग्वावकि जिम्मेदारी और बाकर दगै वीकि आत्मीयता य गीत में देखी जांछ। बाकर ग्वावक लिजी एक पालतू पशु न्हैंतन, बल्कि वीक दगड़ी छू-
जब निखया मैंल बुधुआ, मेरि बाकरिल गोव,
ग्वेलदेराणी द्विय डबला भेट चढ़ौला भौव।
हम ग्वालों की त्वी छै देवी और कहैं कूं… कूं…
आ लिली बाकरी लिली छ्यू…छ्यू…।
हीरासिंह राणा ज्यूक एक भौते प्रसिद्ध गीत छू-‘आय… हाय रे मिजाता।’ कथ्य, शिल्प, बिम्ब, प्रतीक और कोमल भावों साथ प्रकृतिक यस चित्रण राणा ज्यूई कर सकनी। उनर गीतों में प्रकृतिक सौन्दर्य प्रकृति प्रदत्त छू। य स्वाभाविक रूपल उनर रचनाओं में ऐ जांछ। मानिलै डानि बै हिमालयकि उ छटा बिस्तार छू जां उ आपण रूप-यौवन कैं बदलते रौं। बुरांसक फूलों दगड़, बांज-चीड़क बनों बै निकलणी संगीत बटिक, गाड़-गध्यार, छीड़ोंक कल-कल करणी आवाजल, उच्व हिवंल-कांठीक बुग्यालों बै ल्हि बेर हरी-भरी डान-कान सब प्रकृतिक बसाई छू। प्रकृतिक तमाम बिम्ब राणा ज्यूल य गीत में शामिल करी छन। सई मायनों में राणा ज्यू सौन्दर्यक कवि छन। प्रकृति और नारीक सौन्दर्यक नई उपमान कसी गढ़ी जानी, य गीत वीक उदाहरण छू-
रङिली बिन्दी घागरि काई,
धोती लाल किनार वाई,
आय हाय रे मिजाता, ओइ होइ रे मिजाता।
एक हाति दातुली छौ एक हात ऐना,
नौ पाटै घागरी परा रेशमियां चैना।
य गीत कैं भले ही नारी सौन्दर्य दगै जोड़ बेर देखी जां पर यो प्रकृतिक सम्मोहन छ, प्रकृति दगै अनुराग छू। पूर्णिमाक जून हिमालयक ख्वर पर बिन्दी छू। हिवांल-कांठीक काव घ्यर घागरक प्रतीक छू। सुकिल हिमालयक तली बे पड़नी लालिमा साड़िक किनारक प्रतीक छू। हिमालयी नारीक सौन्दर्य और श्रम कैं निरूपित करणी एक यस बिम्ब छू जमैं प्रेम, श्रम, संघर्ष, सौन्दर्य, सम्वेदना, सदभाव और समभाव शामिल छू।
हीरासिंह राणा ज्यूक दुसर कविता संग्रै छु ‘मानिलै डानि।’ य संग्रै में उनर एक सुप्रसिद्ध गीत छ-‘म्यर मानिलै डानी….।’ य गीत भले ही मां मानिला देवी स्तुति छू, पर य गीतक भाव राणा ज्यूक कविता यात्राक दिशा कैं बतौं। प्रार्थना में उनूल मां मानिला हैं महाविद्यालय बनौण लिजी बिनती करी छू। यैल समझी जै सकौं कि उनार गीतों में सामाजिक सरोकारों लिजी कतुक जागि छू-
इण्टरा करौछ त्वीलै ‘काठी’ कौ इस्कूल
डिगरी कौलेज देवी ख्यलौं हरौ झूल
सब नान चैरई नानी, हम तेरि बलाई ल्यंूल।
हीरासिंह राणा ज्यूल आखिरी पद में आयण परिचय दि बेर साबित करौ कि ऊं आपूं कैं ‘गिदार’ किलै माननी-
मैं छूं ‘हिरू’ डढोई कौ, पीड़ै की गढोई,
त्यर खुटां तब ल्यै रौं, यौ पीड़ै कैं बटोई
मेरि बिनती जाए मानी, हम तेरि बलाई ल्यूंल।
क्वै आपणि पीड़कि इतुक ठुल गढोइ बनै सकौं, एक अकल्पनीय बिम्ब छू। आपण पीड़कि उपमा एक घासकि गढोइ दगै करण, जमैं कतुकै पुल हनी। एक घासक पुल में भौते तिनाड़ हनी। हजारों तिनाड़ा कैं मिले बेर एक गढोइ बनैं। राणा ज्यूक य दुखकि गढ़ोइ उनरी न्हैतन, पुर समाजक संकट उनार छन। यैक लिजी उनूल कौ कि मैं समाजाक सारै कष्टोंक गढ़ोइ माताक चरणों में लै रयौं। उनूल आमजन दगै य जुड़ाव कैं आपणि रचना-यातरा में हमेशा कस बेर पकड़ौ।
राणा ज्यूक तिसर कविता संग्रै ‘मनखों पड़यौव में’ 1987 में प्रकाशित हौ। य संग्रै में एक गीतकार और गायक है भ्यार निकल बेर उनूल कवि रूप में आपण नई परिचय करा। ‘मनखों पड़यौव में’ आपण निजी कष्टों जाग सामाजिक बिसंगतियों और विद्रूपताओं कैं जादा जाग मिली। राणा ज्यूक कविताओं में प्राकृतिक सौन्दर्य और भावोंक कोमलता छू। ‘फूल टिपौ-टिपौ है रै’ कविता में उनूल प्रकृति कैं कथ्य बनै बेर यस शिल्प गढ़ौ कि राणा ज्यू प्रकृतिक सच्च उपासक और अनुरागी लागनी। उनूकैं उन फूलों कैं टोड़न में लै कसक लागैं जनुकैं टोड़ बेर गौंपन फूलदेईक त्यार मनाई जांछ। राणा ज्यू कैं लागों कि फुलवारी बै फूल टोड़नी पुजारि फूलों दगै मनमानी करणौं। पुजारिक फूल टोड़न कैं लिबेर उनार भाव यास किसमाक छन कि फूलोंक राजा-रानी सहमी हुई छन। जो खिलती कली छन उनर रङ उड़ गो। डाइ-बोट सब कम्पकपानी। प्रकृति प्रति उनरि उदारता कविता में फूट पड़ी-
यो ऐगो पुजारि देखौ धैं, कैकैं टिपूं जाणी,
चुप्प छना रज फूलों का, चुप्प फूलों की राणी।
हर कुपइक रङ उड़ैगो, कैकैं मलासों में,
नौल-कुपव लग-लगे रैं।
हीरासिंह राणा ज्यूक रचनाओंक सबूहै मजबूत पक्ष छु- पहाड़कि स्यैणियोंक कष्टपूर्ण जीवन कैं उकेरण। उनर रचना संसारक एक ठुल हिस्स पहाड़ाक स्यैणियों पर केन्द्रित छू। उनूल पहाड़ाक स्यैणियोंकि वेदना कैं जो दृष्टिल देखौ वील उनरि सृजनता कैं नई आयाम दे। उनर सबै रचनाओं में पहाड़ाक स्यैणियोंक सौन्दर्य, संकट, साहस, श्रम, संघर्ष, जिजीविषा, कोमलता और ममतामयी रूप भौत गैर समझक साथ अभिव्यक्त छन। ‘दुल्हैणि’ कविताक एक चित्र देखौ-
चंचल बाली उमर उछाण लागि धाम जसी,
शर्मकि कोखिम लुकि गे क्वे बदनाम जसी।
बखतल मारि सिक्वोडिल खैचि लगाम जसी,
मैतकि मुलुकि रै गै बस्स एक फाम जसी।
राणा ज्यूक एक कविता ‘महेड़ी’ में पहाड़क स्यैणियोंक वास्तविक चित्र उभरों। पहाड़ाक स्यैणियोंक कष्ट समाजवादी छन। गरीब और अमीर स्यैणियोंक संकट एक जस्सै छन। न भल खाण, न पैरण, न ढकीण, न बिछौण। कलम-दवात कभैं पकड़ी ना। त्यागकि यसि प्रतिमूर्ति, कि घर-बण सबै जिमेवारी निभै बेर परदेश में जाई मैंस और नानतिनाक जिम्मेवारी लै वीकै ख्वार में छू-
भ्योव पखाणों का गीद गहानै,
खेतों का बीचम बिणै बजानै।
नाङड खुट्यों मा बुड़िया कानी,
च्यापिंछ पीडै कैं के नि चितानी।
पहाड़ा स्यैंणियोेंक तप और त्याग,
आफी बणाय जैल आपण भाग।
राणा ज्यूक एक प्रसिद्ध गीत छू ‘अजकाल हैरे ज्वाना…।’ य गीत में राणा ज्यूल प्रेम कैं उपासनाक चीज बता। हालांकि उनूल य गीत देशक आजादीक यौवन पर ल्यखौ। सल्ट में खुमाड़ाक शहीदोंक लिजी बनी स्मारक कैं प्रतीक बनै बेर उनूल नारीक सौन्दर्य कैं आजादीक उन्मुक्तता दगै जोड़ बेर अद्भुत बिम्ब बना-
यौ रूप के छौ जोभन, भरमत्त हैरैं सब्ब,
म्यर गौं-गाड़का नान-तिन,
त्यर भक्त हैर सब्ब।
हिट थापि दयूं तेरौ थाना मेरि नौली पराणा।।
‘गीद कस लेखूं…’ कविता में हीरासिंह राणा ज्यूक पुर रचना-संसारक विस्तार मिलूं। उनर पास अलग-अलग किसमाक गीद छन। महलोंक, टुटी छानाक, सुनु-चांदीक, टुटी भान-कुनांक भौते गीत छन, जनुमैं हम समाजकि पीड़ देख सकनंू। बताओ तो कस गीत लेखूं? द्वि डवल में बिचाणी ज्वानीक गीत जै लेखूं या ज्यौनारक लिजी मन्दिरोंक बेची गई घण्टीक गीत लेखूं। राणा ज्यू पुछनी कि अभावोंक बीच में घरोंक एक कुण में भुखैल जो मरि गो, उ गरीबक बिना कफनक लाश कि गीत लेखूं, जोभन में भरी बानक गीत लेखूं, गाव में हंसुलि, नाख में नथुलि, ख्वार में मांग टीका, गलोबन्द और हातों में पौंजी पैरी ब्योलिक गीत लेखूं या उ बेबस स्यैंणिक गीत लेखूं जैक ख्वारम बै बिन्दी झड़ गै-
छैं बाणी-बाणिका गीदा,
ठुलीका-नानिका गीदा।
छैं तिपुर महलों का गीदा
छैं टुटिया छानिका गीदा
सुनुका-चांदी का गीदा
छैं फुटिया भानि का गीदा।
हीरासिंह राणा ज्यूक गीत-कविताओं में समसामयिक सवाल लै भौत प्रमुखताल उठी छन। उत्तराखण्ड में चली कई आन्दोलनों में एक संस्कृतिकर्मी रूप में ऊं लगातार सक्रिय रई। कतुकै आन्दोलनों में न केवल उनूल गीत गाई, बल्कि उनुमैं शामिल लै हई। जिन सवालोंक जवाबक लिजी राज्य बनौ, ऊं स्वैण पुर नि हणकि पीड़ हमेशा उनर मन में छी। आपणि चिन्ता उनूल एक गीतक माध्यमल व्यक्त करी-
त्यर पहाड़, म्यर पहाड़
रय दुखों का ड्यर पहाड़
बुजुर्गों लै ज्वड़ पहाड़
राजनीति लै ट्वड़ पहाड़
ठ्यकदारों लै फ्वड़ पहाड़
नानतिनों लै छ्वड़ पहाड़।
हीरासिंह राणा ज्यूल प्रेम-सौन्दर्य पर लै भौत गीत-कविता रचीं। उनर एक गीत में बिम्ब और प्रतीक देखण लैक छन-
बुरांशकि फुली डाइ जसि, रङदार छै तू
कातिकी मौ जसी, के रसदार छै तू
केदार पुन्योंकि, उदंकार जून
कसम से हजारों में एक छाजछै ऐ।
श्रृंगाराक गीतों में प्रेम निवेदन कैं लै जो शालीनताल उनूल प्रस्तुत करौ, उ प्रेमक प्रति उनर समर्पण कैं बतौं-
जरा भी चहा धैं अगासम के छा ए
मुए बलबलानै इतुक नैं उड़ा ए
कभणि बै मैं चैरौं यों त्यर बाट-घटा कैं
कतुक छुटि र्गइं आजि यौ फिरि नौ जनम छौ।








