क्या गंगा -यमुना निर्मल हो जाएगी ?
By Suresh Bhai
पुराने समय की कहावत है कि “पानी में मल-मूत्र का विसर्जन और आग में थूकना” दोनों मनुष्य जीवन को सुखी नहीं रख सकता है।लेकिन जब मनुष्य श्रेष्ठ प्राणी बन गया है तब ये दोनों काम एक साथ कर रहे हैं।इन आदतों में सुधार न होने के कारण गंगा- जमुनी संस्कृति पर गंदगी का साम्राज्य बढ़ गया है। इसके बावजूद भी बुजुर्गों की पुरानी कहावतों के पीछे का जो वैज्ञानिक सच है उसकी चर्चा ही नहीं हो रही है और यदा-कदा सत्ताधारी लोग कह देते हैं कि वे गंगा और यमुना को साफ कर देंगे।यहां तक कि एक निश्चित समय सीमा की घोषणा भी कर देते हैं। हम गंगा के उस रौद्र रूप को भी भूल जाते हैं जब वह बरसात में स्वयं स्वच्छ हो जाती है। लेकिन जहां साल भर में गंगा, यमुना के जल में जितनी कमी होती है उससे कई गुना अधिक उसमें उड़ेली जा रही गंदगी की मात्रा भी दिनों दिन बढ़ ही रही है।यानी स्थिति अब इतनी बिगड़ चुकी है कि गंगा और उसकी सहायक नदियों में प्रतिदिन 10139.3 मिलियन लीटर में (एमएलडी) सीवेज जा रहा है। जबकि बताया जाता है कि अब तक इसको साफ करने के नाम पर लगाये गये सीवर ट्रीटमेंट प्लांट आधे के बराबर भी गंदगी को साफ नहीं कर पा रहे हैं। इसी पर करोड़ों रुपए भी खर्च हो रहे हैं फिर भी गंगा में उड़ेली जा रही गंदगी थोड़ी सी भी कम नहीं हो रही है।बल्कि जल की गुणवत्ता को जहरीला बनाने वाले कचरे की मात्रा दिनों दिन बढ़ती जा रही है। भूजल भी इतना अधिक प्रदूषित हो गया की उसके सेवन से तरह-तरह के रोग हो रहे हैं। अब तक गंगा सफाई के प्रयास कम नहीं है लेकिन इसके बावजूद भी हरिद्वार से ही गंगा जल स्नान करने योग्य नहीं है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने जब पहली बार बनारस से चुनाव में जीत हासिल की तो उन्होंने बहुत ही भावुक होकर कहा कि वे गंगा की अविरलता और निर्मलता की लिए काम करेंगे। जिसके फलस्वरूप नमामि गंगे परियोजना प्रारंभ की गई।
उस समय जल संसाधन मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल रही उमा भारती को गंगा सफाई की जिम्मेदारी भी दी गई थी।उमा भारती जी ने यूपीए सरकार के सामने भी गंगा पर बांधों और बैराजों का प्रबल विरोध किया था। उन्हें जब यह जिम्मेदारी मिली तो लोगों की बड़ी आशा थी की गंगा सचमुच में साफ हो जाएगी लेकिन उनके ढाई साल के कार्यकाल में गंगा सफाई के लिए प्रस्तावित बजट 20 हजार करोड़ में से जब लगभग 5 हजार करोड़ खर्च हुए तो एनजीटी ने पूछा कि गंगा के 2500 किमी लंबाई में कोई भी जगह बता दो जहां गंगा साफ हो गई है। और उनके बाद नितिन गडकरी जी को नमामि गंगे की जिम्मेदारी दी गई। उन्होंने 2019 तक गंगा की सफाई का दावा किया था। तब से अब तक स्थिति यह है कि हरिद्वार के बाद कोलकाता तक गंगा में स्नान करने लायक पानी भी नहीं बचा है। 2024 के अंत तक तो ऐसी स्थिति भी सामने आयी कि गंगा के उद्गम गंगोत्री के स्वच्छ जल में भी इतनी गंदगी बढ़ गई थी कि उसे भी विशेषज्ञों ने स्नान करने योग्य नहीं पाया। जिसमें रात दिन कुछ सुधार भी किये गये है।
उद्गम से ही गंगा का प्रदूषित होना इसलिए है कि गंगा के किनारे बने हुए शौचालयों के पाइपों का संपर्क जलधारा से जुड़ा हुआ है। मनुष्य द्वारा पैदा किया जा रहे अन्य प्रकार के गंदे जल की निकासी भी हो रही है। यही स्थिति छोटे-बड़े उद्योगों और कारखानों से छोड़े जा रहे कचरे ने भी गंगा के अस्तित्व पर संकट पैदा कर दिये है।
गंगा हमारे देश की मोक्षदायिनी है। इसलिए गंगा के तटों पर हर वर्ष कोई न कोई पर्व, त्यौहार, कुंभ, महाकुंभ होते रहते हैं जिसमें लाखों लोग डुबकी लगाकर पुण्य कमाते हैं। यह कैसी विडंबना है कि गंगा में घनघोर गंदगी के बहाने के बाद भी हमारी आस्था खत्म नहीं होती है। हम गंदगी भी उड़ेल रहे हैं और फिर उसकी आरती भी उतार रहे हैं। ये दोनों काम यदि एक साथ चलेंगे तो गंगा हमारे आंखों से जल्दी ही ओझल हो जायेगी।
गंगा केवल अकेली नहीं है इसकी सबसे बड़ी नदी जिसकी लंबाई बंदरपूछ पर्वत(6300मी)से यमुनोत्री मंदिर होकर आ रही लगभग 1376 किमी की दूरी पर प्रयागराज में गंगा से मिलती है।यमुना की भी अनेकों सहायक नदी जैसे टोंस, हिंडन, चंबल, छोटी बेतवा, केन आदि है। इन सब की हालात किसी गंभीर बीमार व्यक्ति से कम नहीं है। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी अपने कार्यकाल में यमुना की सफाई की घोषणाएं की थी। लेकिन जब वे अपना वादा पूरा न कर सके तो दिल्ली में अभी भाजपा की नयी सरकार चुनकर आयी है वे भी दावा कर रहे हैं कि अगले तीन वर्ष में दिल्ली की यमुना को साफ कर देंगे।
इस पर सवाल उठता है कि गंगा की सफाई के लिए जो नियम कानून बने हैं उसके तहत जो स्थिति उभर कर आ रही है। क्या यमुना भी आने वाले दिनों में साफ हो पाएगी? यह सवाल इसलिए है कि केवल दिल्ली में यमुना जितनी लंबाई में बहती है उसीमें 80 प्रतिशत गंदगी फैली हुई है।क्या सफाई से यमुना साफ होगी?अतःविचार करना जरूरी है कि यमुना उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश की शिवालिक की पहाड़ियों से आ रही हिंडन, कृष्णी आदि सहायक नदियां है। उनकी हालात भी दिल्ली की यमुना जैसी ही हैं।जिसमें उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली सरकार की जिम्मेदारी में है कि वे यमुना नदी की तरफ ध्यान देते हैं तो दिल्ली में गंदगी नहीं पहुंचेगी। विशेषज्ञ तो इस बात को बार-बार कहते हैं कि एक तरफ तो मानव निर्मित गंदगी जैसे प्लास्टिक, सीवर के अलावा अन्य ठोस कचरा है और दूसरी तरफ निर्माण कार्यों से निकल रहे मलवे को सीधे नदियों में डाला जा रहा है जिससे नदियों का स्तर घट गया है। नदियों के उद्गम में जैवविविधता का व्यवसायिक दोहन हो रहा है। नदियों के जल ग्रहण क्षेत्र की जमीन पर अतिक्रमण है जो यमुना के मैदानी क्षेत्रों में सबसे अधिक है। इसके आसपास के जलाशयों पर कब्जा हो गया है।आधुनिक जीवन शैली से उत्पन्न अनुपयोगी तत्वों को गंगा की ही तरह यमुना की जलधारा में सीधे डंप किया जा रहा है। जिसके निस्तारण के उपायों पर ध्यान देना होगा। गंगा की निर्मलता के लिए विचारों की कमी नहीं है। अच्छी-अच्छी योजनाएं और परियोजनाएं भी है। लेकिन अविरलता के विषय पर भी सोचना इसलिए जरूरी है कि यदि जल धारा को रोकने वाले बांध और बैराज बनेंगे तो उससे गंगा में प्रदूषण की समस्या बढ़ेगी और गंगा, जमुना के क्षेत्र में भूजल की कमी होगी। इसलिए नदी धाराओं के आसपास की वनस्पतियों और जलाशयों के विकास पर भी ध्यान देने की जरूरत है।
ध्यान रहे कि नदियों के पास रहने वाले समाज को न जोड़ सके तो थोड़े दिन की सफाई के बाद फिर यमुना भी वैसी की वैसी रह जाएगी।







