Maitu Da alias Shri Maitu Lal ji ………….
Mere Gaanw ke log ( People from My home town ) – Shri Maitu Lal ji is as old friend as we grown to be sensible. We are seeing him smiling since we were 7-8 years old and residing here in this Village – Naurakh – Pipalkoti ( Later become Nagar Panchayat -5- 6 years back ) , this place is located on NH_ 7- Shri Badrinath ji
मैतू दा की यादों की ये बरात तब की है – जब पहाड़ में फिर से मानसून आ जाता था , पीपलकोटी – नौरख के सेरे ( धान की रोपाई वाले खेत ) – नौरख बस्ती की श्रीमती सूरमा देवी ( बन्दरवाय्या बौड़ी ) , जौमा दीदी और श्री गोपाल भाईसाब के घर के पास के पानी के स्टैंड पोस्ट से नीचे से लेकर श्री नाथी लाल चाचा , श्री इंद्रा लाल शाह जी चाचा जी और त्रिलोक चन्द्र अग्रवाल ( तिल्लुमल लाला ) जी की दुकानों के पीछे तक फैले होते थे – गाँव के धान के खेत . ये यादें वर्ष 1985- 1986 के आस पास की होंगी . जहां आज का पीपलकोटी का शिशुमंदिर वाला विद्यालय है – वहाँ उस समय के सार्वजनिक निर्माण विभाग – या अब के लोक निर्माण विभाग की टेस्टिंग लैब थी – वहीं पर एक बड़ा पानी का सीमेंट का टैंक था – उसके आस पास बरसात में खूब पानी जमा हो जाता था – जैसे की आजकल के दिनों की बात हो – मेंढक बहुत टर्र- टर्र करते थे – बरसात में प्रजनन काल के दौरान सारे के सारे धान के खेतों में मेंढक के अंडे – जेल्ली नुमा – मालाकार आवरण में लिपटे – पानी से भरी नाहर और धान के खेतों में फैले रहते थे – दिन में कभी कभी कभी बहुत तेज धूप होती और शाम पानी की बारिश भरी इस सारे दौर में – बारिश से भरे खेतों में अकसर हमको छोटे छोटे नए बैलों के साथ रोपाई के खेत तैयार करते हुए – गाँव के कई किसान परिवार और उनके बीच ही मैतू दा हल लगाते हुए – दिखते थे, और वो व्यक्ति हमको हमेशा अपनी कद काठी की वजह से और आकर्षण का केंद्र बन जाते – नौरख से बचपन के बाल सखा खीम सिंह भंडारी , जयदीप पुंडीर और पदान खोला के दिलबर सिंह -मंगरी गाड – भ्युनता से पानी बया ( यानी पानी को आगे बढ़ाना ) देते थे !
हमारे अपने कोई रोपाई के खेत नहीं थे – हम तो नौरख और पीपलकोटी में – यहाँ के उस समय के मूल निवासी लोगों- जैसे डिमरी चाचा जी( क्यूंकि वो हमारे रिश्तेदार थे ) या इन्द्रलोक वाले श्री प्रकाश भाईसाब आदि लोगों के खेत – तिहाड़ ( यानी एक तिहाई हिस्से पर) के रूप में करते थे . बात सिर्फ धान की रोपाई पर ही सीमित नहीं थी मैतू दा हमारे हर काम के सहायक और हिस्सेदार थे – आज शायद उनकी उम्र लगभग 70 वर्ष से अधिक हो गयी होगी, लेकिन उनकी मुस्कान वही है – उतनी ही ऊर्जा दायक और सकारात्मक है. उनके पुत्र – वीरेंदर उर्फ़ कल्ली से उनकी उम्र के बारे में पूछा तो उसने बताया शायद मेरे पिताजी 75 साल के हो गए होंगे !
आज की इन तस्वीरों में उनकी सकारात्मक हंसी इस बात का प्रमाण है की – अगर व्यक्ति व्यसनों से मुक्त है तो शानदार जीवन जी सकता है – जैसे आज मैतू दा की मुस्कान से लगा ! आजकल अब वो अपने नाती – पोतों के साथ खुश है और गाय चराते हैं. लेकिन हमको पता है उन्होंने जीवन भर – लेबर मजदूरी की लेकिन जीवन की सकारात्मकता के प्रति निराश नहीं हुए !
आज हमारे घर के पास के मंदिर के निकट मिले मुझसे पूछ रहे थे कब आये मैंने कहा हो गए 5- 6 दिन. बोले पहले का समय बढ़िया था अब तो लोग पहचानते भी नहीं है !. वो प्रेम नहीं रहा —मोबाइल ने सब बर्बाद कर दिया !
मैं, ऑफिस में आकर सेरे के खेतों के बारे में सोचने लगा – मेंढक – काले काले टैडपोल- खेतों के बीच में लगाए गयी सिमाली और मेहल की टहनी जो मेहल सक्रांति में लगाई जाती और उनके साथ की पूजा और गीत के बारे में . धान के खेतों में गीत गाते लोग और घस्यारियां- जीवित रहता गाँव – नौरख पीपलकोटी खेतों में मिटटी के हाथों से जलेबी – पकौड़ी खाती महिलाएं और हल लगाने वाले हल्या – स्टील के बड़े गिलासों में चाय पीते दिखते .
अब विकास के साथ सेरे के खेत गायब हो रहे हैं – बढ़ाते परिवारों की आवश्यकता के बीच जमीन घट रही है और अब शायद नौरख से बाजार तक कह्तों में मकान उग आयेंगे ! फिर याद आयेंगे – मैतू दा…………….
ये तब की बात है जब से








