Friday, March 6, 2026
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सिर्फ मोबाइल का जमाना आया है, बस मैतु दा वही है के अनुभव बता रहे है पर्यावरणविद जेपी मैठाणी।

Maitu Da alias Shri Maitu Lal ji ………….

Mere Gaanw ke log ( People from My home town ) – Shri Maitu Lal ji is as old friend as we grown to be sensible. We are seeing him smiling since we were 7-8 years old and residing here in this Village – Naurakh – Pipalkoti ( Later become Nagar Panchayat -5- 6 years back ) , this place is located on NH_ 7- Shri Badrinath ji 

मैतू दा की यादों की ये बरात तब की है – जब पहाड़ में फिर से मानसून आ जाता था , पीपलकोटी – नौरख के सेरे ( धान की रोपाई वाले खेत ) – नौरख बस्ती की श्रीमती सूरमा देवी ( बन्दरवाय्या बौड़ी ) , जौमा दीदी और श्री गोपाल भाईसाब के घर के पास के पानी के स्टैंड पोस्ट से नीचे से लेकर श्री नाथी लाल चाचा , श्री इंद्रा लाल शाह जी चाचा जी और त्रिलोक चन्द्र अग्रवाल ( तिल्लुमल लाला ) जी की दुकानों के पीछे तक फैले होते थे – गाँव के धान के खेत . ये यादें वर्ष 1985- 1986 के आस पास की होंगी . जहां आज का पीपलकोटी का शिशुमंदिर वाला विद्यालय है – वहाँ उस समय के सार्वजनिक निर्माण विभाग – या अब के लोक निर्माण विभाग की टेस्टिंग लैब थी – वहीं पर एक बड़ा पानी का सीमेंट का टैंक था – उसके आस पास बरसात में खूब पानी जमा हो जाता था – जैसे की आजकल के दिनों की बात हो – मेंढक बहुत टर्र- टर्र करते थे – बरसात में प्रजनन काल के दौरान सारे के सारे धान के खेतों में मेंढक के अंडे – जेल्ली नुमा – मालाकार आवरण में लिपटे – पानी से भरी नाहर और धान के खेतों में फैले रहते थे – दिन में कभी कभी कभी बहुत तेज धूप होती और शाम पानी की बारिश भरी इस सारे दौर में – बारिश से भरे खेतों में अकसर हमको छोटे छोटे नए बैलों के साथ रोपाई के खेत तैयार करते हुए – गाँव के कई किसान परिवार और उनके बीच ही मैतू दा हल लगाते हुए – दिखते थे, और वो व्यक्ति हमको हमेशा अपनी कद काठी की वजह से और आकर्षण का केंद्र बन जाते – नौरख से बचपन के बाल सखा खीम सिंह भंडारी , जयदीप पुंडीर और पदान खोला के दिलबर सिंह -मंगरी गाड – भ्युनता से पानी बया ( यानी पानी को आगे बढ़ाना ) देते थे !

हमारे अपने कोई रोपाई के खेत नहीं थे – हम तो नौरख और पीपलकोटी में – यहाँ के उस समय के मूल निवासी लोगों- जैसे डिमरी चाचा जी( क्यूंकि वो हमारे रिश्तेदार थे ) या इन्द्रलोक वाले श्री प्रकाश भाईसाब आदि लोगों के खेत – तिहाड़ ( यानी एक तिहाई हिस्से पर) के रूप में करते थे . बात सिर्फ धान की रोपाई पर ही सीमित नहीं थी मैतू दा हमारे हर काम के सहायक और हिस्सेदार थे – आज शायद उनकी उम्र लगभग 70 वर्ष से अधिक हो गयी होगी, लेकिन उनकी मुस्कान वही है – उतनी ही ऊर्जा दायक और सकारात्मक है. उनके पुत्र – वीरेंदर उर्फ़ कल्ली से उनकी उम्र के बारे में पूछा तो उसने बताया शायद मेरे पिताजी 75 साल के हो गए होंगे !

आज की इन तस्वीरों में उनकी सकारात्मक हंसी इस बात का प्रमाण है की – अगर व्यक्ति व्यसनों से मुक्त है तो शानदार जीवन जी सकता है – जैसे आज मैतू दा की मुस्कान से लगा ! आजकल अब वो अपने नाती – पोतों के साथ खुश है और गाय चराते हैं. लेकिन हमको पता है उन्होंने जीवन भर – लेबर मजदूरी की लेकिन जीवन की सकारात्मकता के प्रति निराश नहीं हुए !

आज हमारे घर के पास के मंदिर के निकट मिले मुझसे पूछ रहे थे कब आये मैंने कहा हो गए 5- 6 दिन. बोले पहले का समय बढ़िया था अब तो लोग पहचानते भी नहीं है !. वो प्रेम नहीं रहा —मोबाइल ने सब बर्बाद कर दिया !

मैं, ऑफिस में आकर सेरे के खेतों के बारे में सोचने लगा – मेंढक – काले काले टैडपोल- खेतों के बीच में लगाए गयी सिमाली और मेहल की टहनी जो मेहल सक्रांति में लगाई जाती और उनके साथ की पूजा और गीत के बारे में . धान के खेतों में गीत गाते लोग और घस्यारियां- जीवित रहता गाँव – नौरख पीपलकोटी खेतों में मिटटी के हाथों से जलेबी – पकौड़ी खाती महिलाएं और हल लगाने वाले हल्या – स्टील के बड़े गिलासों में चाय पीते दिखते .

अब विकास के साथ सेरे के खेत गायब हो रहे हैं – बढ़ाते परिवारों की आवश्यकता के बीच जमीन घट रही है और अब शायद नौरख से बाजार तक कह्तों में मकान उग आयेंगे ! फिर याद आयेंगे – मैतू दा…………….

ये तब की बात है जब से

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