Thursday, May 14, 2026
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विशेषांक : छह दशक का जीवन, चार दशक की साधना, और पत्रकारिता जो बन गई आत्मा ।

आपके जीवन के साठ वर्ष अनुभव, साधना और संस्कार के प्रतीक हैं।

मनोज इष्टवाल : हिमालय-सा जीवन, नदी-सी पत्रकारिता

छह दशक का जीवन, चार दशक की साधना, और पत्रकारिता जो बन गई आत्मा

 

By – Avdhesh Nautiyal

 

कुछ लोग उम्र के साथ थकते हैं, और कुछ लोग उम्र के साथ और गहरे हो जाते हैं। मनोज इष्टवाल उन गिने-चुने नामों में हैं, जिनके लिए पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि है। आज जब वे 60 वर्ष के हुए हैं, तो यह सिर्फ जन्मदिन नहीं- यह 1986 से 2026 तक फैली उस तपस्या का उत्सव है, जिसने शब्दों को जिम्मेदारी दी, कैमरे को संवेदना सिखाई और पत्रकारिता को ज़मीन से जोड़े रखा। यह कोई करियर नहीं, यह एक जीवन-यज्ञ है, जिसमें कलम, कैमरा और चेतना—तीनों समर्पित रहे।

उनका पत्रकारिता-सफर उस दौर में शुरू हुआ, जब खबर लिखना आसान नहीं था और सच लिखना जोखिम भरा। चौथी दुनिया, कलयुग दर्पण, सीमांत वार्ता, ठहरो, दैनिक जयंत जैसे अख़बारों और पत्रिकाओं में उनका शुरुआती लेखन महज़ सूचना नहीं देता था, वह बेचैनी पैदा करता था। उनकी पंक्तियों में पहाड़ की खामोशी थी, समाज की पीड़ा थी और व्यवस्था से सवाल करने का साहस था। तभी यह साफ हो गया था कि यह कलम समझौते के लिए नहीं बनी।

जब उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कदम रखा और दूरदर्शन के लिए आँखों देखी, परख, खबरों की दुनिया जैसे कार्यक्रमों में काम किया, तो कैमरा भी उनके हाथों में संवेदनशील हो गया। दृश्य उनके लिए तमाशा नहीं थे, वे मनुष्यों की कहानियाँ थे। राज्य निर्माण के बाद Star News, ANI, आजतक, सहारा, सहारा न्यूज़ लाइन्स, K News सहित दर्जन भर से अधिक न्यूज़ चैनलों में स्ट्रिंगर के रूप में उन्होंने जो काम किया, वह अक्सर हेडलाइन से दूर रहा—लेकिन सच के बेहद करीब रहा। वे पहाड़ की पगडंडियों पर चलकर खबर लाते थे, जहाँ पहुँचना ही अपने आप में एक चुनौती होता था।उत्तराखंड उनके लिए कभी “बीट” नहीं रहा। वह उनकी जड़ों का विस्तार रहा।

लोकसंस्कृति, लोक समाज, धर्म-पर्यटन, पारंपरिक वस्त्र और आभूषण—इन विषयों पर उनके दर्जनों लेख आज भी यह महसूस कराते हैं कि उन्होंने विषयों को देखा नहीं, जिया है। पिछले आठ वर्षों में उनके कई शोध लेखों का Track of the Year घोषित होना इस बात का प्रमाण है कि उनकी पत्रकारिता सिर्फ वर्तमान नहीं पकड़ती, भविष्य के लिए संदर्भ भी छोड़ती है।

डॉक्युमेंट्री के क्षेत्र में उनका योगदान एक दृश्य इतिहास की तरह है। लखनऊ और दिल्ली दूरदर्शन से प्रसारित उनकी दर्जन भर से अधिक फ़िल्में हों या जौनसार की दिवाली के वे दृश्य, जो ANI, National Geographic और Discovery तक पहुँचे—हर फ्रेम में पहाड़ बोलता है। विशेष रूप से ‘God of Justice – गोलज्यू देवता’ जैसी चर्चित डॉक्युमेंट्री नेपाल और उत्तराखंड की साझा आस्था और संस्कृति का ऐसा दस्तावेज़ है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य है।मनोज इष्टवाल ने पत्रकारिता को कभी एक दायरे में कैद नहीं किया।

गढ़वाली फीचर फ़िल्मों में सह-निर्देशक और प्रोडक्शन कंट्रोलर के रूप में उनका काम हो, या इष्टवाल सीरीज़ के अंतर्गत ऑडियो-वीडियो एल्बम—हर जगह समाज उनकी रचनाओं में साँस लेता है। वंदना वाजपेई की आवाज़ में काँवड़ यात्रा पर आधारित चर्चित गीत हो, या सुरेश वाडेकर की आवाज़ में “चलो लौट आओ, हिमालय के बेटों…”—ये गीत मनोरंजन नहीं, पहाड़ की पुकार हैं। पलायन, पर्यटन और रिवर्स माइग्रेशन जैसे मुद्दे यहाँ सिर्फ शब्द नहीं, वेदना बनकर उभरते हैं।

पचास से अधिक क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार—जिनमें उत्तरायणी, लखनऊ द्वारा दिया गया ‘Vasco da Gama of Uttarakhand’ और ‘Encyclopedia of Uttarakhand’ जैसे अलंकरण—दरअसल उनकी लंबी, कठिन और ईमानदार यात्रा की स्वीकृति हैं। ये सम्मान उन्हें अलग नहीं बनाते, बल्कि यह साबित करते हैं कि सच्चा काम कभी अनदेखा नहीं रहता।

उनकी आत्मकथा ‘वो साल चौरासी’ ने उन्हें सिर्फ लेखक के रूप में नहीं, बल्कि एक संवेदनशील गवाह के रूप में स्थापित किया। यह पुस्तक आत्मकथा कम और समय का दस्तावेज़ ज़्यादा है। लोकार्पण के अगले ही दिन गूगल पर ट्रेंड करना और दर्जन भर से अधिक साहित्यकारों की समीक्षाएँ—इस बात का संकेत थीं कि यह किताब लोगों के भीतर कहीं गहरे उतर गई।

आज, 60 वर्ष की उम्र में भी, वे Himalayan Discover News Portal के संपादक के रूप में उसी प्रतिबद्धता के साथ सक्रिय हैं। न थकान है, न ठहराव—बस वही पुरानी ज़िद कि सच को दर्ज करना है, चाहे वह कितना ही कठिन क्यों न हो।

मनोज इष्टवाल उन पत्रकारों में हैं, जिनकी पहचान शोर से नहीं, मौन से बनती है। उनकी पत्रकारिता हमें याद दिलाती है कि जब शब्द ईमानदार हों,
तो वे सिर्फ खबर नहीं बनते, वे इतिहास बन जाते हैं। अंत में बस इतना ही….

नदी सा बहा, पर दिशा न हारी,
हिमालय सा अटल, हर आँधी पर भारी।
शब्दों में चट्टान, सोच में अभियान,
मनोज इष्टवाल-लोक संस्कृति की पहचान।।

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