मनरेगा और मजदूर विधायक
By – Pankaj kushwah
पुरोला विधायक दुर्गेश्वर लाल को मैं उतना ही जानता हूं जितना प्रदेश के अन्य विधायकों को, मतलब नाम के अलावा कुछ नहीं। खैर, आजकल चर्चाओं में हैं कि उनके और उनकी पत्नी के खाते में मनरेगा की मजदूरी आई और इस पर बवाल मचा हुआ है। विपक्षी दल हमलावर हैं, पत्रकार सवाल उठा रहे हैं कि विधायक कैसे मजदूर हो गया मनरेगा में, पुरोला से विधानसभा की तैयारियों में जुटे अन्य दावेदार इसे भुनाने में जुटे हैं, लेकिन यकीन मानिए विधायक और उनकी पत्नी के खाते में मनरेगा की मजदूरी आना न कोई अनोखी बात है न किसी घपले घोटाले का आरोप लगाने लायक मामला। अगर आप पहाड़ी गांवों में नहीं रहते हैं तो आप समझ नहीं पाएंगे कि मनरेगा की मजदूरी कैसे किसी के भी खाते में आ सकती है। लंबा लेख नहीं लिख रहा हूं क्रमबद्ध तरीके से समझाता हूं –
1. विधायक दुर्गेश्वर लाल और उसकी पत्नी मोरी के सुदूर किसि गांव के बाशिंदे हैं, 2022 से पहले विधायक नहीं थे तो सीधि बात है कि गांव के अन्य लोगों की तरह मनरेगा के जाबकार्ड धारक रहे होंगे। हालांकि कभी मजदूरी न की हो, पहाड़ में करीब अस्सी फीसद कार्ड धारकों ने कभी मजदूरी नहीं की। अब विधायक बने लेकिन ग्राम प्रधान ने जाब कार्ड निरस्त नहीं किया, क्यों ??? क्योंकि दो जाब कार्ड हैं, योजनाओं में लगाने में काम आते हैं।
2. मनरेगा की योजनाओं में होता यह रहा कि किसी ग्रामीण ने खुली बैठक में एक योजना रखी, योजना स्वीकृत हुई, अब उसे दस जाब कार्ड जुटाने होते हैं जिन्हें आधार मानकर काम की डिमांड की जाती है, योजना स्वीकृत होती है, पैसा आता है, अब जिनके जाब कार्ड हैं, उनके कार्ड से लिंक खातों में ही मजदूरी का भुगतान होता है। की बार संबंधित योजना रखने वाला ग्रामीण जाब कार्ड का जुगाड़ करता है तो की बार मनरेगा सहायक गांव में खाली पड़े जाब कार्ड को अपनी मर्जी से संबंधित योजना में जोड़ देता है क्योंकि योजना में दस जाब कार्ड का सौ दिन की मजदूरी का आंकड़ा पूरा करवाना भी लक्ष्य होता है।
3. अब जिनके जाब कार्ड लगाए जाते हैं तो अमूमन वह योजना रखवाने वाला ग्रामीण उन लोगों को सूचित करता है कि तुम्हारा जाब कार्ड लगवाया है, खाते में पैसा आएगा मुझे दे देना, क्योंकि वास्तव में वह आदमी अन्य मजदूरों से वह काम करवा रहा होता है, जिनमें ज्यादातर नेपाली मजदूर होते हैं।
4. कई बार योजना में रोजगार सृजन की आंकड़ों को पूरा करवाने के चक्कर में मनरेगा सहायक गांव के खाली पड़े जाब कार्ड को योजना में जोड़ देता है जब भुगतान हो जाता है तो टीम लीडर यानी योजना वाले ग्रामीण को बताता है कि पैसा फलाने फलाने के खाते में गया है क्योंकि जो उनके जाब कार्ड खाली थे।
5. मनरेगा में अब यह सब संभव नहीं होता क्योंकि जिन लोगों के जाब कार्ड हैं उनका कार्यस्थल पर उपस्थित रहना यानी मजदूरी करते हुए दिखना जरूरी होता है क्योंकि दो बार उनके काम करते हुए फोटो खींचकर मनरेगा के पोर्टल पर अपलोड करना पड़ता है इसलिए ज्यादातर इलाकों में मनरेगा में काम करना मुश्किल हो गया
लेकिन, मोरी अपवाद है क्योंकि जिस क्षेत्र मोरी से दुर्गेश्वर लाल आते हैं वह प्रखंड मनरेगा में आन-लाइन उपस्थिति से मुक्त है यानी वहां पुराने तरीके से काम होता है इसलिए मजदूरी कौन कर रहा इसका रोज दो वक्त फोटो खींचकर अपलोड करने की छूट है।
सूची लंबी है पर यकीन मानिए जो ग्रामीण इलाकों में रहने कै बाद भी मान रहा है कि विधायक दुर्गेश्वर लाल के खाते में मनरेगा की मजदूरी आना भ्रष्टाचार है तो हे पार्थ आप अब तक गांव मनरेगा को समझ ही नहीं पाए। खैर, अब समझने की जरूरत भी नहीं है मनरेगा इतिहास बनने वाला है और वीबी-जीरामजी योजना इसकी जगह लेगी, शायद फिर मनरेगा सहायक ऐसे खेल खेलकर किसी विधायक के लिए बेवजह की मुसीबत न पैदा करें







