Friday, March 6, 2026
Home lifestyle 'मीरा बहन' (मेडेलीन स्लेड) की नज़र से 'गांधी'

‘मीरा बहन’ (मेडेलीन स्लेड) की नज़र से ‘गांधी’

‘मीरा बहन’ (मेडेलीन स्लेड) की नज़र से ‘गांधी’

By – Dr. Arun kuksal

 


‘गांधीवाद जैसी कोई वस्तु नहीं है और मैं नहीं चाहता कि मेरे पीछे मैं कोई सम्प्रदाय छोड़ कर जाऊं। मैंने अपने ही ढंग से सनातन सत्यों को हमारे दैनिक जीवन और समस्याओं पर लागू करने का केवल प्रयत्न किया है।…

मैंने जो मत बनाये हैं और जिन परिणामों पर मैं पहुंचा हूं, वे किसी भी तरह अन्तिम नहीं हैं। यदि इनसे अच्छे मुझे मिल जांय, तो मैं इन्हें कल ही बदल सकता हूं। मेरे पास दुनिया को सिखाने के लिए कोई नई चीज नहीं है। सत्य और अहिंसा अनन्त काल से चले आ रहे हैं।…मैं अहिंसा का उतना बड़ा पुजारी नहीं हूं, जितना कि सत्य का हूं; और मैं सत्य को प्रथम स्थान देता हूं तथा अहिंसा को दूसरा। मैं सत्य के खातिर अहिंसा को छोड़ सकता हूं।…

मेरे मत के विरुद्ध धर्मशास्त्रों के प्रमाण दिये गए हैं; परन्तु मेरा यह विश्वास पहले से अधिक दृढ़ हुआ है कि सत्य का बलिदान किसी भी वस्तु के खातिर नहीं करना चाहिए। मेरे बताये हुए प्राथमिक सत्यों में जिनका विश्वास है, वे उनका प्रचार केवल उनके अनुसार आचरण करके ही कर सकते हैं। मैं केवल पुस्तकों के द्धारा संसार को यह विश्वास कैसे करा सकता हूं कि मेरे सारे रचनात्मक कार्यक्रम की जड़, उसका आधार, अहिंसा के पालन में है? केवल मेरा जीवन ही इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हो सकता है (पृष्ठ-231-232)।’’

28 मार्च, 1936 को ‘गांधी सेवा संघ’ की सभा में बोलते हुए गांधी जी ने उक्त विचार व्यक्त किए थे। मीरा बहन की आत्मकथा में उल्लेखित ये विचार गांधी दर्शन को समझने और उसे आत्मसात करके जीवनीय व्यवहार में लाने के लिए मार्गदर्शी संदेश है।

मीरा बहन का मूल नाम मेडेलीन स्लेड था। उनका जन्म 22 नवम्बर, 1892 को इंग्लैंड में हुआ था। पिता एडमंड स्लेड बिट्रिश नौसेना में एडमिरल थे। वे कमांडर- इन-चीफ भी रहे। नौकरी के प्रारम्भ में वे सन् 1908-10 तक सपरिवार भारत में रहे थे। अभिजात्य वर्गीय माहौल में उन दो सालों के दौरान उनकी सुपुत्री मेडेलीन स्लेड भारत में रहते हुए भी इस देश की मूलभूत परिस्थितियों से अनभिज्ञ रही थी।

युवावस्था में वह यूरोप के विख्यात संगीतकार बीथोवन से प्रभावित हुई। सूरदास की तरह बीथोवन ने अपने दार्शनिक चिन्तन को संगीत में पिरोकर विश्व भर में लोकप्रियता प्राप्त की थी। फ्रेंच विचारक रोमां रोलां से हुई मुलाकात और उनकी पुस्तक ‘महात्मा गांधी’ पढ़ने के बाद मेडेलीन स्टेडियम के संपूर्ण जीवनीय विचार और व्यवहार बदल गये।

नतीजन, सन् 1925 में वह साबरमती आश्रम में गांधी जी के संरक्षण में आजीवन समाज सेवा का संकल्प लेकर भारत आईं। तब 33 वर्षीय मेडेलीन स्लेड का गांधी जी ने नया नाम मीरा बहन रखा।

मीरा बहन ने युवा अवस्था में समाज सेवा के लिए वैभव पूर्ण जीवन त्याग कर जीवन-भर के लिए कष्टमय जीवन अपनाया। यह उनके अदम्य साहस, पूर्ण समर्पण और निष्काम सेवा भाव का परिचायक था। स्वयं उन्होने स्वीकारा कि ‘‘…सामुदायिक जीवन मेरे लिए एक टेढ़ी खीर था। लेकिन बापू के प्रति अपनी भक्ति के कारण मैंने अपनी अरुचि को दबा दिया। वास्तव में मैंने अपने को इतना अनुशासन-बद्ध बना लिया था कि मैं सचमुच मानने लगी थी कि मुझे यह जीवन पसन्द है। किन्तु यह नहीं हो सकता कि हम अपने स्वभाव को दबायें भी और तकलीफ़ भी न हो, भले ही तकलीफ़ कुछ समय के लिए बाहर दिखाई न दे (पृष्ठ- 86)।’’

भारत में अपने प्रारम्भिक वर्षों में मीरा बहन ने भारतीय समाज के ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन किया। इस दौरान अधिकांश समय उन्होने मौन व्रत की साधना की। मीरा बहन सन् 1925 से 1948 में गांधी जी के निर्वाण तक उनके साथ साधिका और सेविका के रूप में रही। अंग्रेज सत्ता की बर्बरता झेलना और जेल में रहना उनके लिए सामान्य बात थी। ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ (सन् 1942) में गांधी जी की प्रतिनिधि के रूप में उन्होने अंग्रेज सरकार से होने वाली वार्ताओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

मीरा बहन ने सन् 1945 में रुडकी और हरिद्वार के बीच मूलदासपुर गांव में ‘किसान आश्रम’ और मई, 1947 में ‘किसान आश्रम’ का काम उत्तर प्रदेश ग्राम्य विकास विभाग को सौंप कर ऋषीकेश के पास वीरभ्रद में ‘पशुलोक’ की स्थापना की थी। ‘पशुलोक’ पहले सरकारी फिर सामाजिक संस्था ‘पशुलोक सेवा मंडल’ से संचालित होता था, पुनः सरकार ने उसे अपने नियंत्रण में ले लिया था।

मीरा बहन ने उसके बाद टिहरी (गढ़वाल) के गेंवली गांव (भिंलगना घाटी) में ‘गोपाल आश्रम’ की स्थापना की और सन् 1952 से कुछ वर्षों तक वहीं से ‘बापूराज पत्रिका’ का 5 भाषाओं में प्रकाशन किया। परन्तु परिस्थितियां ऐसी बनी कि ‘गोपाल आश्रम’ का कार्य आगे नहीं बड़ पाया। जीवट मीरा बहन ने काश्मीर में श्रीनगर के निकट ‘गऊबल आश्रम’ बनाया। परन्तु यह प्रयास भी सफल नहीं हो पाया।

पुनः सन् 1957 में टिहरी गढ़वाल में चम्बा के पास मेलधार गांव में ‘पक्षी कुंज’ में उन्होने अपना ठिकाना बनाया था। परन्तु पुनः युवावस्था का प्रेम बीथोवन और रोमां रोलां से प्रेरित होकर वे सन् 1959 को इग्लैंड होते हुए वियाना (आस्ट्रिया) चली गई और 20 जुलाई, 1982 को यहीं उनका निधन हुआ था।

मीरा बहन ने अपनी आत्मकथा पचास के दशक में लिखी थी। यह आत्मकथा अंग्रेजी में ‘The Spirit’s Pilgrimage’ (सन् 1960) और हिन्दी में ‘एक साधिका की जीवन – यात्रा’ (सन् 1970) नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद से प्रकाशित हुई थी।

यह पुस्तक 73 अघ्यायों में मीरा बहन की आध्यात्मिक जीवन – साधना के बहुआयामी रंगों का कैनवास है। अक्सर बीमार रहने वाली मीरा बहन भले ही शरीर से कुछ समय कमजोर हो जाती परन्तु दृड-इच्छाशक्ति के बल पर वह जीवन भर सामाजिक सेवा के लिए सक्रिय रही। वह सफेद धोती पहन सूत कातती देश के गांव – गांव घूमी, झोपड़पट्टी का जीवन जीते हुए कम से कम खर्च की जीवन शैली को अपनाया ताकि वह जरूरतमन्दों की जरूरतों को समझे, उसे महसूस करे और उसके निवारण के उपायों को हासिल कर उनको स्वावलम्बी जीवन जीने में मदद कर सके।

मीरा बहन की आत्मकथा गांधीजी और स्वाधीनता आन्दोलन के विविध अन्तचित्रों को उजागर करती है। स्वाधीनता आन्दोलन से जुड़े हुए प्रमुख व्यक्तित्वों के पारिवारिक और सामाजिक असहजता और कष्टकारी जीवन की कई घटनायें हमें अचंभित करती हैं। परन्तु इन सबसे अलग इस पुस्तक में मीरा बहन गांधी के उन अनुयायियों को लताड़ भी लगाती है जो अक्सर ‘गांधी केवल हमारे’ के तहत उन्हें घेरे रहते थे। वे लिखती हैं कि ‘‘बापू के आस-पास जो लोग थे उनमें शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे गांव से प्रेम हो; अधिकतर लोग वर्धा के उपनगर जैसी मगनवाड़ी तक ही जाना चाहते थे (पृष्ठ-232)।’‘ गांधी के नजदीकी ऐसे लोगों की संकीर्ण मानसिकता का वह शिकार भी हुई।

‘साबरमती आश्रम’, ‘सेवा ग्राम’, ‘किसान आश्रम’, ‘पशुलोक’, ‘गोपाल आश्रम’ ‘गऊबल आश्रम’ और ‘पक्षी कुंज’ मीरा बहन के सुनहरे सपने थे, जिन पर वह जिन्दगी भर प्रयोग करती रही। वह बार – बार असफल होती और फिर नये प्रयोगों में जुट जाती पर उन्होने जीवनीय संघर्षो से कभी हार नहीं मानी।

मीरा बहन को विश्व कल्याण की अपार सेवाओं के लिए भारत सरकार ने वर्ष 1981 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया था।

(आत्मीय धन्यवाद प्रिय अरण्य रंजन जी,’माउंटेन फूड कनेक्ट’ (समूण) खाड़ी, टिहरी (गढ़वाल) का मीरा बहन की आत्मकथा ‘एक साधिका की जीवन-यात्रा’ पुस्तक सप्रेम भेंट करने के लिए।)

अरुण कुकसाल
ग्राम- चामी, पोस्ट- सीरौं- 246163
पट्टी- असवालस्यूं, विकासखण्ड- कल्जीखाल
जनपद- पौड़ी (गढ़वाल), उत्तराखण्ड.

RELATED ARTICLES

धराली आपदा : वैज्ञानिकों ने किया खुलासा, एक बड़े ग्लेशियर के टुकड़े के टूटने से हुई तबाही।

न बादल फटा, न ग्लेशियल झील… वैज्ञानिक अध्ययन में खुलासा: श्रीकांता ग्लेशियर से बर्फ का बड़ा हिस्सा गिरने से हुआ था धराली हादसा। ....................... 5 अगस्त...

2017 तक स्टार्टअप की संख्या थी शून्य। वर्ष 2025 में बढ़कर हुई 1750

- 2024-25 में राज्य का सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) ₹ 3,81,889 करोड़ का रहा - 2021-22 के मुकाबले जीएसडीपी में आया डेढ़ गुना से ज्यादा...

एक साधारण व्यक्ति में असाधारण व्यक्तित्व की जीवन्त जीवन जीने की शब्द-यात्रा है – BARLOWGANJ AND BEYOND

- साधारण व्यक्ति का असाधारण व्यक्तित्व : प्रो. बी. के. जोशी। - प्रो. बी. के. जोशी जी के जीवनीय आत्म-संस्मरणों पर केन्द्रित पुस्तक 'BARLOWGANJ...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -

Latest Post

धराली आपदा : वैज्ञानिकों ने किया खुलासा, एक बड़े ग्लेशियर के टुकड़े के टूटने से हुई तबाही।

न बादल फटा, न ग्लेशियल झील… वैज्ञानिक अध्ययन में खुलासा: श्रीकांता ग्लेशियर से बर्फ का बड़ा हिस्सा गिरने से हुआ था धराली हादसा। ....................... 5 अगस्त...

2017 तक स्टार्टअप की संख्या थी शून्य। वर्ष 2025 में बढ़कर हुई 1750

- 2024-25 में राज्य का सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) ₹ 3,81,889 करोड़ का रहा - 2021-22 के मुकाबले जीएसडीपी में आया डेढ़ गुना से ज्यादा...

एक साधारण व्यक्ति में असाधारण व्यक्तित्व की जीवन्त जीवन जीने की शब्द-यात्रा है – BARLOWGANJ AND BEYOND

- साधारण व्यक्ति का असाधारण व्यक्तित्व : प्रो. बी. के. जोशी। - प्रो. बी. के. जोशी जी के जीवनीय आत्म-संस्मरणों पर केन्द्रित पुस्तक 'BARLOWGANJ...

विकास के नए आयाम स्थापित करती ग्राम पंचायत भगवन्तपुर की ग्राम प्रधान

विकास के नए आयाम स्थापित करती ग्राम पंचायत भगवन्तपुर की ग्राम प्रधान   By - Harishankar saini   कभी गड्ढों, कीचड़ और टूटे किनारों से जूझती सलान गाँव...

होली विशेषांक : खोलो किवाड़ चलो मठ भीतर।

- खोलो किवाड़ चलो मठ भीतर। - दून पुस्तकालय में संगीताजंलि की शानदार होली प्रस्तुति दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के एम्फीथियेटर में आज संगीतांजली शास्त्रीय...

बर्लोगंज एंड बियोंड पुस्तक का लोकार्पण

पुस्तक : बर्लोगंज एंड बियोंड   By - Dr. Yogesh dhasmana   देश के प्रसिद्ध शिक्षाविद प्रो बी के जोशी के संस्मरणों पर आधारित पुस्तक बर्लोगंज एंड बियोंड...

विज्ञान दिवस उत्साहपूर्वक मनाया गया राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय चन्देली में।

विज्ञान दिवस उत्साहपूर्वक मनाया गया राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय चन्देली में। By - Neeraj Uttarakhandi पुरोला विकासखंड के अंतर्गत राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय चन्देली में राष्ट्रीय...

स्पैक्स संस्था ने होली के प्राकृतिक रंगों पर दून पुस्तकालय में बच्चों को दी जानकारी।

स्पैक्स संस्था ने होली के प्राकृतिक रंगों पर दून पुस्तकालय में बच्चों को दी जानकारी। .......... दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में ‘स्पेक्स’ संस्था के सहयोग...

जनगणना की पूरी तैयारी, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर होगी जनगणना

जनगणना-2027 की डिजिटल तैयारियां शुरू, देहरादून में 25-27 फरवरी तक विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू चार्ज अधिकारियों से लेकर सेन्सस क्लर्क तक, सभी ले रहे डिजिटल...

एक स्वस्थ परंपरा है स्कूल ऑफ थॉट्स – प्रो० पंवार

स्कूल ऑफ थॉट्स, श्रीनगर (गढ़वाल), भारतीय-हिमालयी ज्ञान परंपरा,  मुख्य वक्ता- प्रो. मोहन पंवार। भारतीय : हिमालय ज्ञान परंपरा पर अपनी बात शुरू करते हुए मुख्य...