Friday, March 6, 2026
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संस्मरण : जब वरिष्ठ साहित्यकार गोविंद प्रसाद बहुगुणा प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे

सुबह बच्चों को नींद से जगाने का एक मीठा प्रयास -GPB

Govind Prasad Bahuguna

मैं चौथे -पांचवें दर्जे के समय से अपने पिताजी के साथ उनकी सरकारी सेवा के तैनाती स्थान भटवाड़ी टकनोर(उत्तरकाशी ) में पढ़ने चला गया था जो हमारे गाँव से लगभग ५०कि० मी० दूर का पैदल रास्ता था। मेरी माँ गांव में ही रह गयी थी,खेती-बाड़ी करने के लिए I मैं अपने पिता जी के साथ ही उनके बिस्तर पर सोता था I पिता जी को संगीत का बड़ा शौक था , उनका कंठस्वर बहुत मधुर था। वे हारमोनियम और बांसुरी भी बजाते थे इसलिए ये दोनों वाद्ययंत्र उनके साथ जीवन पर्यन्त रहे। कालान्तर में दमे के रोग से ग्रस्त होने पर यद्यपि उनका बांसुरी बादन तो बन्द हो गया था किन्तु हारमोनियम वे कभी बजा ही लेते थे। वह हारमोनियम हमारे क्षेत्र की रामलीलाओं में आयोजक अक्सर मांगकर ले जाते थे।

पिता जी विस्तर पर लेटे- लेटे ही सुवह अपना यह प्रिय भजन गाने लगते थे ताकि मेरी नींद खुल जाये–
“जगिये रघुनाथ कुँवर, पंछी बन बोले |
चन्द्र किरण शीतल भई, चकई पिय मिलन गयी |
त्रिविधमंद चलत पवन, पल्लव द्रुम डोले ||
प्रातःकालीन भानु प्रकट भयो, रजनी को तिमिर गयो |
भृंग करत गुंजगां, कमलन डिलसेलर ||
ब्रह्मादिक धृत ध्यान, सुर नर मुनि करत गान |
जगन की बेर भई, नईं दुकान ||
तुलसीदास अति आनंद, निरख केर मुखबिन्द |
दीन को देत दान, कृष्ण बहु मोले।—–”
मैं आंखे बंद किए यह सब सुनता रहता था।
बचपन की यह स्मृति एक दिन फिर लौट आई जब
वर्ष २००३ में हम पहली बार आंध्रप्रदेश में स्थित तिरुपति में बालाजी की दर्शन यात्रा पर गए थे । बंगलुरु से चलकर रात्रि विश्राम हमने तिरुपति के एक होटल में किया था – सुबह मेरी नींद होटल की खिड़की से साफ सुनाई दे रही इस प्रभाती श्लोक को सुनकर जग गयी जो -सुबुलक्ष्मी जी गा रही थी- ” श्रीवेङ्कटेश सुप्रभातम्” –
“कौसल्या सुप्रजा राम पूर्वासन्ध्या प्रवर्तते ।
उत्तिष्ठ नरशार्दूल कर्त्तव्यं दैवमाह्निकम् ॥१॥” और इस स्तुति का समापन इस २९वें श्लोक पर हुआ-
“इत्थं वृषाचलपतेरिह सुप्रभातं
ये मानवाः प्रतिदिनं पठितुं प्रवृत्ताः
तेषां प्रभातसमये स्मृतिरङ्गभाजां
प्रज्ञां परार्थसुलभां परमां प्रसूते ॥२९॥”
देहरादून पहुंच कर एक दिन मैं बाल्मीकि रामायण पढ़ रहा था तो उपरोक्त स्तुति का पहला श्लोक मुझे यहां भी मिल गया- बालकाण्ड में ऋषि विश्वामित्र अपने शिष्य राजकुमार राम और लक्ष्मण से कह रहे हैं -उठ मेरे शेर खड़ा उठ और सुबह की संध्या पूजा की तैयारी करो । किशोरावस्था की नींद का खुमार बड़ा नशीला होता है ।-
“प्रभातायां तु शर्वर्या विश्वामित्रो महामुनिः I
अभ्यभाषत काकुत्स्थौ शयानौ पर्णसंस्तरे II
-जब रात बीती और प्रभात हुआ तब महामुनि विश्वामित्र ने तिनकों और पत्तों के बिछौने पर सोये हुए उन दोनों काकुत्स्थ वंशी राजकुमारों से कहा –
कौसल्या सुप्रजा राम पूर्वा संध्या प्रवर्तते I
उतिष्ठ नरशार्दूल कर्तव्यं दैवमाह्निकम् II
नर श्रेष्ठ राम तुम्हारे जैसे कौसल्या सुपुत्र जननी कही जाती है -यह देखो -प्रातः काल की संध्या का समय हो रहा है ,उठो और प्रतिदिन किये जाने वाले देवसम्बन्धी कार्यों को पूर्ण करो I
तस्यर्षेः परमोदारं वचः श्रुत्वा नरोत्तमौ I
स्नात्वा कृतोदकौ वीरौ जेपतु:परमं जपमII
महर्षि का यह परम उदार वचन सुनकर उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरों ने स्नान करके देवताओं का तर्पण किया और फिर वे परम उत्तम जपनीय मन्त्र गायत्री का जप करने लगे I”
GPB

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