अग्रज मोहन थपलियाल को याद करते हुए – (14 अक्टूबर, 1942-31 जनवरी, 2003)
By – Dr. Arun kuksal
लखनऊ के उत्तराखण्डी मित्रों में 20 नवम्बर, 2001 को डॉ. चन्द्रेश शास्त्री और 31 जनवरी, 2003 को मोहन थपलियाल ने हमसे अन्तिम विदाई ली थी। विगत शताब्दी के अन्तिम दो दशकों के दौरान लखनऊ में मेरे जैसे सैकडों उत्तराखण्डियों के ये दोनों अग्रज एवं अजीज़ मित्र थे। मेरे लिए डॉ.शास्त्री और थपलियाल जी से घण्टों हुई बातचीत का दिन बहुत सुखदाई और महत्वपूर्ण रहता।
पहाड़ से दूर रहने के दर्द को सहलाने का अंदाज इन दोनों में गजब का था। इनकी बातों में बौद्धिकता के रूखेपन के बजाय पहाड़ के जनजीवन की जीवन्तता की मिठास रहती।
लगता कि, लखनऊ में भी पहाड़ बिल्कुल मेेरे पास बैठा है।
लखनऊ के दैनिक ‘अमृत प्रभात’ (जहाँ अब दैनिक हिन्दुस्तान है) में अप्रैल, 1987 के दूसरे सप्ताह के किन्हीं दिनों में अपने जोड़ीदार चन्द्रशेखर तिवारी के साथ मोहन थपलियाल से पहली मुलाकात हुई थी। उनके लेखन से तो गहरा परिचय पहले से ही था। यह तय हुआ था कि 23 अप्रैल पेशावर दिवस के नायक चन्द्रसिंह गढ़वाली पर मेरा लेख नवभारत टाइम्स और चन्द्रशेखर तिवारी का अमृत प्रभात में छपेगा। हम लेख लिए अमृत प्रभात में पहुँचे।
‘थपलियाल जी से मिलना है, यह हम उन्हीं से पूछते हैं।’
‘बोलिये, मैं ही हूँ।’
हम दोनों अचका से गए। साधारण कद-काठी के थपलियाल जी मिलनसार लगने लगे।
पर यह क्या? ‘अच्छा देखता हूँ,’ यह कहकर वह तुरन्त अंदर गायब हो गए।
उन्होने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। अप्रत्याशित और अजीब सा लगा। उतरे चेहरे लेकर हम वापस आये। वह लेख छपेगा या नहीं हम आशंकित थे। लेकिन, 23 अप्रैल को चन्द्रशेखर का वह लेख प्रमुखता से संपादकीय पेज के बगल में चमक रहा था।
बाद के दिनों में उनसे मुलाकातें बढ़ी तो यह हम समझ गए कि उनमें जितनी बोलने में कंजूसी है, उतना ही ज्यादा स्नेह अपने से छोटों के प्रति है। अब उनसे अक्सर गोष्ठी, धरना, प्रदर्शन, रैली या फिर कॉफी हाउस में मुलाकात होती रहती।
हल्की मुस्कराहट के साथ काँधे पर झोला लटकाये वे धीरे से पूछते ‘क्य हाल-चाल छन कुकसाल जी।’ वे हमेशा मुझसे गढ़वाली में ही बात करते। चाहे कहीं पर और कितने ही मित्रों के साथ हों।
हमें खबर मिली कि दैनिक अमृत प्रभात बंद हो गया है।
थपलियाल जी विद्वान और अनुभवी हैं। उनको अन्यंत्र काम की क्या कमी है? सभी मित्र लम्बे समय तक इसी गफलत में रहे। महीनों से साल गुजरने लगा। थपलियाल जी का स्वास्थ्य भी उनसे नाराज रहने लगा।
लम्बी बीमारी से उपजी आर्थिक तंगी ने उन्हें घेर लिया। उनके अभिन्न मित्र महेश पाण्डे उनकी साहयता के लिए खूब दौड़-धूप करते। मददगार मित्रों की थपलियाल जी को कभी कमी नहीं रही। परन्तु, उनकी कठिन जीवनीय मान्यतायें उनकी नौकरी के लिए आडे आ जाती थी।
वो अखबार दर अखबार और अन्य आर्थिक अवसरों को बिना भविष्य की चिन्ता किए आसानी से छोड़ देते। हम दोस्तों की चिन्ता बढ़ती कि अब क्या होगा? लेकिन, थपलियाल जी बिल्कुल सामान्य रहते।
जीवन के कई विकट मोर्चों पर एक साथ लड़ते हुए भी उनके चेहरे पर उदासी एवं थकावट का नामो-निशान भी नहीं रहता था। लम्बे समय के बाद की मुलाकात पर वो अपने नवीन अध्ययनों, अनुवाद एवं लेखन को ही बताते। अपनी परेशानियाँ उन्होने कभी जग-जाहिर नहीं की।
मेरे मई,1996 में लखनऊ से श्रीनगर (गढ़वाल) आने पर उन्होने खुशी से तुरंत चिठ्ठी भेजी। लिखा था कि तुम खुशकिस्मत हो कि जो वापस गढ़वाल पहुँच गए। पहाड़ में तुम अधिक ऊर्जावान रहोगे। आज इतने वर्षों बाद यह सोच रहा हूँ कि लखनऊ से गढ़वाल-कुमाऊँ जितने आकर्षक और आत्मीय लगते हैं, उतनी ही जीवनीय विकटता और अकेलापन यहाँ रहकर महसूस कर रहा हूँ।
तुर्रा यह भी कि अब तो हमारा पृथक उत्तराखण्ड राज्य है।
हिंदी पत्रकारिता और साहित्य लेखन में मोहन थपलियाल अग्रणी स्थान पर विराजमान हैं। जर्मन साहित्य के श्रेष्ठ हिंदी अनुवादकों में वे हैं। बर्तोल्त ब्रेख्त के सम्पूर्ण साहित्य का उन्होंने गहनता से अध्ययन किया। ब्रेख्त की कविताओं एवं नाटकों का उनके द्वारा हिन्दी अनुवाद अदभुत है। जानकारों का मानना है कि ब्रेख्त की गंवई एवं रूखड़ भाषा का अनुवाद करना बहुत दुरुह कार्य था। जो मोहन थपलियाल ने निपुणता से किया। ब्रेख्त के जन्म शताब्दी वर्ष- 1998 में प्रकाशित अनुवादित पुस्तक ‘बर्तोल्त ब्रेख्त: इकत्तर कवितायें और तीस छोटी कहानियाँ’ की जन लोकप्रियता मोहन थपलियाल में निहित असीम प्रतिभा को सार्वजनिक करता है।







