‘नशा नहीं-रोजगार दो आन्दोलन’: 41 वर्षों का फैलाव
‘जो शराब पीता है, परिवार का दुश्मन है।’
‘जो शराब बेचता है, समाज का दुश्मन है।’
‘जो शराब बिकवाता है, देश का दुश्मन है।’
@by Dr. Arun kuksal

चौंकिए मत, उक्त नारे आज के नहीं वरन 41 वर्ष पूर्व के हैं। आज तो उक्त नारों में ‘दुश्मन’ शब्द तथाकथित ‘दोस्त’ में तब्दील हो कर समाज के संचालन में ‘हितेषी’ का दर्जा हासिल कर चुका है।
बात अतीत की है, और अतीत को सहलाना ही तो आजकल हम-सबकी दिन-चर्या बनती जा रही है। यह मूलभूत नागरिक समस्याओं से ध्यान हटाने का प्रभावशाली वर्ग और उसके पैरोकारों के लिए अचूक तरीका जो है।
बात फिर अतीत की करते हैं। विगत शताब्दी के सत्तर के दशक में गढ़वाल-कुमाऊँ में वन-आन्दोलन के वैचारिक ताप को आत्मसात किए तब के सैकड़ों युवाओं ने ‘निजी पढ़ाई के साथ सामाजिक लड़ाई’ का नारा दिया था। इस विचार के तहत तब के ‘पर्वतीय युवा मोर्चा’, ‘युवा निर्माण समिति’ और ‘उत्तराखण्ड सर्वाेदय मण्डल’ के प्रतिनिधि युवाओं ने आपसी सहमति से 25 मई, 1977 को गोपेश्वर में ‘उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी’ का गठन किया था।
‘उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी’ 70 और 80 के दशक में गढ़वाल-कुमाऊँ के युवाओं को ‘पढ़ाई के साथ लड़ाई’ नारे लिए सामाजिक सरोकारों से जोड़ने और उन्हें उसमें दक्ष करने की शीर्ष संस्था के रूप में लोकप्रिय हुई।
‘नशे का प्रतिकार न होगा, पर्वत का उद्धार न होगा’ और ‘नशा नहीं-रोजगार दो, काम का अधिकार दो’ जैसे जन-नारों की गूंज के साथ बसभीडा, अल्मोड़ा की विशाल सभा से ‘उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी’ के नेतृत्व में 2 फरवरी, 1984 को ‘नशा नहीं-रोजगार दो आन्दोलन’ का आगाज़ हुआ था। इसके तीखे तेवरों को स्वीकारते हुए तब यह आन्दोलन आम उत्तराखण्डी जन-मानस की सक्रियता से जन-आन्दोलन के मुकाम पर पहुँचा था।
लेकिन, नियति देखिए धीरे-धीरे साल दर साल नशा-तंत्र के क्रूर षडयंत्रों के सामने आम-जन के मन-तंत्र को परास्त होना पड़ा था। क्योंकि, नशा-तंत्र का मजबूत पालनहार उत्तराखण्ड की सामाजिक – राजनैतिक व्यवस्था जो थी।
कहना होगा कि, ‘नशा नहीं-रोजगार दो’ आन्दोलन के चार दशक बाद, तब से अब तक इतना बड़ा फर्क हुआ कि तब शराब उत्तराखण्ड में कुछ लोगों की आय का ज़रिया थी। आज़ शराब उत्तराखण्ड सरकार की आय का एक प्रमुख ज़रिया है।
आज इस संदर्भ में नशा-तंत्र और प्रभावकारी-तंत्र का भेद ‘शब्दों’ में है, सामाजिक ‘सरोकारों’ में कम दिखता है।
सरकार का शीर्ष, संसाधनों के अभाव के बहाने उन क्षेत्रों से भी अधिक से अधिक राजस्व जुटाना चाहता है जिसे सामान्य अवस्था में भी जनकल्याणकारी नीतियों के विरुद्ध समझा जाता है। अधिक से अधिक शराब के विक्रय केन्द्र खोल कर इस बात को बेवजह परोसा जा रहा है कि शराब के बिना सरकार अपना समुचित राजस्व नहीं जुटा पायेगी। इससे आम जन में यहाँ तक कि बच्चों तक के मन-मस्तिष्क में यह संदेश गया कि शराब सरकारी आय का प्रमुख जरिया है।
ताजुब्ब ये है कि यह सबको मालूम है कि इस झूठ के हानिकारक गम्भीर नतीजे उत्तराखण्डी समाज में दिख रहे हैं और आने समय में और भयावह दिखेंगे।
भारतीय संविधान की धारा 47 में उल्लेखित है कि ‘‘राज्य अपनी जनता के पोषण, भोजन और जीवन निर्वाह के स्तर को ऊँचा करने तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य के सुधार को अपने बुनियादी कर्त्तव्यों में प्रमुखता देगा और विशेष रूप से स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नशीले पेयों और दवाओं, सिवाय उनके जो चिकित्सा के काम की हैं, को प्रतिबन्धित करने का प्रयत्न करेगा।’’
देश के संविधान में इतना स्पष्ट होते हुए भी नशे और उस पर नियत्रंण हेतु अब तक राष्ट्रीय नीति नहीं बन पायी है। यह एक दुखःद पहलू है।
उत्तराखण्ड राज्य के जन-जीवन को शराब किस हद तक प्रभावित कर रही है, इसकी एक बानगी ये है कि ‘‘उत्तराखण्ड में पहाड़ की ओर जाने वाला हर सातवाँ ट्रक शराब से भरा होता है, तो पहाड़ से लौटने वाला हर दसवाँ ट्रक शराब की रीती खाली बोतलों से भरा होता है, यह सब तब है जबकि पूरे पहाड़ मेें अवैध शराब के खिलाफ एक मजबूत नाकेबंदी का दावा किया जाता है।’’ (एक अध्ययन)
वर्तमान समय में नशे की समस्या से उत्तराखण्ड का प्रत्येक गाँव एवं नगर ग्रसित है। शराब से आम जनता के स्वास्थ्य में गिरावट आयी है, लोगों की मृत्यु में नशा एक बड़ा कारण बनता जा रहा है। आचरण ही नहीं इससे अपराध भी बड़ रहे हैं। सड़क दुर्घटनाओं की तेजी से बड़ती संख्या का एक प्रमुख कारण शराब सेवन है। आम लोगों की आमदानी का बहुत बड़ा हिस्सा शराब मेें ही बरबाद हो रहा है। यह भी देखा गया कि शराब के प्रचलन को बड़ावा देने वाला वर्ग शराब के जरिये अवैध कार्यों को करवाने में सफल हो जाते हैं।
सेना में भर्ती के आंकडे़ यह इंगित कर रहे है कि स्वास्थ्य के निर्धारित मानकों को पूरा करने में उत्तराखण्ड के अधिकांश युवा अयोग्य साबित हो रहे है। परिणामस्वरूप उनके लिए फौज में भर्ती होना कठिन होता जा रहा है।
अंग्रेजों ने औपनिवेशिक शासन की मजबूती एवं विस्तार के लिए सर्वप्रथम कौसानी एवं लैंसडोन मेें सैनिक छावनियाँ बनाई। इन छावनियों ने एक तरफ सैनिक तैयार किये तो दूसरी तरफ पहाड़ में शराब का प्रचलन बढ़ाया। आज से लगभग 200 साल पहले अंग्रेजों ने यहां के युवाओं को सेना में भर्ती कराने हेतु शराब का लालच दिया था।

आज उसी शराब सेवन के कारण यहाँ के युवा सेना में भर्ती नहीं हो पा रहे हैं।
यह समझा जाना चाहिए कि उत्तराखण्ड में नशे के खिलाफ चल रहे आन्दोलन उपदेश एवं सुधारवादी तरीके से स्थानीय एवं प्रदेश स्तर पर मात्र नशाबन्दी तक ही सीमित नहीं है।
शराब आन्दोलनों में शामिल आम आदमी को अब लगता है कि वह अपने परिवेश के वातावरण एवं शासक तंत्र को बदल सकता है। शराब पर प्रहार करके आन्दोलनकारी नशे की मानसिकता एवं उसको पालने-पोषने वाले तंत्र की कुव्यवस्था को भी समूल खत्म करना चाहते हैं।
यह प्रचारित किया जाता है कि नशाबन्दी से राज्य का पर्यटन उद्योग कमजोर होगा। यह नितान्त अव्यवहारिक तथ्य है। यह जगजाहिर है कि उत्तराखण्ड अदभुत नैसर्गिक वन्यता एवं परम आस्था के तीर्थस्थलों का धनी अंचल है। तीर्थयात्री, पर्यटक, पथारोही, पर्वतारोही, अध्येता आदि हिमालय में विराजमान आध्यात्मिक शान्ति, देव-दर्शन एवं प्राकृतिक सुन्दरता से अभीभूत होकर अपने परिवार के साथ बार-बार आने की कामना रखते हैं। पर्यटकों एवं तीर्थयात्रियों की परिवार के साथ उत्तराखण्ड आने की परम्परा ही इस बात का सूचक है कि शराब पीना उनका कदापि आर्कषण नहीं रहा है।
शराब बन्दी के विरोध सबसे मजबूत तर्क यह दिया जाता है कि इससे राज्य सरकार की आय में तेजी से गिरावट आयेगी। यदि इस तथ्य को मान भी लिया जाय तो यह भी सोचा जाना चाहिए कि नशाबन्दी से राज्य के लोगों की पारिवारिक वित्तीय बचत निश्चित रूप में बढ़ेगी। परिवार की यह आर्थिक बचत शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार आदि में काम आयेगी। जो कि आखिर में राज्य के वित्तीय संसाधनों को मजबूत एवं बड़ाने में ही तो मदद करेगी।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के चर्चित संदेश की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूँ कि ‘…अगर मुझे केवल एक घण्टे के लिए भारत का शासक बना दिया जाय तो सबसे पहले मैं देश भर में शराब की सभी दुकानों को बिना कोई मुआवजा दिए बंद करा दूंगा’ (यंग इण्डियाः 15 मार्च 1931)
आज 2 फरवरी, 2024 को ‘नशा नहीं-रोजगार दो आन्दोलन’ की 41वीं वर्षगांठ है। उत्तराखण्ड और देशभर के अनेक साथी और जन-संगठनों के प्रतिनिधि में इसके जन्मस्थल घुंगोली-बसभीड़ा (चौखुटिया) में चिन्तन-मनन के लिए जुट रहे हैं। आपसे भी, इस आन्दोलन की लौ को बचाये रखने का अनुरोध किया ही जाना चाहिए।
क्योंकि, आप यह जानने से ज्यादा गम्भीरता से समझते भी हैं कि ‘शराब का कट्टर समर्थक भी अपनी भावी पीढ़ी को शराबी नहीं देखना चाहता है।’
चित्र- 2 फरवरी, 1986 बसभीड़ा, चौखुटिया (अल्मोड़ा)
चित्र में पुरुषोत्तम असनोड़ा, गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’, अरुण कुकसाल, निर्मल जोशी, मंगल सिंह, चन्द्रशेखर तिवारी आदि…







