लोकजीवन के अनुभवों की अभिव्यक्ति है संस्कृति
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– ‘जीवन और संगीत’ विषय पर सोमवार को आयोजित ‘जागरण विमर्श’ में संगीतकार पद्मश्री डा. माधुरी बड़थ्वाल ने कही यह बात
– कहा, लोक संगीत पर किसी एक व्यक्ति का अधिकार नहीं, वह तो समूह से उत्पन्न होता है और फिर उसी में हो जाता है एककार
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By – Dinesh Kukreti
देहरादून: प्रकृति और संस्कृति लोक के ही दो रूप हैं। लोक को प्रकृति ही वह आधार प्रदान करती है, जिस पर संस्कृति के अंकुरण फूटते हैं। देखा जाए तो संस्कृति लोकजीवन के अनुभवों की अभिव्यक्ति है। प्रकृति के तत्व जैसे पर्यावरण व पारिस्थितिकी तंत्र, रीति-रिवाज, खान-पान, बोली-भाषा व पहनावा विश्वास और ज्ञान को आकार देते हैं, जबकि लोक संस्कृति उस जीवन शैली को दर्शाती है, जो प्रकृति के साथ मानव की अंतःक्रिया से विकसित होती है। इसके प्रमाण हैं लोक में रचे-बसे वह गीत, जो लोक से उत्पन्न हुए और फिर लोक में ही समा गए। इन्हीं के सुरों से संगीत और नृत्य की उत्पत्ति हुई। ‘दैनिक जागरण’ के पटेल नगर स्थित कार्यालय में सोमवार को ‘जीवन और संगीत’ विषय पर आयोजित ‘जागरण विमर्श’ में यह बात आल इंडिया रेडियो की पहली महिला संगीतकार एवं उत्तराखंड की पहली महिला संगीत शिक्षक रहीं पद्मश्री डा. माधुरी बड़थ्वाल ने कही।
संगीतकार माधुरी बड़थ्वाल ने कहा कि लोक संगीत प्रकृति का मूल तत्व है, जो जीवनभर हर परिस्थिति में मनुष्य के साथ रहता है। लोक संगीत ही संस्कृति का सच्चा संवाहक है। संगीत के मूलत: दो रूप हैं शास्त्रीय संगीत व भाव संगीत और दोनों की उत्पत्ति लोक संगीत से हुई है। लोक संगीत पर किसी एक व्यक्ति का अधिकार नहीं, वह तो समूह से उत्पन्न होता है और फिर उसी में एकाकार हो जाता है। लोक संगीत का जन्म वाचिक परंपरा से हुआ। मनुष्य के पास जब मनोरंजन के कोई साधन नहीं थे, तब वह लोकगीत ही थे, जो उसके कंठ से प्रस्फुटित हुए और लयबद्ध होकर लोकगीत बन गए।वाचिक परंपरा में यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होते रहे और लोक समृद्ध होता चला गया। इसमें साज ने अहम भूमिका निभाई। देखा जाए तो लोक (समाज) में हम जो देखते हैं, महसूस करते हैं, जिसके अनुरूप अपने परिवेश को ढालते हैं और फिर उस संपूर्ण जीवन यात्रा को शब्दों में ढालकर संगीत से सजाते हैं, वही लोकगीत हैं। बानगी देखें- ‘फूल कविलास रै मासी को फूल, फूल कविलास कै मैना मौळलू, फूल कविलास वै चैता मौळालू’ (देखो! कैलास में मासी का फूल खिल उठा है। पता है यह फूल किस महीने अपनी छटा बिखेरता है। यह फूल चैत यानी चैत्र मास में खिलता है)।
आहत नाद और अनहद नाद के रूप में परिभाषित हुआ है लोक
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माधुरी कहती हैं कि लोक में भाव की अहमियत है। वह भाव ही उसे लोक से आत्मसात करता है। लोक ऐसी मधुर ध्वनि है, जिसे हम आहत नाद और अनहद नाद के रूप में परिभाषित करते हैं। इसीलिए लोक को प्रकृति का प्रतिविंब कहा गया है। देखें- ‘हे! ऊंची डांड्यों तुम निसि ह्वे जावा, हे! बाबाजी को देश मैं देखण द्यावा’ (कैलास में रहते हुए माता पार्वती ऊंचे पर्वतों से अनुनय-विनय कर रही हैं कि तुम छोटे हो जाओ, मुझे अपने पिता का देश यानी मायका देखना है)। इसी तरह, ‘तै ऊंचा कैलास द्यो लागी, क्वी होंदू मेरो द्यो लागी, मैत बुलांदू द्यो लागी’ (ऊंचा कैलास बादलों से घिरा हुआ है, मेरा भी कोई होता तो मुझे मायके बुलाता)। वह कहती हैं, संगीत तो यत्र-तत्र-सर्वत्र है, बस! उसे ढूंढना पड़ता है, मंद-मंद समीर में, नीर में, पंछियों के कलरव में, फूलों महक में और जीवन संघर्ष में।
समाज को एक सूत्र में बांधने की कला है लोक संगीत
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माधुरी कहती हैं कि लोक संगीत समाज को एक सूत्र में बांधने की कला है। संगीत की कोई भाषा नहीं होती, वह तो भाव से अभिव्यक्त होता है। इसलिए वह सबका प्रिय है। जिसे लोक संगीत से अनुराग नहीं, उसके जीवन का कोई मोल नहीं। इसीलिए लोक की हर अभिव्यक्ति में संगीत की गूंज सुनाई देती है। असल में मनुष्य की पहली शिक्षक तो प्रकृति ही है, जो जीवन को संस्कृति से जोड़ती है। इसकी बानगी देखिए- ‘सटड़ी बाड़ियों मा न जा रै मेरी घुघूती, छोरा छीं फंसेरा रै मेरी घुघूती’ (मां आंगन में बैठी घुघूती यानी फाख्ता से कह रही है कि तू बाड़ की तरफ मत जा, वहां बच्चों ने तुझे फंसाने के लिए जाल बिछाया है)।
रोजी-रोटी का आधार भी हैं लोक गीत
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वर्तमान परिप्रेक्ष्य में लोकगीत आत्मसंतुष्टि और मनोरंजन का ही माध्यम नहीं हैं। वह तो रोजी-रोटी का आधार भी हैं। बकौल माधुरी, ‘वह पिछले 15 वर्षों से महिलाओं को गीत, संगीत और नृत्य का निश्शुल्क प्रशिक्षण दे रही हैं। अब तक जितनी भी महिलाओं को उन्होंने इन विधाओं में पारंगत किया, वह आत्मनिर्भर तो हुई ही हैं, अपनी कला से देश-दुनिया में उत्तराखंड का मान भी बढ़ा रही हैं। सुखद अनुभूति होती है, जब लुप्त हो चुके मांगल गीत गाती महिलाओं की टोलियों को देशभर में मंगल गायन के लिए आमंत्रित किया जाता है।’
लोक एक महासागर, उससे कुछ बूंदें निकालकर लोक को कीं समर्पित
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माधुरी कहती हैं कि लोक स्वयं में एक महासागर है, जिसमें से कुछ बूंदे निकालकर उन्हें लोक को ही समर्पित किया है। लोक कला का संरक्षण ही उनके जीवन का ध्येय है, ताकि लोक न केवल जीवित रहे, बल्कि जीवंत भी रहे। अच्छी बात है कि विभिन्न कारणों से लोक से दूर हो चुकी नई पीढ़ी अब फिर लोक में ही अपनी जमीन तलाश रही है। उम्मीद है कि नई पीढ़ी का यह प्रयास ने भविष्य में लोक की समृद्धि का आधार बनेगा। तब लोक में गूंजेगा, ‘नै डाळी पयां जामी, द्यवतौं का सता ना नैं डाळी पयां जामी’ (पयां का नई पौध अंकुरित होने लगी है, लोक देवताओं के सत यानी आशीर्वाद से उम्मीद का यह अंकुरण फूटा है)।







