पुरेल्ड़ी से उतरना भी एक चैलेंज होता है।
By – Mahipal Negi
फसल कटाई के बाद पहाड़ में सर्दियों के लिए सूखी घास/ चारा जमा करना भी एक प्रमुख काम होता है। इसे संरक्षित करने का एक तरीका पहाड़ में इस तरह पुरेल्डी लगाना होता है। प्रायः सीधे पेड़ों पर घास की पुळियों को क्रम से बांधा जाता है। वैसे निकालने का क्रम भी नीचे से ही शुरू होता है।
पुरेल्ड़ी के लिए पेड़ का चयन भी एक महत्वपूर्ण चैलेंज होता है। ऐसा पेड़ जिस पर पूरेल्डी लगाना आसान हो, लगाने के बाद उतरना आसान हो और सर्दियों में चारा निकालते रहना भी सुविधाजनक हो। यहां पर इस पेड़ पर इस परिवार ने पिछले वर्षों में भी शायद पुरेल्डी लगाई होगी। लेकिन वह थोड़े नीचे वहां से शुरू हुई होगी जहां से पेड़ दो पहनियों में बंट जाता है। एक साथ दोनों टहनियां का भी उपयोग किया गया होगा।
लेकिन अब देखिए कि सीधी वाली टहनी सूख चुकी है, तो दूसरी टहनी का उपयोग किया गया। यह थोड़ा असुविधाजनक है। प्रायः इस तरह के पेड़ खेत के बिट्टे या मेंड पर होते हैं और दोनों ही जगह उतरना दिक्कत वाला होता है। बीच खेत में तो पेड़ होते नहीं हैं। शायद इस पुरेल्डी को थोड़ी ऊंचाई इसलिए दी गई है कि नीचे आसपास कभी आग लगने से यह सुरक्षित रहे या खेतों में चरने वाले जानवर ना खींचे। हमारे गांव की तरफ प्रायः भीमल या खड़ीक के पेड़ों पर लगाई जाती है।
क्योंकि बचपन से लेकर युवावस्था तक मैंने ऐसी कई पुरेल्डियां लगते – लगाते देखी हैं, तो मेरे हिसाब से यह पुरेल्डी के लिए सुरक्षित और अनुकूल पेड़ नहीं है। कहां का वीडियो है, यह पता नहीं लेकिन इन्हें आगामी वर्ष में इस पेड़ पर पुरेल्डी नहीं लगानी चाहिए। या फिर ध्यान रहे कि इसकी ऊंचाई में 1/3 कटौती कर दी जाए अर्थात इतनी ऊंची न लगाई जाए। यह तीनों दृष्टि से उपयुक्त नहीं है।
लगाते समय, उतरते समय और बाद में चारा निकालते समय यह असुविधाजनक और खतरनाक भी है। इसके टूटने का भी डर रहेगा।
@फोटो साभार आशी डोभाल। @लेखक वरिष्ठ पत्रकार है।







