By Lakshaman brijwasi
समकालीन हिंदी कविता में कवयित्री डॉ प्रीति आर्या अपना एक अलग स्थान रखती हैं। वे पहाड़ पर रहती हैं, पहाड़ को जीती हैं और पहाड़ को रचती हैं। प्रीति आर्या ने ‘मैं पानी हूं’, ‘मेरे हिस्से का आसमान’ जैसे चर्चित काव्य–संग्रहों से अपने पारिवारिक जीवनानुभव के रेखांकन के साथ–साथ पहाड़ी एवं मैदानी जीवन में व्याप्त विसंगतियों पर जमकर प्रहार किया है। उन्होनें अपने उपर्युक्त काव्य–संग्रहों से विशेषतः दलितों और स्त्रियों के जीवन को बहुत कष्टमय बना देने वाली ब्राह्मणवादी सत्ता, पुरुषवादी सत्ता और श्रेष्ठवादी सत्ता के साथ–साथ उन सभी प्रत्यक्ष–परोक्ष सत्ताओं को आड़े हाथों लिया है, जिन्होंने धरती के कोमल और भावी वृक्षों को दुबला बनाकर सुखा दिया।
न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली से अभी हाल ही में प्रकाशित होकर प्रीति आर्या का नया काव्य–संग्रह ‘आबनूस’ आया है। इसमें 90–91 कविताएं हैं, जो दो उपखंड में विभाजित हैं।
हिंदी के पुरखे आलोचकों–कथाकारों आदि का मानना है कि लिखे जा रहे साहित्य का शीर्षक आकर्षक होना चाहिए। एक गंभीर अर्थ को लिए हुए होना चाहिए। एक प्रकार से अमुक शीर्षक कथित भिन्न–भिन्न बात का सामासिक रूप ग्रहण किया हुआ हो। अब यहां यह देखने वाली बात है कि प्रीति आर्या का यह सद्यः प्रकाशित काव्य–संग्रह ‘आबनूस’ अपने शीर्षक में ग्रहण किए हुए सार में कहां तक न्यायोचित है। प्रीति आर्या अपने इस काव्य–संग्रह ‘आबनूस’ को समझने के लिए दो कविताएं आबनूस पर ही लिखी हैं। दरअसल आबनूस एक जंगली पौधे का नाम है। जो मूलतः दक्षिण भारत और श्रीलंका आदि के साथ एशियाई देशों में पाया जाता है जो काले रंग का होता है, जिसका उपयोग औषधि के रूप में, घर आदि बनाने के रूप में और संगीत वाद्य यंत्र आदि बनाने में किया जाता है। प्रीति आर्या आबनूस को मूल निवासी के प्रतीक के रूप में मानती हैं और इसके काले रूप को जैसे वे भारत के मूलनिवासियों से जोड़कर देखती हैं–
“ सुदृढ़ भारी
आबनूस का कुंडा
मूल निवासी ”
“ काली रंगत
सघन औ’ टिकाऊ
जल विरोधी ”
“ घने, भ्यांस जंगल का वासी
कठोर, सुदृढ़, सघन
सबसे महत्त्वपूर्ण
पानी में न तैरने की हठधर्मिता
यही है मेरा वास्तविक स्वरूप
किंतु मेरे भीतर छिपे हीर की
प्रतिभा का होते ही भान
गढ़कर अभिजात्य रूप
बहुमूल्य योग्यता का करते व्यापार
अन्यथा उनकी सभ्य और सुसंस्कृत दृष्टि में
एक समान हैं – आबनूस – आदिवासी और शूद्र।। ”
दरअसल यह जो जल विरोधी भाव है, पानी में न तैरने की हठधर्मिता है– यही कवयित्री का भी स्थाई भाव है क्योंकि कवयित्री (प्रयोगवाद और नयी कविता के शलाका पुरुष ‘अज्ञेय’ के शब्दों में ) यह भलीभांति जानती हैं–
“ क्योंकि बहना रेत होना है।
हम बहेंगे तो रहेंगे ही नहीं। ”
तो यह है कवयित्री प्रीति आर्या का आबनूस। जिसे कितने गंभीर चिंतन के बाद उन्होंने लयबद्ध पद रूप में गढ़ा है।
इस काव्य–संग्रह में ऐसा नया क्या है ? जो पाठकों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। रसास्वादन के लिए बांध रहा है। तो इन सभी प्रश्नों के जवाब के पीछे है, इस काव्य–संग्रह के लेखन की नूतन शैली। यानी कि हाइकु कविताएं।
प्रीति आर्या के पिछले काव्य–संग्रह मेरे हिस्से का आसमान’ की शुरुआत बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर पर लिखी कविता से होती है और आबनूस’ काव्य–संग्रह की शुरुआत भी बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर पर लिखी कविता से होती है। अंतर यहां लिखने की शैली में है यानी हाइकु में–
“ 14 अप्रैल
अठरा सौ इकानब्बे
उगा सूरज
×××××××
सातवां वर्ष
छूटा माता का साया
बिखरे मोती
×××××××
लील गया था
शूद्रों का आत्मोत्सर्ग
ब्राह्मणवाद
×××××××
जन्मे अछूत
कर्म किए महान
है जग नत
×××××××
महिला रक्षा
दे हिन्दू कोड बिल
घोर विरोध
×××××××
छ: दिसम्बर
जग से अलविदा
परिनिर्वाण ”
प्रीति आर्या के इस काव्य–संग्रह में शिल्प तो नया है पर भाषा और शब्द शक्ति वही पिछले दो काव्य–संग्रहों की भांति ही है यानी सहज–सरल और अभिधा रूप में। जैसे कवयित्री प्रीति आर्या यह अप्रत्यक्ष बताती हैं कि वे किसके लिए लिख रही हैं और उन्हें अपनी बात किस तरह के व्यक्तियों तक पहुंचानी है।
एक प्रकार से हाइकु जापानी कविता का एक छोटा, बिना तुक वाला रूप है, जिसमें तीन पंक्तियां होती हैं। पहली पंक्ति में पांच, दूसरी में सात और तीसरी में पांच शब्दांश होते हैं। जिसमें कुल सत्रह शब्दांश होते हैं।
हिंदी में हाइकु कविताएं तो मुख्य धारा के कवियों ने खूब लिखी है पर सबाल्टर्न धारा से आए कवियों ने कम ही लिखी है। इस तरह के लोगों में ठीक ठिकाने की हाइकु कविता चर्चित कवि और चिंतक मुसाफिर बैठा की नजर आती है। किंतु प्रीति आर्या की हाइकु कविताएं अलग स्तर की हैं। मुसाफिर बैठा पर प्रीति आर्या भारी पड़ती दिखाई देती हैं। बैठा ही नहीं प्रीति आर्या की हाइकु कविताएं लगभग मुख्यधारा के भी बहुत सारे हाइकुवादी कवियों की अग्रणी पंक्ति में खड़ी नजर आती हैं। जिसके कई कारण हैं । पहला और महत्त्वपूर्ण कारण भावानुसार शब्दावली का सुंदर प्रयोग। और ऐसा संतुलन कि भावार्थ पर कहीं भी आघात पड़ता दिखाई नहीं देता है। आदि से अंत तक स्वाभाविक प्रवाह दिखाई देता है।
फुले दंपति पर आधारित ‘फुले’ फिल्म को लेकर पिछले कई दिनों से कहा–सुनी चल रही है। हमारे यहां बॉयकॉट की एक नई प्रणाली विकसित हो रही है। लोगबाग़ यह जैसे भूल रहे हैं या उन्हें भुलवाया जा रहा है कि भारतीय संस्कृति वाद, विवाद और संवाद की कभी संस्कृति ही नहीं रही है। जबकि भारतवर्ष में हिंदू षडदर्शन है तो चार्वाक, बौद्ध और जैन दर्शन भी है। भारतवर्ष में कबीरदास हैं तो गोस्वामी तुलसीदास, महात्मा सूरदास तथा मलिक मुहम्मद जायसी भी हैं। भारतवर्ष में स्वामी विवेकानंद हैं तो ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले भी हैं। भारतवर्ष में बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर हैं तो महात्मा गांधी भी। यही इस भारतवर्ष की खूबसूरती है। विविधता में एकता। अर्थात् सामासिक संस्कृति की परंपरा ही भारत की परंपरा है।प्रीति आर्या सावित्रीबाई फुले पर भी हाइकु कविता रचती हैं–
“पति की प्रिया
शिक्षा को साथ लिया
तपस्यारत
********
थीं वे देश की
प्रथम स्त्री शिक्षिका
ज्ञानदायिनी
********
हिंदू समाज
व्याप्त था मनुवाद
घोर निराशा ”
कविता या साहित्य की अन्य विधाओं द्वारा साहित्यकार व्यष्टि से समष्टि की ओर यात्रा करता है। इस तरह के खास लेखन में पहाड़ के मूल निवासी Gambhir Singh Palni सिद्ध साहित्यकार हैं। अभी कुछ दिन पहले हिंदी की चर्चित कवयित्री डॉ. माया गोला की ‘पिता’ पर बहुत ही सुंदर कविताएं पढ़ने को मिली थी लेकिन पिता पर हाइकु में पहली बार इतनी सुंदर कविता कवयित्री प्रीति आर्या के यहां पढ़ने को मिली है। शायद ही हाइकु में इतने सधे शब्द और भाव की साम्यता कहीं और देखने को मिले। कला का सुंदर रूप ‘पिता’ कविता में विद्यमान है–
“ है नारियल
कोमलकांत मन
रक्षा संतति
××××××
विदा बिटिया
नतमस्तक होता
अश्रुपूरित ”
किसे नदी अच्छी नहीं लगती है। स्त्री कवियों ने नदी को बार–बार स्त्री के रूप में देखा है। आर्या जी का भी मानना है कि नदी और स्त्री में बहुत दूर तक समानता है। दोनों सृजन की जननी हैं। दोनों प्यार देती हैं। और जरूरत पड़ने पर विराट रूप भी धारण करती हैं–
“ है उफनती
अपमान प्रकृति
रूठती नदी
×××××××
बहे निर्बाध
देती जीवन गति
नदी और स्त्री ”
वह कवि कवि क्या जो दार्शनिक प्रश्नों से न जूझे। कबीर, जायसी, सूर, तुलसी से लेकर आधुनिक से उत्तर आधुनिक युग के बहुत सारे कवि जीवन और जगत को लेकर लगातार जूझते दिखाई देते हैं। वैसे काव्य के क्षेत्र में दार्शनिक–पुट के आने से काव्य की उम्र और लंबी हो जाती है। कवयित्री आर्या भी जीवन को लेकर जूझती दिखाई देती हैं। पर आर्या जी शिल्प बदलकर बात करती हैं यानी कि हाइकु में–
“ जीवन नैया
सुख दुःख खेवैया
मझधार में ”
अपने पर्यावरणीय कविताओं में प्रीति आर्या ‘चिपको आंदोलन’ को भी याद करती हैं। वे उस तथाकथित विकास के मॉडल को आड़े हाथ लेती हैं जिसकी ओट में जल, जमीन और जंगल को धन्ना सेठ लोग लूट रहे हैं। वे जंगलों को जला रहे हैं। पशु–पक्षियों के आशियाने को बर्बाद कर रहे हैं।
समय बदलता है तो बहुत सारी चीजें बदल जाती हैं। सुख–दुःख में भी परिवर्तन होता है। नया पुराना हो जाता है और पुराना नया। परंपरा, संस्कृति, रोजमर्रा–जीवन में परिवर्तन होता है। पहाड़ों पर अब नौले सूख रहे हैं। पनिहारिन अब टोटीबद्ध औरत बन चुकी हैं या बनने के कगार पर हैं…।
“ पनिहारिन
सिर मेघ गागर
भीगा आंचल ”
इसी काव्य–संग्रह में प्रीति आर्या भिन्न–भिन्न विषयों पर अच्छी कविताएं लिखीं हैं। वे ‘मताधिकार/ दल बदलू नेता/ तोड़े भरोसा’ जैसे लोगों को पहचानती ही हैं साथ में ‘श्वेत चेहरे/ हिरन की खाल में/ छुपे भेड़ियों’ को भी पहचानती हैं। और उन्हें बेनकाब भी करती हैं। साथ ही वे उन लोगों को भी पहचानती हैं जो गरीब जनता, अंतिम पायदान पर खड़ी जनता को– सदियों से ठगते आ रहे हैं। उनके हिस्से की रोटी उड़ा रहे हैं। उनके श्रम–मूल्य पर जबरन कब्जा कर रखा है–
“ औरों के कार्यों का
ले लेते हैं सहर्ष श्रेय
अवसरवादी और
घुसपैठिए। ”
कलम की ताकत को तलवार की धार से कम न समझने वाली यह कवयित्री किसी से डरती नहीं है। बल्कि उधार के ज्ञान पर बात रखने की अपेक्षा अपने मौलिक इतिहास बोध से अपने समय और समाज को नई दिशा देने की कोशिश करती है। वे सहचर भाव बद्ध समाज और समता मूलक समाज के लिए प्रतिबद्ध हैं। इसीलिए वे भेड़चाल को स्वीकार नहीं करती हैं। चूंकि भेंड़चाल इतिहास निर्माता नहीं होती हैं। समाज को दिशा देने में अक्षम होती हैं। वे एकला चलो पर भरोसा करती हैं–
“ मैं भेड़ नहीं हूं
इसलिए मुझे भीड़ नहीं चाहिए ”
इस काव्य–संग्रह की कुछ कमियों पर भी नजर बार–बार जाती है, यथा–
१. ‘फूले’ की जगह ‘फुले’ होना चाहिए।
२. ‘कवियत्री’ की जगह ‘कवयित्री’ होना चाहिए।
३. ‘खैवैया’ की जगह ‘खेवैया’ या ‘खिवैया’ होना चाहिए।
इसके पीछे एक बड़ा कारण हिंदी व्याकरण और हिंदी टाइपिंग की अधूरी जानकारी दिखाई देती है। जिसकी बड़ी जिम्मेदारी प्रकाशन संस्थाओं की बनती है। हालांकि इसे अगले संस्करण में सुधारा जा सकता है।








