साठ के दशक में ‘रगड़ खाती आत्महत्याएँ’ और ‘नए-पुराने माँ-बाप’ जैसी कतई अछूती संवेदना को लेकर उभरे कथाकार गोविन्द मिश्र शायद हमारी पीढ़ी के सबसे बड़े कथाकार हैं। नई कहानी की तिगड़ी राकेश, यादव, कमलेश्वर हों या छठे दशक की तिगड़ी ज्ञानरंजन, दूधनाथ और कालिया, सब लोग अपनी जबरदस्त प्रतिभा के बावजूद अपने अहंकार और अति महत्वाकांक्षा के कारण किस तरह बुझते चले गए, इसे हम जीतेजी अपनी आँखों से देखते रहे हैं।
अरम्भिक उपन्यास ‘लाल पीली जमीन’ के माध्यम से बुंदेलखंड का जो नया और मौलिक फलक सामने आया वह हिंदी के आत्ममुग्ध लेखकों के सामने अनेक रचनात्मक चुनौतियों को लेकर पहली बार सामने आया। हिंदी उपन्यास का यह नया चेहरा था जिसने भविष्य की हिंदी कथा-यात्रा का रास्ता प्रशस्त करना था। पहली बार टिकड़मी निर्णायकों को ओवरटेक करके साहित्य अकादमी ने इसे सम्मान दिया और सालों बाद अपनी संस्था के प्रति भरोसा पैदा किया हालांकि लोलुप हिंदी लेखकों की जीभ की राल कभी थमी नहीं। बीच में एकाध वीरेन डंगवाल जैसे अपवाद जरूर उभरे लेकिन उस बदनसीब को भी अनंत दंश झेलने पड़े। संयोग से डंगू को जसम का सहारा मिल गया मगर वो भी कितने दिन तक जिन्दा रह सका। अपनी मौत ही मानो मर गया।
छियासी वर्षीय गोविन्द मिश्र हिंदी के समकालीन समाज के सामने अजूबे से कम नहीं हैं। निहायत माध्ययवर्गीय परिवार में जन्म लेने के बाद देश की शीर्षस्थ प्रशासनिक सेवा को सफलता से निभाने के बाद वो अपने समकालीन समय में भी एकदम तरोताज़ा और टटके बने हुए हैं। मानो उम्र बार-बार उन्हें छूकर भाग खड़ी होती है। शायद इसका राज यह है कि उनकी निगाह उम्र पर नहीं, हिंदी रचनाधार्मिता के शाश्वत प्रवाह पर है।
उनका एक क्लासिक उपन्यास है ‘हुजूर दरबार’, जो आजादी के बाद पनपते चले गए सामंती मूल्यों को एकदम चुपचाप बिना बड़बोले दावों के ऐसे ऊकेरता है कि हिंदी समाज अपनी दयनीय हालत को अपनी ही नजर से निहारकर एक बार फिर सन्न रह जाता है। यह उपन्यास नए भारत की उभरती चेतना का नए सिरे से किया गया आत्मविश्लेषण है।
‘धुंध में सुरखी’ उनके व्यापक यात्रा-अनुभवों का बेहद संवेदनशील विवरण है जो यद्यपि हिंदी साहित्य के पूर्व में लिखे गए यात्रा-वृतांतों का ही विस्तार है मगर अपनी निजी और आत्मीय छटा से पूरी तरह लैस और प्रासंगिक।
‘स्थितियाँ रेखांकित’ उनके द्वारा आजादी के बाद उभरी हिंदी कहानियों का आदर्श संकलन है जो इससे पहले सामने आए आग्रही संकलनों की पूर्वग्रही नजर को ध्वस्त करके एकदम स्वस्थ मूल्यांकन दृष्टि को सामने लाता है।
चेन्नई में आयोजित ‘इंडिया इंटरनेशनल फिल्म टूरिज्म कॉन्क्लेव में उत्तराखंड फिल्म नीति की हुई सराहना
तमिल फिल्म इंडस्ट्री ने दिखाई उत्तराखण्ड में फिल्मांकन...
चेन्नई में आयोजित ‘इंडिया इंटरनेशनल फिल्म टूरिज्म कॉन्क्लेव में उत्तराखंड फिल्म नीति की हुई सराहना
तमिल फिल्म इंडस्ट्री ने दिखाई उत्तराखण्ड में फिल्मांकन...
डिजिटल युग में उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और पॉप कल्चर पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ
https://www.facebook.com/janmanchaajkal?locale=hi_IN
हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिंदी एवं आधुनिक भारतीय...
Shaurya and Legacy of Karmaveer Jayanand Bharti Remembered on the 94th Anniversary of Pauri Kranti Diwas
By - Prem Pancholi
The Shail Shilpi Vikas Sangathan organized...
जनसमस्याओं के त्वरित एवं गुणवत्तापूर्ण निस्तारण के उद्देश्य से सोमवार को कलेक्ट्रेट परिसर स्थित ऋषिपर्णा सभागार में समाधान दिवस आयोजित किया गया। जिलाधिकारी डॉ....
गंगोत्री ग्लेशियर क्षेत्र में दिखाई देने वाली छोटी हिमनदीय झीलों से तत्काल बड़े खतरे की स्थिति नहीं-वाडिया
मीडिया में प्रसारित खबरों के संबंध में यूएसडीएमए...