उल्लेखनीय है कि उत्तराखण्ड में स्वाधीनता आन्दोलन जब चरम शिखर पर पहुंच रहा था उसी दौर में टिहरी रियासत की जनता भी राजशाही के जनविरोधी नीतियों के विरोध में आयोजित हो रही थी। राजशाही की दमनकारी नीतियों, जबरन थोपे गए टैक्स बेगार प्रथा और नई वन व्यवस्था में उपजी अडचनों के कारण टिहरी की जनता में भारी असंतोष पनप रहा था। टिहरी राजा के प्रमुख आन्दोलनकारियों में एक प्रमुख नाम श्रीदेव सुमन का भी था। चम्बा के निकट जौलगांव में 25 मई1916 को सुमन का जन्म हुआ था। मात्र चौदह साल की किशोरावस्था में सुमन के अन्दर देश-प्रेम का जज्बा पैदा हो गया था। सत्याग्रह में भाग लेने देहरादून गए और पकड़े जाने पर दो हफ्ते के कारावास की सजा मिली थी इसी साल श्रीदेव सुमन के राजनैतिक व्यक्तिव लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण रहा। तेईस जनवरी को वे देहरादून में टिहरी राज्य प्रजामण्डल के संयोजक चुने गए। इसी दौरान सुमन लुधियाना में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में चल रहे अधिवेशन में हिमालयी राज्यों की समस्याओं को उजागर कर इस दिशा में जागृति लाने का काम किया
19 अगस्त, 1942 को श्रीदेव सुमन को टिहरी में कार्यकर्ताओं की बैठक में गिरफ्तार कर देहरादून व आगरा की जेलों में रखा गया। एक साल बाद रिहाई होने पर सुमन का मन टिहरी रियासत की सामन्ती व्यवस्था से जनता को मुक्त करने के लिए आकुल हो उठा। टिहरी जाते वक्त नरेन्द्रनगर में पुलिस अधिकारी ने उनके सर से टोपी उतारकर डाली और धमकी दी और कहा कि आगे बढे तो गोली मार देंगे. बाद में तीस दिसम्बर उन्नीस सौ तितालीस मे उन्हें टिहरी जेल में ठूस दिया गया। उनके कपड़े उतार दिए गए। उन्हें भूखा-प्यासा रखकर डरा धमकाकर उनसे जबरन माफी मांगने का दबाव बनाया गया पर स्वाभिमानी सुमन ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। जेल अधिकारियों ने खिन्न होकर उन पर जमकर कोडे बरसाए और पावों में पैंतीस सेर की बेडियां डाल दी गई।
टिहरी रियासत की ओर से श्रीदेव सुमन पर उत्पीडन की कार्यवाही लगातार जारी थी। उन पर राजद्रोह का केस चलाया गया और दो साल की सजा सुनाई गई। सुमन ने जेल कर्मचारियों के व्यवहार के खिलाफ अनशन करना प्रारम्भ कर दिया। टिहरी रियासत की और उन्हें कठोर यातनाएं दी गई और जबरन अनशन तुडवाने के प्रयास किये पर स्वाभिमान दिल के सुमन ने हार न मानी। अन्ततः चौरासी दिनों के आमरण अनशन से सुमन की हालत बहुत खराब हो गई। अन्ततः जन्मभूमि के लिए अपनी शहादत देकर सदा के लिए अमर हो गए।
अमर शहीद श्रीदेव सुमन पर आधारित यह फिल्म 100 मिनट की है। फिल्म का निर्देशन श्री के०पी० घिल्डियाल ने किया है और मुख्य सहायक निर्देशक श्री प्रेम कावडकर है। कैमरामैन मुम्बई के श्री हरि राम है। इस फिल्म में 8 हिन्दी गाने है। संगीत निर्देशक श्री चन्द्रेश्वर धस्माना ने किया है। फिल्म में 5 गीत स्वयं अमर शहीद श्रीदेव सुमन के हैं और 2 गीत के पी ढोढियाल और गीत मुनिराम सकलानी ने लिखे है। इन गीतों बरसायन सचिन भट्ट और संध्या मुकर्जी और वीरेन्द्र नेगी ने किया है। फिल्म का कथासार डॉ. एम. आर. सकलानी और केपी. ढोडियाल ने लिखा है और पटकथा संवाद करुणेश ठाकुर ने लिखा है।
इस फिल्म में देहरादून मूल की सुप्रसिद्ध अभिनेत्री हिमानी शिवपुरी ने श्रीदेव सुमन जी की माता की भूमिका अदा की है। श्रीश डोभाल ने इस फिल्म में मुख्य अभिनेता के तौर पर श्रीदेव सुमन की भूमिका अदा की है। बाल्यकाल के सुमन की भूमिका श्री दीपक रावत ने अदा की है। सुमन जी के पिता का अभिनय श्री पी. एस. बिष्ट ने किया है। सुमन जी की पत्नी का अभिनय चारु बाधवा ने किया है। इसके अलावा टिहरी महाराजा की भूमिका पीआर कश्यप तथा दरोगा मोर सिंह की भूमिका श्री राजेश गौड, मोर सिंह के चपरासी की भूमिका श्री के. पी. श्रीराम प्रसाद डोभाल ने अदा की है। सूत्रधार के रूप में दो एम आर सकलानी की अपनी खास भूमिका है। इस फिल्म की शूटिंग जौल, चम्बा टिहरी बादशाही थोल, नई टिहरी ,टिहरी नागणी नरेन्द्रनगर मुनिकीरेती ऋषिकश हरिद्वार, देहरादून और मसूरी में की गई है
फिल्म प्रदर्शन के बाद इस फिल्म में श्रीदेव सुमन की भूमिका में मुख्य अभिनय कर चुके सुपरिचित रंगकर्मी श्रीश डोभाल ने इस फिल्म के महत्त्वपूर्ण तथ्यों और विविध घटनाक्रमों पर प्रकाश डाला। प्रारम्भ में दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के चंद्रशेखर तिवारी ने स्वागत व निकोलस हॉफलैण्ड ने आभार व्यक्त किया।
सभागार में उपस्थित कई दर्शकों ने इस फिल्म से जुड़े अनेक सवाल जबाब भी किये। इस अवसर पर सभागार में कई फिल्म प्रेमी रंगकर्मी बुद्धिजीवी, व साहित्य प्रेमी,रंगकर्मी, पुस्तकालय सदस्य और साहित्यकार व युवा पाठक और डॉ.सुरेखा डंगवाल, कुलपति,पद्मश्री डॉ. बी.के.संजय,अतुल शर्मा,सत्यानन्द बडोनी, ब्रिगेडियर के जी बहल, सुंदर बिष्ट, मदन डुकलांन,दीपक रावत उपस्थित रहे।
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संपर्क – दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र लैंसडाउन चौक देहरादून, मोबा. 9410919938







