विजय सुंदरियाल के साथ हम लोगों का परिचय हालांकि पुराना था, लेकिन शायद वर्ष 2004-05 से ज्यादा नजदीकियां हुई। हम उन्हें एक फक्कड़, मनमौजी और बहुत ही मिलनसार व्यक्ति के रूप में जानते हैं। विजय सुंदरियाल ने 1998 के आसपास अपना स्थानीय उत्पादों पर आधारित जैविक उत्पाद का छोटा सा व्यवसाय शुरू किया। उस समय डुंगरी जैसी छोटी जगह में इस तरह की पहल को एक जोखिम ही माना जाता था। लोगों के लिए बुरांश का जूस और जैम-जैली जैसी चीजें नई थी। व्यवसाय की दृष्टि से तो किसी ने सोचा भी नहीं था। उनकी यह पहल रंग लाई। शुरुआत में भले ही उन्हें इसका बहुत बड़ा आर्थिक लाभ न हुआ हो, लेकिन उसने एक दूरगामी सफलता का रास्ता तो बना ही दिया था। तमाम नकारात्मक माहौल के बावजूद विजय सुंदरियाल ने अपना उद्योग लगाने का जोखिम उठाया जो अब एक अच्छे उद्योग के रूप में लोगों का सुपरिचित नाम हो गया है।
विजय सुंदरियाल के सुपुत्र मनीष ने अपने पिता के रोपे पौंधे को अब एक वृक्ष का रूप दे दिया है। मनीष ने ‘सुंदरियाल प्रोडक्शंस’ को नई ऊंचाइयां दी हैं। उन्होंने अचार, जैम, जैली, जूस के अलावा सीजनल दालें और स्थानीय उत्पादों को अपने ब्रांड में शामिल किया है। विजय सुंदरियाल की प्रेरणा से मनीष ने भी अपने गांव में रहकर ही अपने काम को आगे बढ़ाकर स्वरोजगार को प्रोत्साहित करने का काम किया है। मनीष एक सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। उत्तराखंड के हर आंदोलन और प्रतिकार की आवाज में शामिल रहते हैं। फिलहाल वह कांग्रेस के कार्यकर्ता के रूप में राजनीतिक क्षेत्र में हैं।