Friday, March 6, 2026
Home entertainment डूब चुकी टिहरी, की दिवाली के अनुभव साझा कर रहे है वरिष्ठ...

डूब चुकी टिहरी, की दिवाली के अनुभव साझा कर रहे है वरिष्ठ साहित्यकार राकेश थपलियाल

टिहरी की दिवाली :

By – Rakesh thapliya

दिवाली क्या आती थी कि, उसके स्वागत में पूरे घर में अच्छी खासी परेड शुरू हो जाती थी . कुडों और भुमडों ( कच्चे –मकान ) की लिपाई –पुताई के लिए एक –दो कट्टा लाल मिट्टी का आर्डर दे दिया जाता था , मिट्टी कोई अमेजाँन या फ्लिपकार्ट लाकर नहीं देते थे बल्कि इसके लिए बाकायदा सुंदरु ( निक नेम = पारु की बई ) या गौरा से रिक्वेस्ट करनी पड़ती थी ।

शहर में सोने ,चांदी या तांबे की खान तो नहीं थी पर रानीबाग़ के ऊपर एक मटखांण जरूर थी । चूना श्रीमान लाला बल्लामल लक्ष्मी चंद जैन की दुकान में मिल जाता था । बल्लामल शुरू में परचून के व्यापारी थे, बाद में उनके पुत्र प्रेमचंद और लक्ष्मी चंद ने बर्तन, हार्डवेयर, लोहा, पेंट, सरिया और बाद में सोने का धंधा भी शुरू किया था और चूना उनका साईड-बिजनेस था । उनके पिता, बड़े लालाजी बल्लामलजी एक बार मरने के बाद दुबारा जिंदा हो गए थे । बाकी पीली मिट्टी या गेरू आदि लाला मूलचंद भी रखा करते थे ।

ये सामान मेन दुकान से नहीं बल्कि सामने के गोदाम में रखा और बेचा जाता था । चूना लगाने के लिए बाबले की कूची / ब्वाने इस्तेमाल किए जाते थे । इन्हें एक रात पहले भिगोना पड़ता था और फिर पत्थर से थोड़ा कूटना भी पड़ता था । लकड़ी की सीढ़ी कहीं पास-पड़ोस से मांगकर लानी पड़ती थी या फिर किसी उंची मेज का का प्रयोग भी किया जाता था ।

चूने में चमक लाने के लिए नील मिलाना पड़ता था । इतना खटराग करने के बाद फिर गृहस्वामी पुराना कच्छा बनियान पहनकर पुताई -रंगाई करने के लिए रेडी हो जाते थे । चूने से हाथों को फटने से बचाने के लिए ,पहले उन पर तेल मला जाता था और आँखों की हिफाजत के लिए ( अगर नजर का चश्मा नहीं लगा है ) धूप का चश्मा भी पहना जाता था ।

मातृशक्ति के जिम्मे मिट्टी के चूल्हे की गोबर व मिट्टी के मिश्रण से लीपने के अलावा रसोई की अंदरुनी दीवारों की लिपाई-पुताई का कार्य भी होता था । घर की घायल दीवारों के घावों की दरारों को भी गोबर + मिट्टी + पत्थरों से भरा जाता था . मरम्मत के इस पुनीत कार्य को स्थानीय भाषा में टांका –टल्ला ( कामचलाऊ व्यवस्था ) लगाने की संज्ञा दी जाती थी ।

रसोईघर की दीवारों पर पिसे बारीक चावलों से छापे / अल्पना ( डिजाईन ) और स्वस्तिक का निशान बनाया जाता था और शुभ लाभ भी लिखा जाता था । रसोई और पूजाघर में कई लोग लक्ष्मीजी के पैरों के छापे भी बनाते थे । घर में धन-धान्य की बरकत रहे बस लक्ष्मी माँ की इतनी ही कृपा काफी मानी जाती थी ।

कुछ लोग दिवाली पर जुआ खेलना एक शगुन मानते थे तो कुछ हार्डकोर जुआरी भी होते थे ? नाक की नथुली / नथ और खाने की थाली / थकुली दाँव पर लगा देनेवाले कई महाभाग तो युधिष्टर के भी बाप होते थे ।

हमारे बचपन में शहर के अधिकांश घर कच्चे व मिट्टी-पत्थर के होते थे और छत पठाल ( पहाड़ी स्लेट पत्थर ) की होती थी, बड़े-बड़े घरों की छतें टीन की होती थी और दीवारों के पत्थरों की चिनाई, मिट्टी के स्थान पर चूने से की जाती थी, अधिक मजबूती के लिए चूने में उरद की दाल की पिट्ठी भी मिलाई जाती थी । इन बड़े घरों को हम हिंदी में कोठी न कहकर, स्थानीय भाषा में कोठा कहते थे और हिंदी में इस शब्द का मतलब पायल की झंकार + तबले की थाप + सुर-संगम से जोड़ा जाता है ।

कुल मिलाकर दिवाली की साफ़-सफाई में दम या कचूमर निकल जाता था । कुछ बड़े और रसूखदार लोगों को छोड़कर बाकि प्रत्येक सामान्य घर की लगभग यही कहानी होती थी । गांवों में भी दीपावली का स्वागत इसी तरीके अर्थात लिपाई -पुताई से ही होता था । सुदूर सरहदों पर तैनात फौजी छुट्टी में घर गाँव आने लगे तो समझलो बस कि, दिवाली उर्फ़ बग्वाळ का मौसम शुरू हो गया है ।

पहाड़ के छोटे-छोटे कस्बों में जहाँ अकबर ,तस्लीम ,सलीम और सुलेमान भी रहते थे ,वहां स्थानीय पटाखे जैसे चकाचुंदरी और फुलझड़ी आदि बनाने और बेचने का काम यही लोग करते थे । ये आसपास के गांवों में भी पटाखे बेचने जाते थे और पटाखों के बदले साट्टी ( धान ) और उरद की नई फसल की दाल लेकर आते थे ।

बाद में पंजाबी ( आजादी के बाद आए ) और जैन, अग्रवाल लाबी भी इस धंदे में शामिल हो गए । टेहरी के लाला लोग राजा के ज़माने में सहारनपुर के आसपास से आकर बसे थे । मुसलमानों का बारूद और बंदूकों के कारोबार पर आधिपत्य था तो लाला लोग सोने ,चांदी, कपड़े और राशन ,परचून के कारोबारी थे।

और जब पाकिस्तान से बसे पंजाबी पहाड़ में आए तो ये हर प्रकार के छोटे-मोटे व्यवसाय में घुस गए और फिर देखते- देखते ही ,करोड़पति बन गए । पहाड़ी लोग शुरू में व्यापार करना अपनी शान के खिलाफ समझते थे । ये खेती या फिर राजा की सेना या राज्य के किसी अन्य महकमे जैसे —कोर्ट –कचहरी, पुलिस, राजस्व विभाग या जंगलात आदि की नौकरी को गुजर-बसर का साधन मानते थे । बामण हो या राजपूत ,खेती-पाती दोनों ही वर्ण के लोग करते थे और ब्राह्मण इसके साथ-साथ, पुरोहिताई भी करते थे ।

इस प्रकार पहाड़ में भी उनमे बामण और यजमान का वो रिश्ता कायम हुआ जो देश के अन्य भागों में भी युगों –सदियों से चला आ रहा था पर पहाड़ों और मैदानों में एक अंतर था , पहाड़ में ब्राह्मण अन्य लोगों के साथ मिलकर खेती भी करते थे ।

शुभ कार्य हो या अशुभ दोनों कार्यों में एक ही ब्राह्मण शरीक होता था । तीसरा ये दोनों जातियां एक दूसरे को अपने खुद के नाते-रिश्तों की तरह चाचा या काका ,बड़ा ( ताऊ ), मामा, पुफू ( बुआ ) कहकर संबोधित करते थे

कई जगह तो चौथे वर्ण के लोगों को भी ऐसे ही संबोधित करने का रिवाज / परंपरा थी । तीसरे वर्ण के अधिकतर लोग भूमिहीन होते थे, वे शिल्प और पेशों से जुड़े होते थे और भवन निर्माण और वाद्य यंत्र बजाना से लेकर खेती के औजार ,तांबे के बर्तन और चप्पल-जूते बनाना , कपड़े सिलना, नाव चलाना , रस्से बटना ,नदी पार करवाना ( झूले / पिंजड़े की सहायता से ) आदि अनेक कार्य इनके जिम्मे थे ।

मेरे शहर का इतिहास था ही कितना ? वह सन 1815 के आसपास ही तो बसा था और 200 साल की उम्र भी पूरी न कर सका और सन 2005 में जलमग्न भी हो गया । इसके उजड़ने की शुरुआत तो सन 84-85 में ही शुरू हो चुकी थी । इसको त्रिहरी और टेहरी का नाम भी कवि गुमानी पंत ने दिया था । 1815 के पहले क्या था ? ये ,धुनारों की एक छोटी सी बस्ती थी। पानी के अंदर दीवाली की हार्दिक बधाई, हमारी जलमग्न टिहरी शत शत-शत नमन अर भावभीनी श्रध्दांजलि अर्पित छ ।

इससे पहले ये बावन –गढ़ों के इतिहास में दर्ज था ? ये तो सांदणा के शूरवीर रावत भाई ही बता सकते हैं कि, जब द्वापर युग में श्रीकृष्ण भगवान गंगू की रमोली में आए थे तो तब रैका –रमोली,सेम –मुखेम कैसे थे ? तब तो राजा कनकपाल – अजयपाल वगेरा भी नहीं थे और उससे पहले जब सुना है कि त्रेतायुग में भगवान राम –लखन दोनों भाई देवप्रयाग आए थे और वहां के संगम में नहाए थे ,तब वो बस्ती कैसी थी ? और यदि देवप्रयाग में गंगा –अलखनंदा का संगम था तो फिर राजा भागीरथ कौन से युग और सन में आए थे ,सतयुग में क्या ? बात अगर टेहरी और टेहरी जिले की है तो फिर टिर्याल उसे दूर तक ले ही जाएंगे ? पटाखे भले ही बाद में बने हों पर रामजी के आने के बाद पहाड़ के गाँव में लोगों ने भैले तो तब भी खेले होंगे ? माना चीड़ों के जंगल तब नहीं थे तो देवदार, राई –मोरा ,बांज –बुरांस ,खड़की, भिम्मल ,डैंकण में से कोई तो रहे होंगे ? उत्तरकाशी और रवाईं परगना तो शायद सन 1952 तक टेहरी का ही हिस्सा था . उत्तरकाशी का पुराना नाम बाड़ाहाट हमने भी पुराने लोगों के मुंह से कई बार सुना और किताबों में कहीं -कहीं शायद बाड़ाहोती के नाम से भी दर्ज है ? पता नहीं आज ही ये सब क्यों याद आ रहा है और वो भी टेहरी की दिवाळी के बहाने ?

मैं मन से अनुरोध करता हूँ कि, प्लीज एक बार यादों के झरोखे से टेहरी की एक पुरानी लेकिन बाद की झलक दिखलाओ न सन 1987-88 की चाहो तो कुछ + – कर लेना . आज फिर दिवाली है धनतेरस है ? तो क्या था शहर का नजारा ? क्या कहा —बर्तनों, मिठाईयों और पटाखों की दुकानें सजी हैं ? सुमन चौक में पटाखे कौन बेच रहा है ? क्या कहा लाला पंकज अगरवाल और गुप्ता ? और भाई नत्थु सुनार की दुकान के क्या हाल हैं ? जहाँ मै और बिल्लू ( सतीश घई ) सिगरेट पिया करते थे ? क्या कहा —-वहां कुछ औरतें पाजेब और बिछिया ले रही हैं ? बाकी सुमन –चौक सब सूना है ? चलो जरा मोड़ से थोड़ा बाजार की तरफ तो सरको बैंकर्स एंड सर्राफ लाला विनय की दुकान की तरफ ? क्या कहा ,वहां बड़ी भीड़ है , कुछ लोग बाहर ही खड़े हैं —- पाजेब ,अंगूठियाँ, चांदी के सिक्के, सोने के हार ,कुछ काउंटर पर सजे हैं और कुछ गद्दी पर पसरे हैं ,कुछ लाल –भूरे –नीले डब्बों में बंद हैं तो कुछ बिखरे हैं और लाला क्या कह रहा है ? हाँ जी जल्दी बताओ ,क्या करूँ ,बस अब जादा देर न करो, आज त्यौहार का दिन है ,नहीं तो ऐसा करो आप कल –परसों आ जाओ इतमिनान से, फुरसत से ,ठीक है ? अरे भीम सिंह ,जरा तुम ऐसा करो जरा रज्जाक मियांजी के घर चले जाओ और पूछो कि वो तिमणयाँ और पौंछी हुई की नहीं और आते हुए रामनाथ की दुकान से इनकी पाजेब भी ले आना और जरा जल्दी आना ? लाला विनय और उसके पुरखे ही शहर में सोने के अधिकृत व्यापारी थे बाकी सब नंबर दो में ( का नहीं ) सोना बेचते थे .

बगल में कोई-कोई बाटा के जूते भी देखरहा था तो ठीक सामने दीवानजी उर्फ़ लाला दिवान चंद भी पटाखे –फुलझड़ी लगाकर बैठे थे . मेरे और ऋषिराम के मित्र सुदामा के पिताजी की मिठाई की दुकान में पता नहीं आज चंद्रकला और लौंगलता नाम की मिठाई बनी थी या नहीं ? बगल में तोंण ( तुन ) के पेड़ के नीचे पटाखों की दो तीन परंपरागत सबसे प्राचीन दुकानें सजी थी तो उनके बाजू से मुस्लिम मोहल्ले की ओर मुड़ने वाली सड़क के मुहाने पर चचा पदम सिंह हलवाई की दूकान में जिसका संचालन अब जोध सिंहजी और कुशाला भाई करते थे . समय बदल गया लेकिन दुकान आज भी पुराने लोगों के बीच पुराने नाम से ही जानी जाती थी . उनकी दुकान आज अपनी निर्धारित सीमा का उलंघन करके बाहर सड़क तक आ गई थी और अब 2-3 दिन यहीं रहेगी . बगल में कढाई पर गरम –गरम इमरतियाँ तली जा रही थी. इमरतियाँ की खुशबू हवाओं में घुलकर लोगों का मन ललचा रही थी पर कई लोग सोचते थे कि, लेंगे तो नेगीजी की दुकान से नहीं तो — की दुकान से ही लेंगे ? मुख्य बाजार के इस मोड़ पर मुकेश उर्फ़ फिलिप्स –रेडियोज की दुकान के सामने ,विरुद्ध दिशा में सजी सुभाष जैन के स्टील के बर्तनों की चमक से आँखे चुंधिया रही थी, दिन ढलने पर आ गया ,समय की सुईयां 3-4 बजे तक आ पहुंची थी और थोड़ी ही देर में रंग-बिरंगी बिजली की लड़ियाँ, बल्ब जलनेवाले थे और तब फिर उन रंगीन रोशनियों से दिवाली जगमगानेवाली थी , बाजार की चमक और रौनक बढ़नेवाली थी. धरती पर नूर उतर आनेवाला था ?

फिर तो आगे बस अड्डे तक चचा जुग्गी ,सरदार मेहर सिंह तो नीचे पोस्ट आफिस के सामने जखमोला बंधुओं आदि की बर्तन की दुकानें थी तो रियाज, सलीम भाई से लेकर, मनोहरलाल –भगत राम , भाई हरिओम ओमी से लेकर नीचे प्रेम-गुलशन, अख्तर ,अमरीक आदि सब पटाखे बेचते थे. प्रदीप के आँचल स्वीट शॉप और कृष्णा होटल से लेकर कृष्णा कैंटीन तक लोग टिक्की –समोसे ,रसगुल्ले –रसमलाई आदि बैठकर खाते भी थे और मिठाई घर भी ले जाते तो सतीश की मिठाई की दुकान और होटल भी अच्छा चलता था .जब तक बस अड्डे में दारू की दुकान थी तो बसें बंद हो जाने के बाद भी अच्छी रौनक रहती थी ? धनतेरस पर मैदानी भाग के लोगों में रसोई के बर्तन खरीदने का भी रिवाज था फिर चाहे एक चम्मच ही क्यों न लो ?

दिवाली हो और खील –बताशे ,दिए और मोमबत्तियों की बात न हो ,ये कैसे संभव है ? खील बताशे भले ही कई लोग बेचते थे पर रणजीत भाई और पूरण के पिता चौधरी साहब की दुकान की बात ही कुछ और थी ? यह शहर की चने ,मूंगफली ,पोहे, लाइची दाना ,कुरमुरे की प्रसिद्ध दूकान थी . सर्दियों में उनकी मूंगफली का कोई तोड़ नहीं होता था ?

दिवाली को खाने –पीने का त्योहार भी माना जाता है तो सब्जीवालों की दुकानों पर भी खूब रौनक रहती थी फूलगोभी ,मटर, मशरूम, पनीर ,अंडे पैसेवाले खूब खरीदते थे तो अपन पहाड़ी लोगों का मीट –मटन पर बड़ा जोर रहता था . ज्ञानी –मकबूल को भी फुरसत नहीं रहती थी ? वो पूछते थे क्या बनाऊँ —- कलेजी ,गुर्दा ,चांप या रान दे दूँ ? और फिर शुरू हो जाती थी ख़ट –ख़ट. त्यौहार के दिनों में नंबर नहीं आता था . अड्डे पर भूणी या भुनचकरा भी बिकता था. ये दारु के साथ ठुंगार का भी बढ़िया काम करता था ?

आसपास के गांव के लोग भी दिवाली की खरीददारी के लिए टेहरी ही आते थे . राजा और उसके कुछ चेले चांटे डोभाल –डंगवाल आदि अपनी बग्वाल आज एक दिन पहले मनाते थे जो राज – बग्वाल के नाम से जानी जाती थी ? तो बाकी आज के दिन का नजारा क्या होता था गली –कूचे , मोहल्लों में . माँ कई जगह कल ही दाल भिगो देती थी, सुबह वह छिलके अलग करके खूब फिणाई / मसली जाती थीऔर फिर सिल –बट्टे पर पीसकर, नमक और मसाले मिलाकर थोड़ा फर्मेंट होने के लिए रखदी जाती थी और फिर शाम को, पत्तों पर उसकी गोल लोई को फैलाकर, हाथ से छोटी पूरी जैसा बनाया जाता था , बीच में एक छेद किया जाता था और फिर उनके माथे पर काले तिलों का तिलक लगाकर भूरे और करारे होने तक तला जाता था .फिर उसका एक टुकड़ा अग्नि को समर्पित कर दो पकोड़े चूल्हे के पिछले भाग में रख दिए जाते थे और 2-4 पकड़ों का भगवान को भोग / नैवेद्य चढ़ाया या लगाया जाता था और लो अब खाओ जी भरकर पकोड़े ? गाँव के लोग तो एक कटोरी में घी लेकर ,उसमें इनको डुबोकर तब बड़े चाव से खाते थे ? कुछ शौक़ीन लोग उरद के अलावा सुंटे ( लोबिया ) के पकोड़े भी बनाते थे . दो –चार पकोड़े पास –पड़ोस में पैंणे के रूप में दिए जाते थे और जिन घरों की उस साल दिवाली नहीं होती थी, वहां जरूर दिए जाते थे .गावों में तो इस अवसर पर पूरी और स्वांले भी पकाए जाते थे ? फिर लोग खा –पीकर खुले खेतों में भैले खेलने जाते थे ? इन्हें बनाने के लिए चीड़ की तेलवाली लकड़ी / गिरी का प्रयोग किया जाता था ? उन्हें पेंसिल के आकर में काटकर फिर उनका एक छोटा गट्ठर बनाकर , उसे किसी जंगली बेल/ लता ( हो सके तो हरी ) से बांधकर तब रात में जलाकर अपने बदन के चारों ओर, भीम की गदा की तरह घुमाया जाता था . यह काम हर किसी के बस का नहीं और थोड़ा रिस्की भी होता था ? थोड़ी सी चूक या असावधानी से जलता भैला अपने बदन पर भी लिपट सकता था . भैला खेलने के बड़े –बड़े एक्सपर्ट भी होते थे और उसके बाद फिर किसी के आँगन ( गुठ्यार ), खल्याँण या खेत में मंडाण लगता था और ये कार्यक्रम रात 2-3-4 बजे तक और हफ्ते भर चलता था . टेहरी गहराई में होने के कारण टिपरी या कुटठा में थोड़े बहुत भैले दिख जाते थे पर उपर बसे गांव आर-पार के अद्भुत नज़ारे देखकर खुश हो जाते थे . बाजार से लाई, फुलझड़ी या चकाचुंदरी और चकरी घर के आँगन में परात में जलाकर उसका आनंद लिया जाता था पर बेवफा हवाई आसपास के किसी झंगरेटे या पराळ के, पेड़ पर लगाए / बनाए पुरेल्डों ( घास के गट्ठर ) में आग लगा देती थी ?

शहर /कस्बों में भी खूब पटाखे फोड़े जाते थे . कई बार इस चक्कर में बच्चों के हाथ जल जाते थे तो कभी कपड़े आग पकड़ लेते थे और फिर रंग में भंग और बरनॉल की खोज शुरू ? कई उटबद्री लोग टीन के डिब्बे में कंटरफोड़ बम फोड़ने के चक्कर में चोट खा बैठते थे तो कुछ उसे हाथ में पकड़कर, जलाकर फेंकने के चक्कर में मात खा जाते थे . शहर में भी हवाई कब किसके घर में घुस जाए ,उसका कोई भरोसा नहीं था ? सीटी भी ऐसा ही करती थी पर उससे आग लगने का खतरा कम रहता था ?

हमारे मोहल्ले के मुस्लिम बच्चे ,उनकी खुद की पटाके की दुकानें होने के कारण ,उनके घर के आगे खूब पटाके जलाते थे और उनको देखकर खुश होते थे . उनके बड़े बुजुर्ग और हम भी एक दूसरे को उनके त्योहारों पर बधाई और शुभकामनाएं देते थे . उस समय का माहौल और जमाना इतना ख़राब नहीं था ?

शुरू में भाईदूज तक और फिर तुलसी –विवाह या एकास –बग्वाल के दिन भी दिवाली मनाई जाती थी ? रिख –बग्वाल भी एक नाम सुना था पहाड़ में ? बलिराज / बल्दराज, हनुमान मंदिर का अन्नकूट या गोवर्धन पर्वत और न जाने और कितनी यादें—चित्त-फिट्ट और कई घरों में खेली गई रमी आदि से जुड़े किस्से- कहानी कई दिनों तक शहर में गूंजती रहती थी, पाककला विशेषज्ञ पकोड़ों में कमियां निकालते रहते थे तो कहीं जुए की बाकी रकम को लेकर बाद तक लड़ाई चलती रहती थी ? कुछ सरकारी या निजी सेवक लोग अपनी साल भर की सेवाओं के बदले दिवाली की मिठाई मांगना अपना हक़ समझते थे ? दूकानदार दिवाली के बचे हुए पटाखे, शादी –विवाह के सीजन में बेचते थे कई बार हम शहर में रहकर पढने या नौकरी करनेवाले मित्रों को कहते थे कि, दिवाली में गाँव या घर जाकर क्या करोगे, यहीं रहो, मजा करो ,शहर की दिवाली का आनंद लो पर कौन सुनता था ? अब खुद महसूस करके अपने उस सवाल का जबाब लगता है,मिल गया है ? टेहरी न डूबी होती तो वहीँ दिवाली मनानी थी ? पलायन न होता तो आज भी गांव में रौनकें होती ? मुझे इस संदर्भ में भगवान राम का वो कथन याद आया जो उन्होंने लक्षमन से उसके सवाल के ज़बाब में कहा था , “ भले ही भुला लंका सोने की है पर, इसमें वो बात कहाँ – मुझे तो अयोध्या ही प्यारी है ?

आप सबको दीपावली 2025 के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामना

RELATED ARTICLES

विकास के नए आयाम स्थापित करती ग्राम पंचायत भगवन्तपुर की ग्राम प्रधान

विकास के नए आयाम स्थापित करती ग्राम पंचायत भगवन्तपुर की ग्राम प्रधान   By - Harishankar saini   कभी गड्ढों, कीचड़ और टूटे किनारों से जूझती सलान गाँव...

जनगणना की पूरी तैयारी, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर होगी जनगणना

जनगणना-2027 की डिजिटल तैयारियां शुरू, देहरादून में 25-27 फरवरी तक विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू चार्ज अधिकारियों से लेकर सेन्सस क्लर्क तक, सभी ले रहे डिजिटल...

गलगोटिया कांड : जहां कुंए में पहले से ही भाँग डाल दी गई हो?.

- गलगोटिया को क्यों गरिया रहे हो? …उसकी क्या गलती है - वो बेचारे तो डंका बजा रहे थे।   By - Prabhat Dabral  सवाल ये नहीं...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -

Latest Post

धराली आपदा : वैज्ञानिकों ने किया खुलासा, एक बड़े ग्लेशियर के टुकड़े के टूटने से हुई तबाही।

न बादल फटा, न ग्लेशियल झील… वैज्ञानिक अध्ययन में खुलासा: श्रीकांता ग्लेशियर से बर्फ का बड़ा हिस्सा गिरने से हुआ था धराली हादसा। ....................... 5 अगस्त...

2017 तक स्टार्टअप की संख्या थी शून्य। वर्ष 2025 में बढ़कर हुई 1750

- 2024-25 में राज्य का सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) ₹ 3,81,889 करोड़ का रहा - 2021-22 के मुकाबले जीएसडीपी में आया डेढ़ गुना से ज्यादा...

एक साधारण व्यक्ति में असाधारण व्यक्तित्व की जीवन्त जीवन जीने की शब्द-यात्रा है – BARLOWGANJ AND BEYOND

- साधारण व्यक्ति का असाधारण व्यक्तित्व : प्रो. बी. के. जोशी। - प्रो. बी. के. जोशी जी के जीवनीय आत्म-संस्मरणों पर केन्द्रित पुस्तक 'BARLOWGANJ...

विकास के नए आयाम स्थापित करती ग्राम पंचायत भगवन्तपुर की ग्राम प्रधान

विकास के नए आयाम स्थापित करती ग्राम पंचायत भगवन्तपुर की ग्राम प्रधान   By - Harishankar saini   कभी गड्ढों, कीचड़ और टूटे किनारों से जूझती सलान गाँव...

होली विशेषांक : खोलो किवाड़ चलो मठ भीतर।

- खोलो किवाड़ चलो मठ भीतर। - दून पुस्तकालय में संगीताजंलि की शानदार होली प्रस्तुति दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के एम्फीथियेटर में आज संगीतांजली शास्त्रीय...

बर्लोगंज एंड बियोंड पुस्तक का लोकार्पण

पुस्तक : बर्लोगंज एंड बियोंड   By - Dr. Yogesh dhasmana   देश के प्रसिद्ध शिक्षाविद प्रो बी के जोशी के संस्मरणों पर आधारित पुस्तक बर्लोगंज एंड बियोंड...

विज्ञान दिवस उत्साहपूर्वक मनाया गया राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय चन्देली में।

विज्ञान दिवस उत्साहपूर्वक मनाया गया राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय चन्देली में। By - Neeraj Uttarakhandi पुरोला विकासखंड के अंतर्गत राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय चन्देली में राष्ट्रीय...

स्पैक्स संस्था ने होली के प्राकृतिक रंगों पर दून पुस्तकालय में बच्चों को दी जानकारी।

स्पैक्स संस्था ने होली के प्राकृतिक रंगों पर दून पुस्तकालय में बच्चों को दी जानकारी। .......... दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में ‘स्पेक्स’ संस्था के सहयोग...

जनगणना की पूरी तैयारी, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर होगी जनगणना

जनगणना-2027 की डिजिटल तैयारियां शुरू, देहरादून में 25-27 फरवरी तक विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू चार्ज अधिकारियों से लेकर सेन्सस क्लर्क तक, सभी ले रहे डिजिटल...

एक स्वस्थ परंपरा है स्कूल ऑफ थॉट्स – प्रो० पंवार

स्कूल ऑफ थॉट्स, श्रीनगर (गढ़वाल), भारतीय-हिमालयी ज्ञान परंपरा,  मुख्य वक्ता- प्रो. मोहन पंवार। भारतीय : हिमालय ज्ञान परंपरा पर अपनी बात शुरू करते हुए मुख्य...