भावविह्वल कर गई “तिलोगा अमरदेव” की प्रेम कहानी

तिलोगा अमरदेव नाटक की प्रस्तुति ने यह जता दिया कि दुनिया की प्रेम कहानियों में उनकी प्रेम कहानी भी किसी से कम नहीं है। यह भी आगाह किया कि एक युवती अपने पसंद का वर चुनने के लिए न तब और न अब स्वतंत्र रही है। देहरादून के नगर निगम प्रेक्षागृह में प्रख्यात रंगकर्मी एस पी ममगाईं द्वारा निर्देशित “तिलोगा अमरदेव” नाटक ने पूर्व के नाटकों से अलग पहचान बनाई है। खचाखच भरे प्रेक्षागृह में दर्शक टस से मस नहीं हो पाए।
दरअसल वैसी भी देहरादून नाटकों की उर्वरा धरती रही है, आज भी है। पिछले 10 सालों में देहरादून मे कई नाटक खेले गए है। इस दौरान जो नाटक मेघदूत नाट्य संस्था ने एस पी ममगाईं के निर्देशन में प्रस्तुत किया है वह अन्य नाटकों में से भिन्न था। भिन्न इस मायने में कि पहाड़ की पृष्ठ भूमि और सत्य घटना पर आधारित यह नाटक दर्शकों को झकझोरने में सफल रहा है। प्रेम की जीती जागती तस्वीर इस नाटक ने मंचित कर दर्शकों को बखूबी दिखाई गई है।

बता दें कि दुनियांभर की प्रेम कथाओं में से एक “तिलोग अमरदेव” की प्रेम कहानी भी कम नहीं है। तिलोग के प्रेम को पाने के लिए सावन में उफनती गंगा नदी को पार कर वह उस पार के गांव में पहुंच जाता है। इसकी जिजीविषा, हिम्मत और कठोर निर्णय ने एक बारगी तिलोगा और उसके आस पास के सभी को चिंता में डाल दिया था। यह कटु सत्य है कि गंगा नदी सावन के माह में अपने भरी उफान पर होती है, जिसे पार करना किसी खतरे से कम नहीं था। सो इस दृश्य ने नाटक की करुणामयी भावव्यकती प्रस्तुत की है, जो तत्काल की सच्ची परिस्थिति थी। इस तरह का इन दोनों का निश्छल प्रेम हर किसी को अखरने लगा। अंततः तिलोगा और अमरदेव को प्रेम की बलवेदी पर चढ़ाना पड़ा। कहानी इतनी खतरनाक है कि अमरदेव की हत्या की गई और तिलोगा को अमरदेव के साथ में स्वयं आत्महत्या करनी पड़ी।
उल्लेखनीय यह है कि इस नाटक का हर पात्र कहानी का भावनात्मक हिस्सा बना हुआ रहा। नाटक के अंत तक कथानक हर एक दर्शक को बांधने में सफल रहा है। निर्देशकीय शिल्पकला ने नाटक में महीन से महीन स्पॉट भरने का जो शिल्प बुना है वह हर रंगकर्मी के लिए अकल्पनीय है।

नाटक के संवाद, भावभंगिमा आदि एक तरफ लोगो को आध्यात्म की ओर ले जा रहे थे और दूसरी तरफ तत्काल की सामाजिक व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े कर रहे थे। इस नाटक के संवाद में गढ़वाली शब्दों को बहुत ही सलीके ढंग प्रस्तुत किया गया है, जिस कारण नाटक को समझने में किसी को भी समस्या नहीं आई है। हालांकि नाटक गढ़वाली पृष्ठभूमि का रहा हो, मगर शब्द और पटकथा ने नाटक के मंचन को अंतराष्ट्रीय बना दिया है। दुनियां की सबसे चर्चित प्रेम कहानी रोमियो जूलियट से यदि तिलोगा अमरदेव की कहानी की तुलना की जाए तो कहीं से भी कमतर नहीं कही जाएगी। नाटक में राजा और राजाओं द्वारा निश्चित किए गए गढ़पतियों की स्थिति को जहां अभिनय और संवादों से बताने का प्रयास किया गया है वहीं तिलोगा और अमरदेव की प्रेम कथा को बहुत ही भावनात्मक तरीके से प्रस्तुत करने में निर्देशक और लेखक ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। तिलोगा की भूमिका में रही मिताली पुनेठा और अमरदेव की भूमिक में रहे अनिल दत्त शर्मा ने अपने अपने अभिनय से दर्शकों का दिल जीतने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जबकि अमरदेव की भूमिका में अनिल दत्त शर्मा भारतीय सूचना सेवा में उच्च अधिकारी है और मितली पुनेठा आकाशवाणी केंद्र देहरादून में उद्घोषिका हैं। परन्तु रंगकर्म इनके रग रग में है। फलस्वरूप इसके इन दोनों ने तिलोगा और अमरदेव के अभिनय को जीने में कोई कंजूसी नहीं की है और नाटक के अंत तक आकर्षण बनाए रखने में सफलता प्राप्त की है।
कुलमिलाकर “तिलोगा अमरदेव” नाटक में ग्लैमर है, गुस्सा है, ईर्ष्या है, दया, राजशाही और बीर भड़ जैसे किरदारों ने नाटक को बेहद ही सजीले ढंग से प्रस्तुत किया है।







