1932 में पौड़ी गढ़वाल के एक दूरस्थ गाँव में जन्मे राधाकृष्ण कुकरेती हिंदी कहानी के क्षेत्र में छठे दशक के एक उल्लेखनीय कहानीकार के रूप में उभरे। गढ़वाल के स्थानीय रंग और आंचलिक भाषा को लेकर उनकी अनेक कहानियाँ प्रकाशित हुई हैं, मुख्य रूप से वह कमलेश्वर द्वारा सम्पादित ‘नई कहानियाँ’ में 1962 में प्रकाशित कहानी ‘सरग दद्दा पाणि पाणि’ के प्रकाशन के बाद चर्चा में आए।
कुकरेती जी की यह कहानी भारतीय साहित्य में दखल दर्ज करने वाली पहली ऐसी कहानी है जिसने पहाड़ की जल समस्या को उसकी भयावहता के साथ प्रस्तुत किया। लोग यह समझते थे कि गंगा-यमुना का हिम और जल से लबालब भरा यह क्षेत्र पानी से लबालब होगा। मगर यह कहानी भारतवासियों को यह बताती है कि सारे देश को जल प्रदान करने वाला यह इलाका अपने गर्भ में कितना प्यासा और बूँद-बूँद के लिए तरसता हुआ इलाका है।
कुकरेती से पहले हिंदी में मिथकीय संरचना पर लिखने की परम्परा नहीं के बराबर थी, जो ऐसी कहानियाँ थी भी वे अमूर्त और भाववाचक थीं। कुकरेती ने यथार्थ का जामा पहनाकर पहली बार अपनी कहानियों में मिथकीय प्रसंगों को चित्रित किया। ‘सरग दद्दा पाणि पाणि’ पहली बार पानी के प्रसंग को आदमी के अस्तित्व के सवाल के साथ जोड़कर अधिदैविक प्रश्न की तरह भी नहीं सामने आती, गढ़वाल अंचल की एक सुपरिचित लोक-कथा के माध्यम से भारतीय समाज का जलता हुआ परिदृश्य प्रस्तुत करती है।
भारतीय स्त्री की कर्मठता, आत्मीयता, वीरता और मातृत्व को यह कहानी एक साथ अपनी संपूर्णता में प्रस्तुत करती है। इसे नई कहानी आंदोलन की भी केंद्रीय कहानी के रूप में रेखांकित किया जाता रहा है। इस आंदोलन में बाद में राजेंद्र यादव का वर्चस्व होने के कारण कुकरेती की यह कहानी भुला दी गई, अन्यथा आज भी अपने पाठ, शिल्प और सरोकारों में यह सहज ही पहली पंक्ति में आ जाती है।
कुकरेती के अनेक कहानी-संग्रह हैं, एक तो इसी कहानी के नाम से है, ‘क्वारी तोंगी’ उनका इससे पहले का आंचलिक कहानियों का संकलन है।
हिंदी के प्रगतिशील आंदोलन के कुकरेती प्रमुख हस्ताक्षर होने के साथ ही वाम विचारधारा के समर्थक हैं। ‘नई दुनिया’ नाम से देहरादून से प्रकाशित मासिक पत्र उनकी पहचान रहा है और एक निर्भीक, समर्पित पत्रकार के रूप में वो हमेशा याद किए जाते हैं। अंतिम समय तक वो एक प्रतिबद्ध पत्रकार-रचनाकार के रूप में सक्रिय रहे।
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