Sunday, September 13, 2026
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धराली आपदा : पत्रकार और पत्रकारिता के आयाम समझा रहे है वरिष्ठ पत्रकार चारु तिवारी।

@by – Charu tiwari

अभी धराली में ‘सबसे पहले’ पहुंचे पत्रकार को वहां की फोटो नहीं मिल पा रही थी, इसलिए उसने अपने ‘विज्ञापन’ में कहीं और जगह की आपदा का फोटो चेप दिया। केदारनाथ में आई आपदा में ‘बाल-बाल बचकर’ रिपोर्टिंग करने वाले इस पत्रकार ने बाद में मोदी की भूमिका लिखी एक किताब भी लिख मारी। ऐसे बहुत सारे पत्रकारों की भरमार है जो आपदा के समय सबसे जनपक्षीय बनकर उभर आते हैं। साल भर सरकार की पहाड़ को लीलने वाली नीतियों के समर्थन में खड़े इन पत्रकारों को पहाड़ का दर्द समझ में आने लगता है। असल में ये सब ‘आपदा में अवसर’ ढूंढने वाले होते हैं। दूसरी ओर ऐसे पत्रकारों की भी सूची है, जो बहुत संजीदगी से ऐसे अवसरों पर जनपक्षीय पत्रकारिता करते हैं। हृदयेश जोशी और राहुल कोटियाल भी ऐसे ही जमीनी पत्रकार हैं जो लगतार पहाड़ के सवालों को अपनी पत्रकारिता के केंद्र में रखते हैं। त्रिलोचन भट्ट जैसे कई पत्रकार ऐसे भी हैं, जो साधनों के अभाव में उन क्षेत्रों तक पहुंच नहीं पाते हैं, लेकिन अपने जनसरोकारी चरित्र को किसी न किसी तरह बनाए रखे हैं। सरकार की उन पर नजर रहती है और उन्हें उन सब जगहों में जाने से रोका जाता है, जहां सरकार कुछ छुपाना चाहती है।

अभी मेरी अपने सबसे प्रिय हृदयेश जोशी और राहुल कोटियाल से बात हो रही थी, जो स्थानीय प्रशासन के रोके जाने के बावजूद अब लगभग धराली पहुंचने वाले हैं। ये दोनों ही लंबे समय से हिमालयी सवालों को बहुत तार्किक और तथ्यों के आधार पर रखते आए हैं। इन दोनों को ही प्रतिष्ठित ‘रामनाथ गोयनका पुरस्कार’ भी मिल चुका है। हृदयेश और राहुल ने क्रमशः ‘एनडीटीवी’ और ‘तहलका’ में रहकर देश के हर हिस्से से लेकर विदेशों तक महत्वपूर्ण रिपोर्टिंग की है। इन दोनों ने पिछले एक दशक से लगातार हिमालयी सरोकारों से जुड़े संदर्भों को बहुत गहराई से न केवल समझा है, बल्कि उसे आम लोगों तक पहुंचाया भी है। एक तरह से यह भी कह सकते हैं कि ये हिमालयी संवेदनाओं के पत्रकार हैं। हृदयेश ने अपनी पत्रकारिता के अनुभवों को बहुत अच्छी तरीके से पुस्तकों के रूप में भी रखा है। उन्होंने 2013 में आई केदारनाथ आपदा पर बहुत तथ्यात्मक पुस्तक ‘तुम चुप क्यों रहे केदार’ लिखी। बहुचर्चित इस पुस्तक को हिमालयी त्रासदियों को समझने का संदर्भ ग्रंथ भी माना जा सकता है। उसका अंग्रेजी अनुवाद ‘Rang of The River’ प्रकाशित हुआ है। बस्तर की सख्त जमीन पर जंग के बीच उभरती प्रेम और हिम्मत की दास्तान ‘लाल लकीर’ 2016 में आई। हिमालय के जीवंत यात्रा वृतांत पर लिखी बिल एटकिन की पुस्तक ‘Footloose in the Himalaya’ का हिंदी अनुवाद ‘एटकिन का हिमालय’ 2023 में लिखी, जो हिमालय के निवासियों और परिवेश को जानने का नया नजरिया देती है। हृदयेश ने अभी सुप्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा के साहित्यिक संस्मरणों की पुस्तक ‘The Cooking of books: A Literary Memoir’ का हिंदी अनुवाद ‘सामने आते ही नहीं’ किया है। हृदयेश पर्यावरण पर केंद्रित अपना चैनल ‘ईको इनर्जी टाॅक’ के नाम चलाते हैं। इस चैनल के माध्यम से उन्होंने प्रकृति और पर्यावरण को समझने का बड़ा मंच तैयार किया है। फिलहाल वह ‘न्यूज लाॅन्ड्री’ के लिए रिपार्टिंग करने के लिए उत्तरकाशी के आपादा प्रभावित क्षेत्रों में हैं।

राहुल ने बहुत कम उम्र में ही पत्रकारिता शुरू कर दी थी। उन्होंने पत्रकारिता और कानून की पढ़ाई की है। जनसरोकारों से उनका रिश्ता एक तरह से विरासत में मिला है। उनके पिता वरिष्ठ वकील राजेंद्र कोटियाल भी जन-आंदोलनों से जुड़े रहे और उत्तराखंड में राज्य सूचना आयुक्त रहे। राहुल ने देश की राजधानी दिल्ली में अपनी पत्रकारिता का पड़ाव डाला और उस समय की चर्चित पत्रिका ‘तहलका’ में कई बेहतरीन रिपोर्ट की। उन्होंने बस्तर से लेकर कश्मीर तक का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जहां खोजी और जनपक्षीय पत्रकारिता से लोगों का ध्यान आकर्षित न किया हो। इसी वजह से उन्हें पत्रकारिता का प्रतिष्ठित ‘रामनाथ गोयनका पुरस्कार’ मिला है। जब वह वापस देहरादून आये तो अपने कई रचनात्मक साथियों के साथ ‘बारामासा’ नाम से अपना चैनल शुरू किया। इस चैनल की विषयवस्तु ऐसी थी कि वह पूरे उत्तराखंड का प्रतिनिधित्व तो करती ही थी, साथ में हिमालयी सवालों को उठाने का प्रमाणिक मंच भी बन गया। ‘बारामासा’ में साहित्य, संगीत कला, समाज, लोक विधाओं, व्यक्तित्व, इतिहास आदि पर बहुत शोधपूर्ण काम हुआ है। फिलहाल वह हर सोमवार को अपना एक कार्यक्रम ‘एकस्ट्रा कवर’ चलाते हैं, जिसे लाखों लोग देखते हैं।

हृदयेश और राहुल के बारे में इतना लिखने का अभी एक ही कारण है कि जब धराली में ‘सबसे पहले’ पहुंचने वालों की भरमार है, तब इन दोनों को वहां जाने से रोका गया। मेरी हृदयेश और राहुल से बात हुई। उन्होंने बताया कि प्रशासन ने उन्हें और उनके साथियों को धराली जाने से रोका, जिससे उनका एक दिन खराब हुआ। अब वह रास्ते में हैं। एक-दो घंटे में वहां पहुंच जायेंगे। उन्होंने बताया कि उनके साथ जिन और पत्रकारों को रोका गया उसमें ‘मनोरमा’ के जाॅय और इंडिया टीवी के पत्रकारों के साथ राहुल, रोहित, अमन, प्रतीक और महिला पत्रकार अनामिका शामिल हैं।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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