साल था 1893… गढ़वाल के चमोली ज़िले में बिरही गंगा घाटी के लोग रोज़ की तरह अपने काम में लगे थे। कोई खेतों में, कोई नदी के किनारे लकड़ी काट रहा था। तब किसी ने नहीं सोचा था कि पहाड़ का सीना अचानक दरक जाएगा।
6 सितंबर 1893 को एक विशाल भूस्खलन हुआ। पूरा पहाड़ खिसक कर बिरही गंगा में समा गया और नदी का बहाव वहीं रुक गया। देखते ही देखते एक विशाल झील बन गई जिसे बाद में गोहना झील कहा गया।
यह झील कोई मामूली झील नहीं थी… 3 किलोमीटर लंबी, सैकड़ों मीटर चौड़ी और गहराई करीब 150 मीटर तक। उसके नीचे मीलों दूर तक पानी भरने लगा। गाँव के गाँव खतरे में थे मगर तबाही अभी बाकी थी।
जब अंग्रेज अफसरों को इस झील का पता चला, तो उन्होंने खतरे को तुरंत समझा। अगर यह झील टूटी, तो भागीरथी और अलकनंदा घाटी में सब कुछ बह जाएगा श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, देवप्रयाग और हरिद्वार तक।
तब ब्रिटिश इंजीनियर W.R. Smyth और गढ़वाल के डिप्टी कलेक्टर हरिकृष्ण की दूरदर्शिता ने समय रहते खतरे को पहचाना।
उन्होंने अनुमान लगाया कि झील ज्यादा दिन नहीं टिकेगी। उन्होंने तुरंत निर्णय लिया कि नदी के तटीय इलाकों में रहने वाले हज़ारों लोगों को सतर्क किया जाए, लेकिन एक चेतावनी की ज़रूरत थी और यहीं से शुरू हुआ भारत में early warning system का पहला प्रयोग।
ब्रिटिश प्रशासन ने झील से लेकर नीचे के नगरों तक टेलीग्राफ लाइन बिछा दी। कई जगहों पर पेड़ों का इस्तेमाल करके खंभों की तरह तार बांधे गए। एक सरकारी कर्मचारी को झील के पास तैनात किया गया उसका काम था: जैसे ही झील में रिसाव या टूटने के लक्षण दिखें, तुरंत वायर से सूचना देना।
लगभग एक साल तक झील बनी रही। लोग हर दिन डर में जीते रहे। फिर आया वो दिन, 25 अगस्त 1894।
झील आखिरकार टूटी। पहाड़ों का सीना चीरती बाढ़ अलकनंदा में समा गई। लेकिन… तब तक श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, देवप्रयाग सब खाली हो चुके थे। लोगों को पहले ही हटा लिया गया था।
130 साल बाद, जब हमारे पास सेटेलाइट, GPS, Doppler रडार, वेदर सिस्टम सब कुछ है तो फिर हर साल धराली, रैणी आपदाओं में गांव क्यों उजड़ते हैं?
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