Monday, July 27, 2026
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जलवायु परिवर्तन चर्चा : प्राकृतिक संसाधनों पर परंपरागत अधिकारों पर सरकारी कब्जा।

By – Prem Pancholi

 

दून विश्वविद्यालय के सभागार में आयोजित “हिमालयी एक्शन स्कूल” कार्यक्रम के दूसरे दिन प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, सुशासन, रोजगार, पलायन और महिलाओं की स्थिति जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर व्यापक चर्चा हुई। देश-विदेश से आए विशेषज्ञों और प्रतिनिधियों ने हिमालयी क्षेत्रों के समक्ष बढ़ती चुनौतियों तथा उनके समाधान पर अपने विचार रखे।

कार्यक्रम में नागालैंड से आए डॉ. अंबा जमीर ने कहा कि उनके राज्य में पहले प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग और विकास से जुड़े निर्णय समुदाय आधारित व्यवस्था के तहत लिए जाते थे तथा स्थानीय लोगों को मूल अधिकार प्राप्त थे। लेकिन वर्तमान समय में यह व्यवस्था कमजोर पड़ती जा रही है, जिससे पारंपरिक अधिकार प्रभावित हुए हैं।

नेपाल की पूर्व विदेश मंत्री डॉ. विमला राय पौड़ियाल ने कहा कि नेपाल में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और उपयोग के लिए परंपरागत नियम-कानून आज भी लागू हैं, लेकिन बदलती राजनीतिक व्यवस्थाओं के कारण इनमें बदलाव दिखाई दे रहे हैं, जिससे नए खतरे भी उत्पन्न हो रहे हैं।

आईएमआई से सेवानिवृत्त डॉ. रमेश नेगी ने आजादी के बाद की शासन व्यवस्थाओं की चर्चा करते हुए कहा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय की विकास संबंधी सोच और वर्तमान व्यवस्था में बड़ा अंतर आ गया है। उन्होंने कहा कि बढ़ते निजीकरण के कारण प्राकृतिक संसाधनों को अब सार्वजनिक हित के बजाय निजी स्वार्थ की दृष्टि से देखा जाने लगा है। उन्होंने यह भी कहा कि स्वच्छता जैसे क्षेत्रों में पर्याप्त धन उपलब्ध होने के बावजूद उसका योजनाबद्ध उपयोग नहीं हो पा रहा है।

प्राकृतिक संसाधनों के अध्येता डॉ. जीत सिंह सनवाल ने उत्तराखंड की वन पंचायतों की वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जिन वन पंचायतों के पास पहले व्यापक अधिकार थे, वे धीरे-धीरे समाप्त कर दिए गए हैं। इससे प्राकृतिक संसाधनों के दोहन का मार्ग प्रशस्त हुआ है।

वरिष्ठ पत्रकार प्रेम बहुखंडी ने कहा कि उत्तराखंड की वन पंचायतों को सत्ता प्रतिष्ठानों ने अपनी बपौती समझ लिया है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों का सामना उत्तराखंड सहित अधिकांश हिमालयी राज्यों को करना पड़ रहा है। उनके अनुसार प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए लोक परंपराओं और स्थानीय नियमों को मजबूत किए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने विकास के असमान भौगोलिक वितरण पर भी चिंता व्यक्त करते हुए राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को इसके लिए जिम्मेदार बताया।

कार्यक्रम के दौरान श्रमयोग के अध्यक्ष डॉ. अजय जोशी, सामाजिक कार्यकर्ता विद्याभूषण रावत, कुलदीप वर्मा, मोहम्मद मीर हमजा, रेनू ठाकुर, हीरा जंगपांगी, तरुण जोशी, सोनी शबनम, डॉ. शिवानी पांडे, डॉ. सालमन खुर्शीद सहित विभिन्न हिमालयी राज्यों से आए प्रतिनिधियों ने अपने-अपने क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न हो रहे खतरों और चुनौतियों पर प्रकाश डाला।

जबकि वक्ताओं ने यह भी बताया कि प्राकृतिक संसाधनों के बढ़ते खतरों से सबसे अधिक प्रभावित हिमालय क्षेत्र की महिलाएं हो रही है। हिमालय क्षेत्रों में महिलाओं का अधिक कार्य प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है। अर्थात महिला आधारित योजनाओं का बड़ा आभाव दिखता है। महिला वक्ताओं ने यह भी सवाल उठाया कि इक्कसवीं सदी में भी महिलाएं किसान नहीं कहलाई जाती। यही वजह है कि महिलाओं के नाम पर मात्र 9 प्रतिशत जमीन है। वह भी ऐसी जमीन है जो खेती किसानी के काम नहीं आती। जबकि खेती किसानी का सर्वाधिक कार्य हिमालयी महिलाओं के कंधों पर निर्भर रहता है। यह सुझाव आया कि जब तक महिला केंद्रित विकास की योजनाएं नहीं बनती तब तक प्राकृतिक संसाधनों पर खतरे बढ़ते ही जाएंगे।

वक्ताओं ने हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, स्थानीय समुदायों की भागीदारी तथा पारंपरिक ज्ञान और व्यवस्थाओं को सशक्त बनाने पर जोर देते हुए सतत विकास की आवश्यकता बताई।

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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें –
खालिद चौधरी
सह निदेशक
एक्शनएड एसोसिएशन
9455094764

हीरा जंगपांगी
एक्शनएड एसोसिएशन
9719577702

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